अंगूर का दाना
 

अंगूर का दाना  

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एक गहरी खाई जब बनती है तो अपने अस्तित्व के पीछे जमाने में महलों के अम्बार लगा देती है उसी तरह हम गरीब बदकिस्मत इंसान टूट कर भी तुम्हें आबाद किये जाते हैं।

……… इसी कहानी से

अभी पिछले दिनों खबर आई थी कि 18 वर्षीय नौकरानी जिसने फिल्म अभिनेता शाईनी आहूजा पर बलात्कार का आरोप लगया था, अपने बयान से पलट गई।

इस शाइनी आहूजा ने तो हम सब शादीशुदा प्रेमी जनों की वाट ही लगा दी है। साले इस पप्पू से तो एक अदना सी नौकरानी भी ढंग से नहीं संभाली गई जिसने पता नहीं कितने लौड़े खाए होंगे और कितनों के साथ नैन मटक्का किया होगा। हम जैसे पत्नी-पीड़ितों को कभी कभार इन नौकरानियों से जो दैहिक और नयनसुख नसीब हो जाता था अब तो वो भी गया। इस काण्ड के बाद तो सभी नौकरानियों के नखरे और भाव आसमान छूने लगे हैं। जो पहले 200-400 रुपये या छोटी मोटी गिफ्ट देने से ही पट जाया करती थी आजकल तो इनके नाज़ और नखरे किसी फ़िल्मी हिरोइन से कम नहीं रह गए। अब तो कोई भी इनको चोदने की तो बात छोड़ो चूमने या बाहों में भर लेने से पहले सौ बार सोचेगा। और तो और अब तो सभी की पत्नियाँ भी खूबसूरत और जवान नौकरानी को रखने के नाम से ही बिदकने लगी हैं।

पता नहीं मधुर (मेरी पत्नी) आजकल क्यों मधु मक्खी बन गई है। उस दिन मैंने रात को चुदाई करते समय उसे मज़ाक में कह दिया था कि तुम थोड़ी गदरा सी हो गई हो। वह तो इस बात को दिल से ही लगा बैठी। उसने तो डाइटिंग के बहाने खाना पीना ही छोड़ दिया है। बस उबली हुई सब्जी या फल ही लेती है और सुबह साम 2-2 घंटे सैर करती है। मुझे भी मजबूरन उसका साथ देना पड़ता है। और चुदाई के लिए तो जैसे उसने कसम ही खा ली है बस हफ्ते में शनिवार को एक बार। ओह … मैं तो अपना लंड हाथ में लिए कभी कभी मुट्ठ मारने को मजबूर हो जाता हूँ। वो रूमानी दिन और रातें तो जैसे कहीं गुम ही हो गये हैं।

अनारकली के जाने के बाद कोई दूसरी ढंग की नौकरानी मिली ही नहीं। (आपको “मेरी अनारकली” जरुर याद होगी) सच कहूं तो जो सुख मुझे अनारकली ने दिया था मैं उम्र भर उसे नहीं भुला पाऊंगा। आह … वो भी क्या दिन थे जब ‘मेरी अनारकली’ सारे सारे दिन और रात मेरी बाहों में होती थी और मैं उसे अपने सीने से लगाए अपने आप को शहजादा सलीम से कम नहीं समझता था। मैंने आपको बताया था ना कि उसकी शादी हो गई है। अब तो वो तीन सालों में ही 2 बच्चों की माँ भी बन गई है और तीसरे की तैयारी जोर शोर से शुरू है। गुलाबो आजकल बीमार रहती है सो कभी आती है कभी नागा कर जाती है। पिछले 3-4 दिनों से वो काम पर नहीं आ रही थी। बहुत दिनों के बाद कल अनारकली काम करने आई थी। मैंने कोई एक साल के बाद उसे देखा था।

अब तो वो पहचान में ही नहीं आती। उसका रंग सांवला सा हो गया है और आँखें तो चहरे में जैसे धंस सी गई हैं। जो उरोज कभी कंधारी अनारों जैसे लगते थे आजकल तो लटक कर फ़ज़ली आम ही हो गए हैं। उसके चहरे की रौनक, शरीर की लुनाई, नितम्बों की थिरकन और कटाव तो जैसे आलू की बोरी ही बन गए हैं। किसी ने सच ही कहा है गरीब की बेटी जवान भी जल्दी होती है और बूढ़ी भी जल्दी ही हो जाती है।

कल जब वो झाडू लगा रही थी तो बस इसी मौके की तलाश में थी कि कब मधुर इधर-उधर हो और वो मेरे से बात कर पाए। जैसे ही मधुर बाथरूम में गई वो मेरे नजदीक आ कर खड़ी हो गई और बोली,“क्या हाल हैं मेरे एस. एस. एस. (सौदाई शहजादे सलीम) ?”

“ओह … मैं ठीक हूँ … तुम कैसी हो अनारकली …?”

“बाबू तुमने तो इस अनारकली को भुला ही दिया … मैं तो … मैं तो …?” उसकी आवाज कांपने लगी और गला रुंध सा गया था। मुझे लगा वो अभी रोने लगेगी। वो सोफे के पास फर्श पर बैठ गई।

“ओह … अनारकली दरअसल … मैं… मैं… तुम्हें भूला नहीं हूँ तुम ही इन दिनों में नज़र नहीं आई?”

“बाबू मैं भला कहाँ जाउंगी। तुम जब हुक्म करोगे नंगे पाँव दौड़ी चली आउंगी अपने शहजादे के लिए !” कह कर उसने मेरी ओर देखा।

उसकी आँखों में झलकता प्रणय निवेदन मुझ से भला कहाँ छुपा था। उसकी साँसें तेज़ होने लगी थी और आँखों में लाल डोरे से तैरने लगे थे। बस मेरे एक इशारे की देरी थी कि वो मेरी बाहों में लिपट जाती। पर मैं ऐसा नहीं चाहता था। उस चूसी हुई हड्डी को और चिंचोड़ने में भला अब क्या मज़ा रह गया था। जाने अनजाने में जो सुख मुझे अनारकली ने आज से 3 साल पहले दे दिया था मैं उन हसीन पलों की सुनहरी यादों को इस लिजलिजेपन में डुबो कर यूं खराब नहीं करना चाहता था।

इससे पहले कि मैं कुछ बोलूँ या अनारकली कुछ करे बाथरूम की चिटकनी खुलने की आवाज आई और मधुर की आवाज सुनाई दी,“अन्नू ! जरा साबुन तो पकड़ाना !”

“आई दीदी ….” अनारकली अपने पैर पटकती बाथरूम की ओर चली गई। मैं भी उठकर अपने स्टडी-रूम में आ गया।

आज फिर गुलाबो नहीं आई थी और उसकी छोटी लड़की अंगूर आई थी। अंगूर और मधुर दोनों ही रसोई में थी। मधु उस पर पता नहीं क्यों गुस्सा होती रहती है। वो भी कोई काम ठीक से नहीं कर पाती। लगता है उसका भी ऊपर का माला खाली है। कभी कुछ गिरा दिया कभी कुछ तोड़ दिया।

इतने में पहले तो रसोई से किसी कांच के बर्तन के गिर कर टूटने की आवाज आई और फिर मधु के चिल्लाने की, “तुम से तो एक भी काम सलीके से नहीं होता। पता है यह टी-सेट मैंने जयपुर से खरीदा था। इतने महंगे सेट का सत्यानाश कर दिया। इस गुलाबो की बच्ची को तो बस बच्चे पैदा करने या पैसों के सिवा कोई काम ही नहीं है। इन छोकरियों को मेरी जान की आफत बना कर भेज देती है। ओह … अब खड़ी खड़ी मेरा मुँह क्या देख रही है चल अब इसे जल्दी से साफ़ कर और साहब को चाय बना कर दे। मैं नहाने जा रही हूँ।”

मधु बड़बड़ाती हुई रसोई से निकली और बाथरूम में घुस कर जोर से उसका पल्ला बंद कर लिया। मैं जानता हूँ जब मधु गुस्सा होती है तो फिर पूरे एक घंटे बाथरूम में नहाती है। आज रविवार का दिन था। आप तो जानते ही हैं कि रविवार को हम दोनों साथ साथ नहाते हैं पर आज मधु को स्कूल के किसी फंक्शन में भी जाना था और जिस अंदाज़ में उसने बाथरूम का दरवाजा बंद किया था मुझे नहीं लगता वो किसी भी कीमत पर मुझे अपने साथ बाथरूम में आने देगी।

अब मैं यह देखना चाहता था कि अन्दर क्या हुआ है इस लिए मैं रसोई की ओर चला गया। अन्दर फर्श पर कांच के टुकड़े बिखरे पड़े थे और अंगूर सुबकती हुई उन्हें साफ़ कर रही थी। ओह … गुलाबो तो कहती है कि अंगूर पूरी 18 की हो गई है पर मुझे नहीं लगता कि उसकी उम्र इतनी होगी। उसने गुलाबी रंग का पतला सा कुरता पहन रखा था जो कंधे के ऊपर से थोड़ा फटा था। उसने सलवार नहीं पहनी थी बस छोटी सी सफ़ेद कच्छी पहन रखी थी। मेरी नज़र उसकी जाँघों के बीच चली गई। उसकी गोरी जांघें और सफ़ेद कच्छी में फंसी बुर की मोटी मोटी फांकों का उभार और उनके बीच की दरार देख कर मुझे लगा कि गुलाबो सही कह रही थी अंगूर तो पूरी क़यामत बन गई है। मेरा दिल तो जोर जोर से धड़कने लगा।

मैं उसके पास जाकर खड़ा हो गया तब उसका ध्यान मेरी ओर गया। जैसे ही उसने अपनी मुंडी ऊपर उठाई मेरा ध्यान उसके उन्नत उरोजों पर चला गया। हल्के भूरे गुलाबी रंग के गोल गोल कश्मीरी सेब जैसे उरोज तो जैसे क़यामत ही बने थे। हे लिंग महादेव ….. इसके छोटे छोटे उरोज तो मेरी मिक्की जैसे ही थे।

ऐसा नहीं है कि मैंने अंगूर को पहली बार देखा था। इससे पहले भी वो दो-चार बार गुलाबो के साथ आई थी। मैंने उस समय ध्यान नहीं दिया था। दो साल पहले तक तो यह निरी काली-कलूटी कबूतरी सी ही तो थी और गुलाबो का पल्लू ही पकड़े रहती थी। ओह…. यह तो समय से पहले ही जवान हो गई है। यह सब टीवी और फिल्मों का असर है। अंगूर टीवी देखने की बहुत शौक़ीन है। अब तो इसका रंग रूप और जवानी जैसे निखर ही आई है। उसका रंग जरुर थोड़ा सांवला सा है पर मोटी मोटी काली आँखें, पतले पतले गुलाबी होंठ, सुराहीदार गर्दन, पतली कमर, मखमली जांघें और गोल मटोल नितम्ब तो किसी को भी घायल कर दें। उसके निम्बू जैसे उरोज तो अब इलाहबाद के अमरूद ही बन चले हैं। मैं तो यह सोच कर ही रोमांचित हो जाता हूँ कि जिस तरह उसके सर के बाल कुछ घुंघराले से हैं उसकी पिक्की के बाल कितने मुलायम और घुंघराले होंगे।

उफ्फ्फफ्फ्फ्फ़ ……………

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Posted : 16/02/2011 6:07 am
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“ऊईइ ..... आम्माआअ ..... ईईईईईईईईईईईईई ..... ” उसने अपनी बाहें मेरी कमर पर कस लीं और मेरे होंठों को मुँह में भर कर जोर से चूसने लगी। उसका शरीर कुछ अकड़ा और फिर हल्के-हल्के झटके खाते वो शांत पड़ती चली गई। पर उसकी मीठी सीत्कार अभी भी चालू थी। प्रथम सम्भोग की तृप्ति और संतुष्टि उसके चहरे और बंद पलकों पर साफ़ झलक रही थी। मैंने उसे फिर से अपनी बाहों में कस लिया और जैसे ही मैंने 3-4 धक्के लगाए मेरे वीर्य उसकी कुंवारी चूत में टपकने लगा।

मेरी पाठिकाएं शायद सोच रही होंगे कि बुर के अन्दर मैंने अपना वीर्य क्यों निकाला? अगर अंगूर गर्भवती हो जाती तो ? आप सही सोच रही है। मैंने भी पहले ऐसा सोचा था। पर आप तो जानती ही हैं मैं मधुर (मेरी पत्नी) को इतना प्रेम क्यों करता हूँ। उसके पीछे दरअसल एक कारण है। वो तो मेरे लिए जाने अनजाने में कई बार कुछ ऐसा कर बैठती है कि मैं तो उसका बदला अगले सात जन्मों तक भी नहीं उतार पाऊंगा।

ओह ... आप नहीं समझेंगी मैं ठीक से समझाता हूँ :

मैंने बताया था ना कि मधुर ने पिछले हफ्ते मुझे अंगूर के लिए माहवारी पैड्स लाने को कहा था ? आप तो जानती ही हैं कि अगर माहवारी ख़त्म होने के 8-10 दिन तक सुरक्षित काल होता है और इन दिनों में अगर वीर्य योनी के अन्दर भी निकाल दिया जाए तो गर्भधारण की संभावना नहीं रहती। ओह ... मैं भी फजूल बातें ले बैठा।

हम दोनों एक दूसरे की बाहों में जकड़े पानी की ठंडी फुहार के नीचे लेटे थे। मेरा लंड थोड़ा सिकुड़ गया था पर उसकी बुर से बाहर नहीं निकला था। वो उसे अपनी बुर के अन्दर संकोचन कर उसे जैसे चूस ही रही थी। मैं अभी उठने की सोच ही रहा था कि मुझे ध्यान आया कि अंगूर की बुर से तो खून भी निकला था। शायद अब भी थोड़ा निकल रहा होगा। चुदाई की लज्जत में उसे दर्द भले ही इतना ना हो रहा हो पर जैसे ही मेरा लंड उसकी बुर से बाहर आएगा वो अपनी बुर को जरूर देखेगी और जब उसमें से निकलते हुए खून को देखेगी तो कहीं रोने चिल्लाने ना लग जाए। मैं ऐसा नहीं होने देना चाहता था क्यों कि मुझे तो अभी एक बार और उसकी चुदाई करनी थी। मेरा मन अभी कहाँ भरा था। ओह ... कुछ ऐसा करना होगा कि थोड़ी देर उसकी निगाह और ध्यान उसकी रस टपकाती बुर पर ना जा पाए।

“अंगूर इस पानी की ठंडी फुहार में कितना आनंद है !” मैंने कहा।

“हाँ बाबू मैं तो जैसे स्वर्ग में ही पहुँच गई हूँ !”

“अंगूर अगर हम दोनों ही थोड़ी देर आँखें बंद किये चुपचाप ऐसे ही लेटे रहें तो और भी मज़ा आएगा !”

“हाँ मैं भी यही सोच रही थी।”

मैं धीरे से उसके ऊपर से उठ कर उसकी बगल में ही लेट सा गया और अपने हाथ उसके उरोजों पर हौले हौले फिराने लगा। वो आँखें बंद किये और जाँघों को चौड़ा किये लेटी रही। उसकी बुर की फांकें सूजी हुई सी लग रही थी और उनके बीच से मेरे वीर्य, उसके कामराज और खून का मिलाजुला हलके गुलाबी रंग का मिश्रण बाहर निकल कर शावर से निकलती फुहार से मिल कर नाली की ओर जा रहा था। उसकी मोटी मोटी सूजी गुलाबी लाल फांकों को देख कर तो मेरा मन एक बार फिर से उन्हें चूम लेने को करने लगा। पर मैंने अपना आप को रोके रखा।

कोई 10 मिनट तक हम चुप चाप ऐसे ही पड़े रहे। पहले मैं उठा और मैंने अपने लंड को पानी से धोया और फिर मैंने अंगूर को उठाया। उसकी बुर में अभी भी थोड़ा सा दर्द था। उसने भी नल के नीचे अपनी बुर को धो लिया। वो अपनी बुर की हालत देख कर हैरान सी हो रही थी। उसकी फांकें सूज गई थी और थोड़ी चौड़ी भी हो गई थी।

“बाबू देखो तुमने मेरी पिक्की की क्या हालत कर दी है ?”

“क्यों ? क्या हुआ ? अच्छी भली तो है ? अरे ... वाह... यह तो अब बहुत ही खूबसूरत लग रही है !” कहते हुए मैंने उसकी ओर अपना हाथ बढ़ाया तो अंगूर पीछे हट गई। वो शायद यही सोच रही थी कहीं मैं फिर से उसकी पिक्की को अपने मुँह में ना भर लूँ।

“दीदी सच कहती थी तुम मुझे जरूर खराब कर के ही छोड़ोगे !” वो कातर आँखों से मेरी ओर देखते हुए बोली।

हे भगवान् कहीं यह मधुर की बात तो नहीं कर रही ? मैंने डरते डरते पूछा,“क ... कौन ? मधुर ?”

“आप पागल हुए हो क्या ?”

“क... क्या मतलब ?”

“मैं अनार दीदी की बात कर रही हूँ !”

“ओह ... पर उसे कैसे पता ... ओह... मेरा मतलब है वो क्या बोलती थी ?” मेरा दिल जोर जोर से धड़क रहा था। कहीं अनार ने इसे हमारी चुदाई की बातें तो नहीं बता दी ?

“वो कह रही थी कि आप बहुत सेक्सी हो और किसी भी लड़की को झट से चुदाई के लिए मना लेने में माहिर हो !”

“अरे नहीं यार .... मैं बहुत शरीफ आदमी हूँ !”

“अच्छाजी .... आप और शरीफ ??? हुंह .... मैं आपकी सारी बातें जानती हूँ !!!” उसने अपनी आँखें नचाते हुए कहा फिर मेरी ओर देख कर मंद मंद मुस्कुराने लगी। फिर बोली,“दीदी ने एक बात और भी बताई थी ?”

“क ... क्या ?” मैं हकलाते हुए सा बोला। पता नहीं यह अब क्या बम्ब फोड़ने वाली थी।

“वो ... वो ... नहीं... मुझे शर्म आती है !” उसने अपनी मुंडी नीचे कर ली।

मैंने उसके पास आ गया और उसे अपनी बाहों में भर लिया। मैंने उसकी ठोड़ी पर अंगुली रख कर उसकी मुंडी ऊपर उठाते हुए पूछा,“अंगूर बताओ ना .... प्लीज ?”

“ओह ... आपको सब पता है ... !”

“प्लीज !”

“वो ... बता रही थी कि आप बुर के साथ साथ गधापच्चीसी भी जरूर खेलते हो !” कहते हुए उसने अपनी आँखें बंद कर ली। उसके गालों पर तो लाली ही दौड़ गई। मेरा जी किया इस पर कुर्बान ही हो जाऊं।

“अरे उसे कैसे पता ?” मैंने हैरान होते हुए पूछा।

“उसको मधुर दीदी ने बताया था कि आप कभी कभी छुट्टी वाले दिन बाथरूम में उनके साथ ऐसा करते हो !”

अब आप मेरी हालत का अंदाज़ा बखूबी लगा सकते हैं। मैंने तड़ातड़ कई चुम्बन उसकी पलकों, गालों, छाती, उरोजों, पेट और नाभि पर ले लिए। जैसे ही मैं उसकी पिक्की को चूमने के लिए नीचे होने लगा वो पीछे हटते हुए घूम गई और अपनी पीठ मेरी और कर दी। मैंने पीछे से उसे अपनी बाहों में भर लिया। मेरा शेर इन सब बातों को सुनकर भला क्यों ना मचलता। वो तो फिर से सलाम बजने लगा था। मेरा लंड उसके नितम्बों में ठीक उसकी गांड के सुनहरे छेद पर जा लगा। अंगूर ने अपने दोनों हाथ ऊपर उठाये और मेरी गर्दन में डाल दिए। मैंने एक हाथ से उसके उरोजों को पकड़ लिया और एक हाथ से उसकी बुर को सहलाने लगा। जैसे ही मेरा हाथ उसकी फांकों से टकराया वो थोड़ी सी कुनमुनाई तो मेरा लंड फिसल कर उसकी जाँघों के बीच से होता उसकी बुर की फांकों के बीच आ गया। उसने अपनी जांघें कस ली।

“अंगूर एक बार तुम भी इसका मज़ा लेकर तो देखो ना ?”

“अरे ना बाबा ... ना .... मुझे नहीं करवाना !”

“क्यों ?”

“मैंने सुना है इसमें बहुत दर्द होता है !”

“अरे नहीं दर्द होता तो मधु कैसे करवाती ?”

“पर वो... वो ... ?”

मुझे कुछ आस बंधी। मेरा लंड तो अब रौद्र रूप ही धारण कर चुका था। मेरा तो मन करने लगा बस इसे थोड़ा सा नीचे झुकाऊं और अपने खड़े लंड पर थूक लगा कर इसकी मटकती गांड में डाल दूं। पर मैं इतनी जल्दबाजी करने के मूड में नहीं था।

मेरा मानना है कि ‘सहज पके सो मीठा होय’

“अरे कुछ नहीं होता इसमें तो आगे वाले छेद से भी ज्यादा मज़ा आता है ! मधुर तो इसकी दीवानी है। वो तो मुझे कई बार खुद कह देती है आज अगले में नहीं पीछे वाले छेद में करो ?” मैंने झूठ मूठ उसे कह दिया।

थोड़ी देर वो चुप रही। उसके मन की दुविधा और उथल-पुथल मैं अच्छी तरह जानता था। पर मुझे अब यकीन हो चला था कि मैं जन्नत के दूसरे दरवाजे का उदघाटन करने में कामयाब हो जाउंगा।

“वो ... वो ... रज्जो है ना ?” अंगूर ने चुप्पी तोड़ी।

“कौन रज्जो ?”

“हमारे पड़ोस में रहती है मेरी पक्की सहेली है !”

“अच्छा ?”

“पता है उसके पति ने तो सुहागरात में दो बार उसकी गांड ही मारी थी ?”

“अरे वो क्यों ?”

“रज्जो बता रही थी कि उसके पति ने उसे चोदना चालू किया तो उसकी बुर से खून नहीं निकला !”

“ओह ... अच्छा... फिर ?”

“फिर वो कहने लगा कि तुम तो अपनी सील पहले ही तुड़वा चुकी लगती हो। मैं अब इस चुदे हुए छेद में अपना लंड नहीं डालूँगा। तुम्हारे इस दूसरे वाले छेद की सील तोडूंगा !”

“अरे ... वाह ... फिर ?”

“फिर क्या ... उसने रज्जो को उल्टा किया और बेचारी को बहुत बुरी तरह चोदा। रज्जो तो रोती रही पर उसने उस रात दो बार उसकी जमकर गांड मारी। वो तो बेचारी फिर 4-5 दिन ठीक से चल ही नहीं पाई !”

“पर रज्जो की बुर की सील कैसे टूट गई उसने बताया तो होगा ?” मैंने पूछा।

“वो.... वो.... 8 नंबर वाले गुप्ता अंकल से उसने कई बार चुदवाया था !”

“अरे उस लंगूर ने उसे कैसे पटा लिया ?”

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Posted : 16/02/2011 6:12 am
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उसने मेरी ओर ऐसे देखा जैसे मैं किसी सर्कस का जानवर या एलियन हूँ। फिर वह बोली,“पता ही वो कितने अच्छे अच्छे गिफ्ट उसे लाकर दिया करते थे। कभी नई चप्पलें, कभी चूड़ियाँ, कभी नई नई डिजाइन की नेल पोलिश ! वो तो बताती है कि अगर गुप्ता अंकल शादीशुदा नहीं होते तो वो तो रज्जो से ही ब्याह कर लेते !”

मैं सोच रहा था कि इन कमसिन और गरीब घर की लड़कियों को छोटी मोटी गिफ्ट का लालच देकर या कोई सपना दिखा कर कितना जल्दी बहकाया जा सकता है। अब उस साले मोहन लाल गुप्ता की उम्र 40-42 के पार है पर उस कमसिन लौंडिया की कुंवारी बुर का मज़ा लूटने से बाज़ नहीं आया।

“स ... साला .... हरामी कहीं का !” मेरे मुँह से अस्फुट सा शब्द निकला।

“कौन ?”

ओह... अब मुझे ध्यान आया मैं क्या बोल गया हूँ। मैंने अपनी गलती छिपाने के लिए उसे कहा,“अरे नहीं वो ... वो मैं पूछ रहा था कि उसने कभी रज्जो की गांड भी मारी थी या नहीं ?”

“पता नहीं ... पर आप ऐसा क्यों पूछ रहे हैं ?”

“ओह ... वो मैं इसलिए पूछ रहा था कि अगर उसने गांड भी मरवा ली होती तो उसे सुहागरात में दर्द नहीं होता ?” मैंने अपनी अंगुली उसकी बुर की फांकों पर फिरानी चालू कर दी और उसकी मदनमणि के दाने को भी दबाना चालू कर दिया। साथ साथ मैं उसके कानो की लटकन, गर्दन, और कन्धों को भी चूमे जा रहा था।

“वैसे सभी मर्द एक जैसे ही तो होते हैं !”

“वो कैसे ?”

“वो... वो.... जीजू भी अनार दीदी की गांड मारते हैं और .... और ... बापू भी अम्मा की कई बार रात को जमकर गांड मारते हैं !”

“अरे ... वाह ... तुम्हें यह सब कैसे पता ?”

“हमारे घर में बस एक ही कमरा तो है। अम्मा और बापू चारपाई पर सोते हैं और हम सभी भाई बहन नीचे फर्श पर सो जाते हैं। रात में कई बार मैंने उनको ऐसा करते देखा है।”

मुझे यह सब अनारकली ने भी बताया था पर मुझे अंगूर के मुँह से यह सब सुनकर बहुत अच्छा लग रहा था। दरअसल मैं यह चाहता था कि इस सम्बन्ध में इसकी झिझक खुल जाए और डर निकल जाए ताकि यह भी गांड मरवाने के लिए मानसिक रूप से तैयार हो जाए और गांड मरवाते समय मेरे साथ पूरा सहयोग करे। पहले तो यह जरा जरा सी बात पर शरमा जाया करती थी पर अब एक बार चुदने के बाद तो आसानी से लंड, चूत, गांड और चुदाई जैसे शब्द खुल कर बोलने लगी है।

मैंने बात को जारी रखने की मनसा से उसे पूछा,“पर गुलाबो मना नहीं करती क्या ?”

“मना तो बहुत करती है पर बापू कहाँ मानते हैं। वो तो अम्मा को अपना हथियार चूसने को भी कहते हैं पर अम्मा को घिन आती है इसलिए वो नहीं चूसती इस पर बापू को गुस्सा आ जाता है और वो उसे उल्टा करके जोर जोर से पिछले छेद में चोदने लग जाते हैं। अम्मा तो बेचारी दूसरे दिन फिर ठीक से चल ही नहीं पाती !”

“तुम्हारा बापू भी पागल ही लगता है उसे ठीक से गांड मारना भी नहीं आता !”

वो तो हैरान हुई मुझे देखती ही रह गई। थोड़ी देर रुक कर वो बोली,“बाबू मेरे एक बात समझ नहीं आती ?”

“क्या ?”

“अम्मा बापू का चूसती क्यों नहीं। अनार दीदी बता रही थी कि वो तो बड़े मजा ले ले कर चूसती है। वो तो यह भी कह रही थी कि मधुर दीदी भी कई बार आपका .... ?” कहते कहते अंगूर रुक गई।

मैं भी कितना उल्लू हूँ। इतना अच्छा मौका हाथ में आ रहा है और मैं पागलों की तरह ऊलूल जुलूल सवाल पूछे जा रहा हूँ।

ओह ... मेरे प्यारे पाठको ! आप भी नहीं समझे ना ? मैं जानता हूँ मेरी पाठिकाएं जरूर मेरी बात को समझ समझ कर हँस रही होंगी। हाँ दोस्तो, कितना बढ़िया मौका था मेरे पास अंगूर को अपने लंड का अमृतपान करवाने का। मैं जानता था कि मुझे बस थोड़ी सी इस अमृतपान कला की तारीफ़ करनी थी और वो इसे चूसने के लिए झट से तैयार हो जाएगी। मैंने उसे बताना शुरू किया।

पढ़ते रहिए ..... कई भागों में समाप्य

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Posted : 16/02/2011 6:13 am
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“अम्मा बापू का चूसती क्यों नहीं। अनार दीदी बता रही थी कि वो तो बड़े मजा ले ले कर चूसती है। वो तो यह भी कह रही थी कि मधुर दीदी भी कई बार आपका .... ?” कहते कहते अंगूर रुक गई।

मैं भी कितना उल्लू हूँ। इतना अच्छा मौका हाथ में आ रहा है और मैं पागलों की तरह ऊलूल जुलूल सवाल पूछे जा रहा हूँ।

ओह ... मेरे प्यारे पाठको ! आप भी नहीं समझे ना ? मैं जानता हूँ मेरी पाठिकाएं जरूर मेरी बात को समझ समझ कर हँस रही होंगी। हाँ दोस्तो, कितना बढ़िया मौका था मेरे पास अंगूर को अपने लंड का अमृतपान करवाने का। मैं जानता था कि मुझे बस थोड़ी सी इस अमृतपान कला की तारीफ़ करनी थी और वो इसे चूसने के लिए झट से तैयार हो जाएगी। मैंने उसे बताना शुरू किया।

“हाँ तुम सही कह रही हो। मधुर को तो इसे चूसना बड़ा पसंद है। वो तो लगभग रोज़ ही रात की चुदाई करवाने से पहले एक बार चूसती जरूर है !”

“हाँ मुझे पता है। अनार दीदी ने तो मुझे यह भी बताया था कि इससे घिन कैसी ? इसे पीने से तो आँखों की ज्योति बढ़ती है। यही तो वह रस है जिससे मैं, तुम, रज्जो, गौरी, मीठी, कालू, सत्तू और मोती बने हैं। इसी रस से तो औरत माँ बनती है और यही वो रस है जो हमारे जीवन का मूल है। यह रस नहीं होता तो ना मैं होती ना तुम।”

‘वाह मेरी जान तुमने तो मेरी मुश्किल ही आसान कर दी’ मैंने अपने मन में सोचा। मैं जानता था यह पट्टी मधुर ने अनार को पढ़ाई थी और उसने इस नादान कमसिन अंगूर को कभी अपनी बुद्धिमत्ता दर्शाने को बता दी होगी। वाह मधुर, अगर मैं तुम्हारा लाख लाख बार भी धन्यवाद करूँ तो कम है।

मेरा पप्पू तो अब घोड़े की तरह हिनहिनाने लगा था। वो अंगूर के नितम्बों के नीचे लगा बार बार जैसे उफन ही रहा था। अंगूर अपने नितम्बों को भींच कर उसका होसला बढ़ा रही थी।

मैंने अंगूर से कहा,“अंगूर क्या तुमने कभी कोशिश नहीं की ?”

“धत्त ?” आप भी कैसी बातें करते हैं ?”

“अच्छा एक बात बताओ ?

“क्या ?”

“कभी तुम्हारे मन में चूसने की बात आई या नहीं ?”

वो कुछ पलों के लिए सोचती रही और फिर बोली,“कई बार मैंने मोती को नहाते समय अपने लंड से खेलते देखा है और अपने मोहल्ले के लड़कों को भी गली में मूतते देखा है। वो लड़कियों को देख कर अपना जोर जोर से हिलाते रहते हैं। तब कई बार मुझे गुस्सा भी आता था और कई बार इच्छा भी होती थी कि मैं भी कभी किसी का पकड़ लूं और चूस लूँ !”

“अंगूर एक बार मेरा ही चूस लो ना ?”

वो मेरी बाहों से छिटक कर दूर हो गई। एक बार तो मुझे लगा कि वो नाराज़ हो गई है पर फिर तो वो एक झटके के साथ नीचे बैठ गई और मेरे लंड को अपने मुँह में गप्प से भर कर चूसने लगी। मैं सच कहता हूँ मैंने जितनी भी लड़कियों और औरतों की चुदाई की है या गांड मारी है सिमरन को छोड़ कर लगभग सभी को अपना लंड जरूर चुसवाया है। लंड चुसवाने की लज्जत तो चुदाई से भी अधिक होती है। उसके लंड चूसने के अंदाज़ से तो मुझे भी एक बार ऐसा लगने लगा था कि इसने पहले भी किसी का जरूर चूसा होगा या फिर देखा तो जरूर होगा। वो कभी मेरे लंड पर जीभ फिराती कभी उसका टोपा अपने होंठों और दांतों से दबाती। कभी उसे पूरा का पूरा अन्दर गले तक ले जाती और फिर हौले हौले उसे बाहर निकालती। हालांकि मधुर भी लंड बहुत अच्छा चूसती है पर यह तो उसे भी मात कर रही थी। मुझे लगा अगर इसने मेरा 2-3 मिनट बिना रुके ऐसे ही चूसना जारी रखा तो मैं तो इसके मुँह में ही झड़ जाऊँगा। दरअसल मैं पहले एक बार तसल्ली से इसकी गांड मारना चाहता था। कहीं ऐसा ना हो कि मधुर ही जाग जाए। अगर ऐसा हो गया तो मेरी तो सारी मेहनत और योजना ही खराब हो जायेगी।

मैं अभी यह सोच ही रहा था कि वो अपने होंठों पर जीभ फिराती उठ खड़ी हुई। मैंने एक बार उसके होंठों को फिर से चूम लिया।

“बाबू बहुत देर हो गई कहीं मधुर दीदी ना जाग जाए ?”

“अरे तुम उसकी चिंता मत करो। वो सुबह से पहले नहीं जागेगी !” मैंने उसे बाहों में भर लेना चाहा।

“बस बाबू, अब छोड़ो मुझे, जाने दो !”

“अंगूर तुम मेरी कितनी प्यारी साली हो !”

“तो ?”

“अंगूर यार मेरी एक और इच्छा पूरी नहीं करोगी क्या ?”

“अब और कौन सी इच्छा बाकी रह गई है ?”

“अंगूर यार एक बार अपने पिछले छेद में भी करवा लो ना ?”

मैं उसे पकड़ने के लिए जैसे ही थोड़ा सा आगे बढ़ा वो पीछे हटती हुई बोली,“ना बाबा ना .... मैं तो मर ही जाउंगी !”

“अरे नहीं मेरी जान तुम्हें मरने कौन बेवकूफ देगा ? तुम तो मेरी जान हो !” मैंने उसे अपनी बाहों में भरते हुए कहा।

“इसका मतलब दीदी सच कह रही थी ना ?” उसने अपनी आँखें नचाते हुए कहा।

“क्या मतलब ?”

“तुम सभी मर्द एक जैसे होते हो। ऊपर से शरीफ बनते हो और ... और ...?”

“ओह ... अंगूर देखो मैं बहुत प्यार से करूँगा तुम्हें जरा भी दर्द नहीं होने दूंगा !” कहते हुए मैंने उसके होंठों को चूम लिया।

“वो.... वो ... ओह ... नहीं !”

“प्लीज मेरी सबसे प्यारी साली जी !”

“ओह ... पर वो... वो.... यहाँ नहीं !”

“क ... क्या मतलब ?”

“यहाँ बे-आरामी होगी, बाहर कमरे में चलो !”

मैं तो उस पर मर ही मिटा। मधु तो इसे मासूम बच्ची ही समझती है। मुझे अब समझ आया कि लड़की दिखने में भले ही छोटी या मासूम लगे पर उसे सारी बातें मर्दों से पहले ही समझ आ जाती है। इसी लिए तो कहा गया है कि औरत को तो भगवान् भी नहीं समझ पाता।

हमने जल्दी से तौलिये से अपना शरीर पोंछा और फिर मैंने उसे अपनी गोद में उठा लिया। उसने अपनी बाहें मेरे गले में ऐसे डाल दी जैसे कोई प्रियतमा अपने प्रेमी के गले का हार बन जाती है। हम दोनों एक दूसरे की बाहों में समाये कमरे में आ गए।

मैंने उसे बिस्तर पर लेटा दिया। वो अपनी जांघें थोड़ी सी फैला कर आँखें बंद किये लेटी रही। मेरा ध्यान उसकी बुर की सूज कर मोटी मोटी और लाल हो गई फांकों पर चला गया। मेरा तो मन करने लगा कि गांड मारने के बजाये एक बार फिर से इसकी बुर का ही मज़ा ले लिया जाए। ओह ... इस समय उसकी बुर कितनी प्यारी लग रही थी। मुझे आज भी याद है जब मैंने सिमरन के साथ पहली बार सम्भोग किया था तो उसकी बुर भी ऐसी ही हो गई थी।

मेरा मन उसका एक चुम्मा ले लेने को करने लगा। जैसे ही मैं नीचे झुकने लगा अंगूर बिस्तर पर पलट गई और अपने पेट के बल हो गई। उसके गोल गोल कसे हुए नितम्ब इतने चिकने लग रहे थे जैसे रेशम हों। मैंने बारी बारी एक एक चुम्बन उन दोनों नितम्बों पर ले लिया। अंगूर के बदन में एक हलकी सी झुरझुरी सी दौड़ गई। मैं जानता था यह डर, रोमांच और पहली बार गांड मरवाने के कौतुक के कारण था। मेरी भी यही हालत थी। मेरा पप्पू तो ऐसे तना था जैसे कोई फौजी जंग के लिए मुस्तैद हो। मैंने पास रखे टेलकम पाउडर का डिब्बा उठाया और उसकी कमर, नितम्बों और जाँघों के ऊपर लगा दिया और अपने हाथ उसके नितम्बों और कमर पर फिराना चालू कर दिया। बीच बीच में मैंने उसकी गांड के छेद पर भी अपनी अंगुली फिरानी चालू कर दी।

आप जरूर सोच रहे होंगे यार प्रेम अब क्यों तरसा रहे हो साली को ठोक क्यों नहीं देते।

ओह ... मेरे प्यारे पाठको और पाठिकाओ ... बस थोड़ा सा सब्र और कर लो। आप तो सभी बहुत गुणी और अनुभवी हैं। आप अच्छी तरह जानते हैं कि पहली बार किसी कमसिन लड़की की कुंवारी गांड मारना और कितना दुश्कर कार्य होता है। पहले क्रीम और बोरोलीन से इसे रवां करके इस कसे और छोटे से छेद को ढीला करना होगा। सबसे ज्यादा अहम् बात तो यह है कि भले ही अंगूर मेरे कहने पर गांड मरवाने को राज़ी हो गई थी पर अभी वो शारीरिक रूप से इसके लिए पूरी तरह तैयार नहीं हुई थी। जब तक वो पूरी तरह अपने आप को इसके लिए अंतर्मन से तैयार नहीं कर लेगी उसकी कोरी गांड का छल्ला ढीला नहीं होगा।

मैंने अंगूर के नितम्बों को एक बार फिर से थपथपाया और फिर उन्हें चूमते हुए कहा,“अंगूर अपनी जांघें थोड़ी से चौड़ी करो प्लीज !”

मेरी बात सुनकर उसने एक बार मेरी ओर देखा और फिर अपने नितम्बों को थोड़ा सा ऊपर करते हुए अपने घुटनों को मोड़ कर उसने अपना सिर झुका कर अपने घुटनों पर ही रख लिया। ऐसा करने से उसके नितम्ब जो आपस में जुड़े थे खुल गए और गांड का सांवले रंग का छोटा सा छेद अब साफ़ नज़र आने लगा। वह कभी खुल और कभी बंद होने लगा था। शायद रोमांच और डर के कारण ऐसा हो रहा था। मैंने अपनी अंगुली पर वैसलीन की डब्बी से खूब सारी वैसलीन निकाली।

और उसकी गांड के छेद पर लगाने में लिए जैसे ही अपना हाथ बढ़ाया, वो बोली,“बाबू ... जरा धीरे करना ... मुझे डर लग रहा है ... ज्यादा दर्द तो नहीं होगा ना ?”

ओह ... मेरे प्यारे पाठको और पाठिकाओ ... बस थोड़ा सा सब्र और कर लो। आप तो सभी बहुत गुणी और अनुभवी हैं। आप अच्छी तरह जानते हैं कि पहली बार किसी कमसिन लड़की की कुंवारी गांड मारना और कितना दुश्कर कार्य होता है। पहले क्रीम और बोरोलीन से इसे रवां करके इस कसे और छोटे से छेद को ढीला करना होगा। सबसे ज्यादा अहम् बात तो यह है कि भले ही अंगूर मेरे कहने पर गांड मरवाने को राज़ी हो गई थी पर अभी वो शारीरिक रूप से इसके लिए पूरी तरह तैयार नहीं हुई थी। जब तक वो पूरी तरह अपने आप को इसके लिए अंतर्मन से तैयार नहीं कर लेगी उसकी कोरी गांड का छल्ला ढीला नहीं होगा।

मैंने अंगूर के नितम्बों को एक बार फिर से थपथपाया और फिर उन्हें चूमते हुए कहा,“अंगूर अपनी जांघें थोड़ी से चौड़ी करो प्लीज !”

मेरी बात सुनकर उसने एक बार मेरी ओर देखा और फिर अपने नितम्बों को थोड़ा सा ऊपर करते हुए अपने घुटनों को मोड़ कर उसने अपना सिर झुका कर अपने घुटनों पर ही रख लिया। ऐसा करने से उसके नितम्ब जो आपस में जुड़े थे खुल गए और गांड का सांवले रंग का छोटा सा छेद अब साफ़ नज़र आने लगा। वह कभी खुल और कभी बंद होने लगा था। शायद रोमांच और डर के कारण ऐसा हो रहा था। मैंने अपनी अंगुली पर वैसलीन की डब्बी से खूब सारी वैसलीन निकाली।

और उसकी गांड के छेद पर लगाने में लिए जैसे ही अपना हाथ बढ़ाया, वो बोली,“बाबू ... जरा धीरे करना ... मुझे डर लग रहा है ... ज्यादा दर्द तो नहीं होगा ना ?”

मैं तो उसके इस भोलेपन पर मर ही मिटा। ओह ... वो तो शायद यही सोच रही थी की मैं थूक लगा कर एक ही झटके में अपना लंड उसकी गांड में घुसेड़ने की कोशिश करूँगा।

“अरे मेरी रानी तुम चिंता क्यों करती हो मैं इस तरह से करूँगा कि तुम्हें तो पता भी नहीं चलेगा ?”

अब मैंने उसके खुलते बंद होते छेद पर वैसलीन लगा दी और धीरे धीरे उसे रगड़ने लगा। बाहर से उसकी गांड का छेद कुछ सांवला था पर मैं जानता हूँ अन्दर से तो वो चेरी की तरह बिलकुल लाल होगा। बस थोड़ा सा नर्म पड़ते ही मेरी अंगुली अन्दर चली जायेगी। मुझे कोई जल्दी नहीं थी। मैंने थोड़ी क्रीम और निकाली और अपनी अंगुली का एक पोर थोड़ा सा गांड के छेद में डाला। छल्ला बहुत कसा हुआ लग रहा था। वो थोड़ी सी कुनमुनाई पर कुछ बोली नहीं। मैंने अपनी अंगुली के पोर को 3-4 बार हौले हौले उसके छल्ले पर रगड़ते हुए अन्दर सरकाया। अब मेरी अंगुली का पोर थोड़ा थोड़ा अन्दर जाने लगा था। मैंने इस बार बोरोलीन की ट्यूब का ढक्कन खोलकर उसका मुँह उसकी गांड के छेद से लगाकर थोड़ा सा अन्दर कर दिया और फिर उसे भींच दिया। ट्यूब आधी खाली हो गई और उसकी क्रीम अन्दर चली गई। उसे जरूर यह क्रीम ठंडी ठंडी लगी होगी और गुदगुदी भी हुई होगी। जैसे ही मैंने ट्यूब हटाई उसका छेद फिर से खुलने और बंद होने लगा और उस पर लगी सफ़ेद क्रीम चारों और फ़ैल सी गई।

अब तो मेरी अंगुली बिना किसी रुकावट के आराम से अन्दर बाहर होने लगी थी। मैंने अपनी अंगुली पर फिर से क्रीम लगाई और उसके नर्म छेद में अन्दर बाहर करने लगा। मैंने अंगूर को अपनी गांड को बिलकुल ढीला छोड़ देने को पहले ही कह दिया था। और अब तो उसे भी थोड़ा मज़ा आने लगा था। उसने अपनी गांड का कसाव ढीला छोड़ दिया जिससे मेरी अंगुली का पोर तो छोड़ो अब तो पूरी अंगुली अन्दर बाहर होने लगी थी।

अंगूर पहले तो थोड़ा आह ... ऊँह ... कर रही थी पर अब तो वो भी मीठी सीत्कार करने लगी थी। शायद उसके लिए यह नया अहसास और अनूठा अनुभव था। उसे यह तो पता था कि सभी मर्दों को गांड मारने में बहुत मज़ा आता है पर उसे यह कहाँ पता था कि अगर कायदे से (सही तरीके से) गांड मारी जाए और गांड मारने वाला अनाड़ी ना होकर कोई गुरु घंटाल हो तो गांड मरवाने औरत को चूत से भी ज्यादा मज़ा आता है।

दरअसल इसका एक कारण है। पुरुष हमेशा स्त्री को पाने के लिए प्रेम दर्शाता है पर स्त्री अपने प्रेमी का प्रेम पाने के लिए और उसकी ख़ुशी के लिए ही प्रेम करती है। जिस क्रिया में उसके प्रियतम को आनंद मिले वो कष्ट सह कर भी उसे पूरा करने में सहयोग देती है। अंगूर की मानसिक हालत भी यही बता रही थी। हो सकता है अंगूर को गांड मरवाने में आने वाले आनंद का ना पता हो पर वो तो इस समय मुझे हर प्रकार से खुश कर देना चाहती थी। उसने रोमांच और नए अनुभव के आनंद से सराबोर होकर मीठी सीत्कारें करना भी चालू कर दिया था और अब तो उसने अपने हाथ का एक अंगूठा मुँह में लेकर उसे भी चूसना चालू कर दिया था। आह ... मेरी मिक्की ... तुमने तो नया जन्म ही ले लिया है ?

कभी कभी वो अपने गांड के छल्ले को सिकोड़ भी लेती थी। उसकी गांड के कसाव को अपनी अंगुली पर महसूस करके मैं तो रोमांच से लबालब भर उठा। मेरा पप्पू तो झटके पर झटके मारने लगा था। बस अब तो जन्नत के इस दूसरे दरवाजे का उदघाटन करने का सही वक़्त आ ही गया था।

“ओहो... बाबू अब करो ना ... क्यों देर कर रहे हो ?”

पढ़ते रहिए ..... कई भागों में समाप्य

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Posted : 16/02/2011 6:13 am
 Anonymous
(@Anonymous)
Guest

मैं अपने विचारों में खोया था कि अंगूर की रस घोलती आवाज सुनकर चौंक ही पड़ा।

मैंने एक चुम्बन उसके नितम्बों पर फिर से लेते हुए कहा,“अंगूर ऐसे नहीं तुम पेट के नीचे एक तकिया लगा कर अपने नितम्ब थोड़े से ऊपर उठा लो और अपनी जांघें चौड़ी कर लो फिर ठीक रहेगा !”

वो झट से मेरे कहे मुताबिक़ हो गई उसे भला क्या ऐतराज़ होता। आप हैरान हो रहे हैं ना ?

ओह ... अगर आप नौसिखिये नहीं हैं तो मेरी इस बात से जरूर सहमत होंगे कि किसी भी कुंवारी गांड को पहली बार बहुत प्यार से मारा जाता है ताकि उसे भी गांड मरवाने में उतना ही आनंद आये जितना उसके प्रेमी को आ रहा है। दरअसल पहली बार गांड मारते समय अपने साथी को कभी भी घोड़ी वाली मुद्रा में नहीं चोदना चाहिए। इस से झटका बहुत तेज़ लग सकता है और गांड की नर्म त्वचा फट सकती है। मैं कतई ऐसा नहीं चाहता था। मैं तो चाहता था कि वो इस गांड चुदाई में इतना आनंद महसूस करे कि जब भी वो अपने पति या प्रेमी से भविष्य में चुदे तो ये लम्हे उसे तमाम उम्र याद रहें और हर चुदाई में वो इस आनंद को याद करके रोमांचित होती रहे।

आप सोच रहे होंगे यार अब बर्दाश्त नहीं हो रहा है। अपना ज्ञान बघारना बंद करो और अंगूर की मटकती गांड में डाल दो अपना पप्पू। क्यों उस बेचारे के साथ अन्याय कर रहे हो ? हमारा तो अब निकालने ही वाला है !

ओह ... चलो ठीक है पर एक बात तो आपको मेरी सुननी ही होगी ! मैं सच कहूं तो लंड गांड के अन्दर चले जाने के बाद तो सारा कौतुक और रोमांच ही ख़त्म हो जाता है। उसके बाद तो बस लंड पर कसाव अनुभव होता है और अन्दर तो बस कुंआ ही होता है।

गांड के छल्ले पर अपने खड़े लंड को घिसने में और अन्दर डालने के प्रयास में लंड का थोड़ा सा टेढ़ा होना, फिसलना और उसके छल्ले का संकोचन और फैलाव देख और अनुभव कर जो सुख और आनंद मिलता है वो भला लंड गांड के अन्दर चले जाने के बाद कहाँ मिलता है। आप तो सब जानते ही हैं मैं इतनी जल्दी उस रोमांच को ख़त्म नहीं करना चाहता था।

अब मैंने भी अपने नितम्बों के नीचे एक तकिया लगाया और अंगूर की जाँघों के बीच बैठ गया। मैंने अपने पप्पू पर खूब सारी क्रीम और वैसलीन लगा ली थी। आप तो जानते ही हैं मेरे लंड का टोपा (सुपारा) आगे से थोड़ा पतला है। ऐसे लंड गांड मारने में बड़े कामगार होते हैं।

मैंने अपना लंड उसकी मटकती गांड के छेद पर लगा दिया। अंगूर के बदन में एक झुरझुरी सी दौड़ गई। उसका शरीर थोड़ा कांपने सा लगा था। ऐसा पहली बार की गांड चुदाई में अक्सर होता है। मैंने अंगूर से एक बार फिर कहा कि वो अपने पूरे शरीर और गांड को ढीला छोड़ दे मैं उसे जरा भी दर्द नहीं होने दूंगा। वो ऐसा करने की भरसक कोशिश कर भी रही थी।

मेरा पप्पू तो अकड़ कर लोहे की रॉड ही बन गया था। मैंने 4-5 बार उसके छल्ले पर अपने सुपारे को रगड़ा। पर मैंने अन्दर डालने की कोई जल्दी नहीं दिखाई तो अंगूर ने अपने दोनों हाथ पीछे किये और अपने नितम्बों को पकड़ कर उन्हें चौड़ा कर दिया। आह ... अब तो उसके नितम्ब फ़ैल से गए और गांड का छेद भी और खुल गया। अब जन्नत के गृह प्रवेश में चंद पल ही तो बाकी रह गए थे।

मैंने हौले से अन्दर की ओर दबाव बनाया। मेरा लंड हालांकि तना हुआ था फिर भी वो थोड़ा सा धनुष की तरह टेढा होने लगा। मेरे जैसे अनुभवी व्यक्ति के लिए यह स्थिति आम बात थी पर एक बार तो मुझे लगा कि मेरा लंड फिसल जाएगा। मैंने अंगूर की कमर पकड़ी और फिर से आगे जोर लगाया तो उसकी गांड का छल्ला चौड़ा होने लगा और ..............

मेरी प्यारी पाठिकाओ और पाठको ! यही वह लम्हा था जिसके लिए लोग कितने जतन करते हैं। धीरे धीरे उसका छल्ला चौड़ा होता गया और मेरे लंड का सुपारा उसके अन्दर सरकने लगा। अंगूर कसमसाने लगी थी।

मैं जानता था यह लम्हा उसके लिए बहुत संवेदनशील था।

मैंने एक हाथ से उसके नितम्ब सहलाने शुरू कर दिए और उसे समझाने लगा :

“अंगूर मेरी जान ! तुम तो मेरी सबसे अच्छी और प्यारी साली हो। आज तुमने तो मुझे उपकृत ही कर दिया है। बस एक बार थोड़ा सा दर्द होगा उसके बाद तो तुम्हें पता ही नहीं चलेगा। बस मेरी जान ... आह .....”

“ऊईईईई ...... अम्म्माआआअआ.................. ईईईईईईईईईईइ.... ”

अंगूर की दर्द और रोमांच मिश्रित चीख सी निकल गई। पर मेरा काम हो चुका था। आधा लंड अन्दर चला गया था।

मेरी प्यारी पाठिकाओ आप सभी को भी बहुत बहुत बधाई हो।

“बस... बस.. मेरी जान हो गया ... अब तुम बिलकुल चिंता मत करो ...?”

“ओह ... जीजू बहुत दर्द हो रहा है ... उईईइ ... माँ आ आ ...... ओह ... बाबू मैं मर जाउंगी ... बाहर निकाल लो ...आह ... !” वो रोने लगी थी।

मैं जानता था यह दर्द तो बस चंद पलों का है। आधा लंड गांड में चला गया अब आगे कोई दिक्कत नहीं होगी। बस थोड़ी देर में ही मेरा लंड अन्दर समायोजित हो जाएगा और उसके छल्ले की त्वचा अपनी संवेदनशीलता खो देगी उसके बाद तो इसे पता भी नहीं चलेगा कि कितना अन्दर है और कितना बाहर है।

“अंगूर तुम बहुत प्यारी हो ... काश तुम मेरी असली साली होती !”

“ओह ... अब हिलो मत ...!” उसने मेरे कूल्हे पर हाथ रखते हुए कहा।

“हां मेरी जान तुम घबराओ नहीं... !”

“क्या पूरा अन्दर चला गया ?”

उसने अपने हाथ से मेरा लंड टटोलने की कोशिश की। मेरा आधा लंड तो अभी भी बाहर ही था। मुझे डर था कि आधा लंड अन्दर जाने पर ही उसे इतना दर्द हुआ है तो वो यह जान कर तो और भी डर जायेगी की अभी आधा और बाकी है। मैंने उसका हाथ हटा दिया और उसके नितम्बों और कमर को हौले हौले सहलाने लगा। दर असल मैं 3-4 मिनट उसे बातों में उलझाए रखना चाहता था ताकि इस दौरान उसका दर्द कम हो जाए और गांड के अन्दर मेरा लंड ठीक से समायोजित हो जाए।

“अंगूर एक बात बताऊँ ?”

“क्या ?”

“तुम बहुत खूबसूरत हो !”

“हुंह झूठे कहीं के ?”

“नहीं अंगूर मैं सच कहता हूँ। मैंने मधुर के साथ भी ऐसा कई बार किया है पर इतना आनंद तो मुझे कभी नहीं मिला !”

कहते कहते मैं उसके ऊपर आ गया और अपने हाथ नीचे करके उसके उरोजों को पकड़ कर मसलने लगा। अंगूर ने अपना सिर थोड़ा सा ऊपर उठाया तो मैंने उसके गालों को चूम लिया। मेरे ऐसा करने पर उसने भी अपने नितम्ब थोड़े से ऊपर उठा दिए।

“तुम सभी मर्द एक जैसे होते हो !”

“वो कैसे ?”

“तुम तो बस अपना मज़ा देखते हो। मुझे कितना दर्द हो रहा है तुम्हें क्या पता ?”

“क्या अब भी हो रहा है ?”

“नहीं अब तो इतना नहीं है ! मैं तो डर ही रही थी पता नहीं क्या होगा !”

“मैंने बताया था ना कि मैं तुम्हें दर्द नहीं होने दूंगा !”

“पर रज्जो तो बता रही थी कि जब उसके पति ने उसकी गांड मारी थी तो उसकी गांड से तो बहुत खून निकला था। वो तो बेहोश ही हो गई थी !”

“अरे उसका पति अनाड़ी रहा होगा। उसे गांड मारना आता ही नहीं होगा !”

“सभी आप जैसे तजुर्बेकार थोड़े ही होते हैं !” कहते हुए वो हंसने लगी।

मैं भी तो यही चाहता था।

प्यारे पाठको ! अब आपको पता चला होगा की गांड कैसे मारी जाती है। मैंने अपना लंड थोड़ा सा बाहर निकला और फिर अन्दर कर दिया। मेरे ऐसा करने पर अंगूर ने अपने नितम्ब ऊपर उठा दिए और फिर तो लंड महाराज पूरे के पूरे अन्दर विराजमान ही हो गए। अब तो अंगूर कभी अपनी गांड के छल्ले को कसती कभी नीचे से अपने नितम्बों को उछालती। मैं हैरान था कि इतनी जल्दी उसका दर्द कैसे ख़त्म हो गया। उसकी गांड में मेरा लंड तो ऐसे लग रहा था जैसे किसी ने मुट्ठी में ही उसे पकड़ कर भींच लिया हो।

दोस्तो ! मैं सच कहता हूँ मैंने अब तक कोई 10-12 लड़कियों और औरतों की गांड मारी है पर अंगूर की गांड तो उन सब में सर्वश्रेष्ठ थी। मैंने मधुर की गांड भी कई बार मारी है पर पहली बार में उसकी और निशा (दो नंबर का बदमाश) की गांड भी इतनी खूबसूरत और नाज़ुक नहीं लगी थी। मैं तो जैसे स्वर्ग में ही पहुँच गया था। अब मैंने हौले हौले धक्के लगाने चालू कर दिए थे। मैंने एक बात का ध्यान जरूर रखा था कि उसके ऊपर मेरा ज्यादा वजन ना पड़े। अब तो अंगूर मीठी सीत्कार करने लगी थी। पता नहीं उसे भी मज़ा आ रहा था या मुझे खुश करने के लिए वो ऐसा करने लगी थी ।

“ओह ... जीजू ... आह ... !”

“क्या हुआ अंगूर ... मज़ा आ रहा है ना ?”

“ओह ... अब कुछ मत बोलो ... बस किये जाओ... आह जरा धीरे ... ओईईईईई.... अम्माआआ ......... जीजू एक बात कहूं !”

“हाँ मेरी प्यारी सालीजी बोलो ?”

कहते हुए मैंने एक धक्का लगाया और उसके कानों की परलिका (लटकन) अपने मुँह में भर कर चूसने लगा। वो तो इस समय जैसे सातवें आसमान पर ही थी।

“मुझे रज्जो ने बताया था कि पहले तो जब उसका पति उसकी गांड मारता था उसे बहुत दर्द होता था और जरा भी अच्छा नहीं लगता था पर अब तो वो इतनी दीवानी हो गई है कि जब तक एक बार गांड में नहीं डलवाती उसे मज़ा ही नहीं आता !”

“हाँ मेरी जान इसीलिए तो इसे जन्नत का दूसरा दरवाजा कहा जाता है !”

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Posted : 16/02/2011 6:14 am
 Anonymous
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“अरे हाँ ... आप सच कह रहे हो मुझे तो अब समझ आया कि अम्मा लंड चूसने में तो बहुत नखरे दिखाती है पर गांड मरवाने को झट तैयार हो जाती है। और जिस रात वो गधापच्चीसी खेलते हैं दूसरे दिन अम्मा और बापू दोनों बड़े खुश रहते हैं। फिर बापू दूसरे दिन अम्मा को मिठाई भी लाकर देते हैं !”

सच पूछो तो उसकी अम्मा की गांड चुदाई की बातों को सुनने में मेरी कोई दिलचस्पी नहीं थी। मैंने अब अपने धक्कों को लयबद्ध ढंग से लगाना चालू कर दिया। अंगूर की मीठी सीत्कार पूरे कमरे में गूँज रही थी। अब तो वो अपने नितम्बों को मेरे धक्कों के साथ इस तरह उछाल रही थी जैसे वो गांड मरवाने में बहुत माहिर हो गई है और कोई प्रतियोगिता ही जीतना चाहती है।

अब मुझे लगने लगा था कि मेरी पिचकारी फूट सकती है। मैंने उसके पेट के नीचे से तकिया निकाल दिया और अपने घुटने उसके नितम्बों के दोनों ओर कर दिए। ऐसा करने से मुझे अपने लंड पर उसकी गांड के छल्ले का कसाव और ज्यादा महसूस होने लगा। मैं कभी उसके गालों को चूमता कभी उसके कानों की लटकन को और कभी उसकी पीठ चूम लेता। मैं एक हाथ से उसके उरोजों को दबाने लगा और दूसरे हाथ से उसकी बुर की फांकों को मसलने लगा। उसकी बुर तो पानी छोड़ छोड़ कर सहस्त्रधारा ही बन चली थी। मैंने उसकी मदनमणि को दबाने के साथ साथ उसकी बुर में भी अंगुली करनी चालू कर दी। मैं चाहता था कि वो भी मेरे साथ ही झड़े।

“ऊईईईईईईइ ... म्माआआआ ............... ईईईईईई....इ”

अंगूर की सीत्कार गूँज गई। उसने अपनी जांघें समेटते हुए जोर जोर से अपने नितम्ब उछालने चालू कर दिए। शायद वो झड़ने लगी थी। मेरी अंगुली ने गर्म और तरल द्रव्य महसूस कर ही लिया था। मैंने भी उसकी चूत में अंगुली करने की गति बढ़ा दी और अपने आखिरी धक्के जोर जोर से लगाने चालू कर दिए।

“अंगूर मेरी जान ... तुमने तो मुझे जन्नत की सैर ही करवा दी। आह ... मेरी जान ... मैं तो ... मैं ... तो .... ग ... गया...... आआआआअ..... ”

और इसके साथ ही मेरे लंड ने भी मोक्ष प्राप्त कर ही लिया। मेरी पिचकारी गांड के अन्दर ही फूट गई। अंगूर तो कब की निढाल हो गई थी मुझे पता ही नहीं चला। वो तो बस नीचे लेटी आँखें बंद किये लम्बी लम्बी साँसें ले रही थी। हम दोनों ने ही मोक्ष का परम पद पा लिया था।

कोई 10 मिनट तक हम ऐसे ही एक दूसरे से लिपटे पड़े रहे। जब मेरा लंड फिसल कर बाहर आ गया तो मैं उसके ऊपर से उठा गया। वो ऐसे ही लेटी रही। उसकी गांड से मेरा वीर्य निकल कर उसकी बुर की ओर प्रस्थान कर उसकी फांकों और चीरे को भिगोने लगा तो उसे गुदगुदी सी होने लगी थी। मैंने उसके नितम्बों पर अपने हाथ फिराने चालू कर दिए और फिर उन्हें थपथपाने लगा तो वो पलट कर सीधी हो गई और फिर एकाएक मुझे से लिपट गई। मैंने उसे फिर से अपनी बाहों में भर लिया। वो उछल कर मेरी गोद में चढ़ गई मैं भला क्यों पीछे रहता मैंने उसे कस कर भींच लिया और उसके अधरों को अपने मुँह में लेकर चूमने लगा। मैंने एक हाथ से उसकी गांड के छेद को टटोला तो उससे झरते वीर्य से मेरी अंगुलियाँ चिपचिपा गई मैंने एक अगुली फिर से उकी गांड में डाल दी तो वो जोर से चीखी और फिर उसने मेरे होंठों को इतना जोर से काटा कि मुझे लगा उनमें से खून ही झलकने लगा होगा ।

मैं उसे गोद में उठाये ही बाथरूम में ले गया। वो नीचे बैठ कर सु सु करने लगी। सु सु करते समय उसकी धार इस बार कुछ मोटी थी और ज्यादा दूर नहीं गई पर संगीत इस बार भी मधुर ही था। उसकी गांड से भी रस निकल रहा था। उसकी बुर की सूजी हुई फांकें देख कर तो मेरा जी एक बार फिर से उसे चोद लेने को करने लगा था। सच पूछो तो उस पहली चुदाई में तो प्रमुख भागीदारी तो अंगूर की ही थी। वो ही मेरे ऊपर आकर करती रही थी। और गांड मारने में भी उतना मज़ा नहीं आया क्यों कि वो भी हमने डरते डरते किया था। मैं एक बार उसे बिस्तर पर लिटा कर ढंग से चोदना चाहता था। उसे अपनी बाहों में जकड़ कर इस तरह पीसना चाहता था कि वो बस इस्स्स्सस्स्स्स कर उठे। और फिर उसकी पनियाई बुर में अपना लंड डाल कर सुबह होने तक उसे अपने आगोश में लिए लेटा ही रहूँ।

हम दोनों ने अपने अपने गुप्तांगों को डिटोल के पानी और साबुन से धो लिया। जैसे ही हम कमरे में वापस आये अंगूर चौंकते हुए बोली,“हाय राम ... दो बज गए ?”

“ओह... तो क्या हुआ ?”

“कहीं दीदी जग गई तो मुझे तो कच्चा ही चबा जायेगी और आपको जरूर गोली मार देगी !”

“तुम्हारे जैसी खूबसूरत साली के लिए अगर मैं शहीद भी हो जाऊं तो अब कोई गम नहीं !”

पहले तो वो कुछ समझी नहीं बाद में उसने मेरे होंठों पर अपना हाथ रख दिया और बोली,“ना बाबू ऐसा नहीं बोलते !”

मैंने उसे फिर से बाहों में भर लेना चाहा तो वो छिटक कर दूर होती बोली,“नहीं बाबू बस अब और तंग ना करो ... देखो मेरी क्या हालत हो गई है। मुझे लगता है मैं 2-3 दिन ठीक से चल भी नहीं पाऊँगी ? अगर मधुर दीदी को जरा भी शक हो गया तो मुश्किल हो जायेगी ! और अनार दीदी को तो पक्का यकीन हो ही जाएगा कि आपने मुझे भी ...?” उसने अपनी नज़रें झुका ली ।

मुझे भी अब लगने लगा था कि अंगूर सही कह रही है। पर पता नहीं क्यों मेरी छठी हिस्त (इन्द्रिय) मुझे आभास दिला रही थी कि यह चिड़िया आज के बाद तुम्हारे हाथों में दुबारा नहीं आएगी। उसकी चूत और गांड की हालत देख कर मुझे नहीं लगता था कि वो कम से कम 3-4 दिन किसी भी हालत में चुदाई के लिए दुबारा राज़ी होगी। आज तो फिर भी कुछ उम्मीद है। पर मैं मरता क्या करता। मैंने तो उसे कपड़े पहनता बस देखता ही रह गया ।

मुझे यूँ उदास देख कर अंगूर बोली,“बाबू आप उदास क्यों होते हो मैं कहाँ भागी जा रही हूँ। बस आज आज रुक जाओ कल मैं फिर आपकी बाहों में आ जाउंगी !”

“हाँ अंगूर ... तुम ठीक कह रही हो !”

“बाबू मैं तो खुद आपसे दूर नहीं होना चाहती पर क्या करूँ ?”

“पर मधुर तो कह रही थी ना कि अब वो तुम्हें यहीं रख लेगी ?”

“मैं तो दासी बनकर भी रह लूंगी उनके पास पर बाबू एक ना एक दिन तो जाना ही होगा ना। मुझे इतने बड़े सपने ना दिखाओ मैं मधुर दीदी के साथ धोखा नहीं कर सकती उनके हम पर बहुत उपकार हैं। वो तो मुझे अपनी छोटी बहन ही मानती हैं। वह आपसे भी बहुत प्रेम करती हैं। बहुत चाहती हैं वो आपको !”

मैं तो उसे देखता ही रह गया। अंगूर तो इस समय कोई नादान और मासूम छोकरी नहीं अलबत्ता कोई बहुत ही समझदार युवती लग रही थी।

उसने अपनी बात जारी रखी,“बाबू आप नहीं जानते अम्मा तो मुझे उस 35 साल के मुन्ने लाल के साथ खूंटे से बाँध देने को तैयार है !”

“क्या मतलब ?”

“ओह ... मैंने आपको मुन्ने लाल के बारे में बताया तो था। वह अनार दीदी का जेठ है। 6 महीने पहले तीसरा बच्चा पैदा होते समय उसकी पत्नी की मौत हो गई थी और अब वो अम्मा और अनार दीदी को पैसे का लालच देकर मुझ से शादी कर लेना चाहता है। वो किसी सरकारी दफ्तर में काम करता है और उसकी ऊपर की बहुत कमाई है !” कहते कहते अंगूर का गला सा रुंध गया। मुझे लगा वो रो देगी ।

मैं क्या बोलता। मैं तो बस मुँह बाए उसे देखता ही रह गया। अंगूर भी जाना तो नहीं चाहती थी पर मधुर को कोई शक ना हो इसलिए उसकी मधुर के कमरे में जाकर सोने की मजबूरी थी। उसने मुझे अंतिम चुम्बन दिया और फिर वो मधुर वाले कमरे में सोने चली गई। जाते समय उसने एक बार भी मुड़ कर मेरी ओर नहीं देखा। उसने ओढ़नी का पल्लू अपने मुँह और आँखों से लगा लिया था। मैं जानता था वो अपने आँसू और बेबसी मुझे नहीं दिखाना चाहती थी।

मेरे प्यारे पाठको और पाठिकाओ ! मैंने आपको बताया था ना कि मेरी किस्मत इतनी सिकंदर नहीं है। फिर वही हुआ जिसका मुझे डर था। अगले 3 दिन तो अंगूर मुश्किल से चल फिर सकी थी। उसके गालों, होंठों, गले, पीठ और जाँघों पर मेरे प्रेम के नीले नीले निशान से पड़ गए थे। पर उसने अपने इस दर्द और प्रेम के निशानों के बारे में मधुर को तो हवा भी नहीं लगने दी थी ।
आज सुबह जब मैं ऑफिस के लिए निकल रहा था तो अंगूर रसोई में थी। मैंने चुपके से जाकर उसे पीछे से अपनी बाहों में भर लिया। वो तो,“उईईईईईई .... अम्माआआ ....” करती ही रह गई। मैंने तड़ातड़ कई चुम्बन उसके गालों और गर्दन पर ले लिए। वो तो बस आह ... उन्ह ... करती ही रह गई। और फिर जब उसने आज रात मेरे पास आ जाने की हामी भरी तब मैंने उसे छोड़ा ।

दिन में मैंने कई तरह की योजनाएँ बनाई कि किस तरह और किन किन आसनों में अंगूर की चुदाई करूँगा। मेरा मन कर रहा था कि जिस तरीके से मैंने मधुर के साथ अपनी सुहागरात मनाई थी ठीक उसी अंदाज़ में अंगूर के साथ भी आज की रात मनाऊंगा। पहले तो एक एक करके उसके सारे कपड़े उतारूंगा फिर मोगरे और चमेली के 15-20 गज़रे उसके हर अंग पर सज़ा दूंगा। उसके पाँव, जाँघों, कमर, गले, बाजुओं और कलाईयों पर हर जगह गज़रों के हार बाँध दूंगा। उसकी कमर के गज़रे की लटकन बस थोड़ी सी नीची रखूँगा ताकि उसकी मुनिया आधी ही ढकी रहे। उसके दोनों उरोजों पर भी एक एक गज़रे की छोटी माला पहना दूंगा। उसके बालों के जूड़े में भी एक गज़रा लगा दूंगा। पूरा बिस्तर गुलाबों की कोमल पत्तियों से सजा होगा और फिर में उसके हर अंग को चूम चूम कर उसे इतना कामातुर कर दूंगा कि वो खुद मेरे लंड को अपनी मुनिया में एक ही झटके में अन्दर समां लेगी। और फिर मैं उसे इतनी जोर जोर से रगडूंगा कि बिस्तर पर बिछी सारी गुलाब और चमेली की पत्तियों के साथ साथ उसकी बुर का भी कचूमर ही निकल जाए। और उन पत्तियों के रस और हमारे दोनों के कामरज में वो बिस्तर की चद्दर पूरी भीग जाए। मुझे तो लगने लगा था मेरा शेर अब मेरी पैंट में ही दम तोड़ देगा ।

मुझे तो लगने लगा था कि मैं जैसे परी कथा का राजकुमार हूँ और वो मेरे ख़्वाबों की शहजादी है। आप हैरान हो रहे होंगे यार एक अदना सी नौकरानी के लिए इतना दीवानापन ? आप शायद मेरे मन की स्थिति और इन बातों को नहीं समझ पायेंगे। पता नहीं मैं अंगूर को इतना क्यों चाहने लगा हूँ। जिस तरीके से वो मेरा और मधुर का ख़याल रखती है हमें तो लगता ही नहीं कि वो एक नौकरानी है। मेरा तो मन करता है बस मैं उसे बाहों में भर कर दिन रात उसे अपने आगोश में लिए ही बैठा रहूँ। कई बार तो यह भी भूल जाने का मन करता है कि मैं एक शादीशुदा, जिम्मेदार और सभ्य समाज में रहने वाला प्राणी हूँ। मैं तो चाहने लगा था कि इसे ले कर कहीं दूर ही चला जाऊं जहां हमें देखने और पहचानने वाला ही कोई ना हो।

एक तो यह मिलने जुलने वालों ने नाक में दम कर रखा है कोई ना कोई हाल चाल पूछने आ धमकता है। खैर आज मैं पूरी तैयारी के साथ जब शाम को घर पहुंचा तो वहाँ जोधपुर वाली मौसी को मधुर के पास विराजमान देख मेरा सारा मूड ही खराब हो गया। उसे मधुर के बारे में पता चला तो वो भी मिलने आ पहुंची थी। जब मैं उनसे मिलकर कमरे से बाहर आया तो अंगूर मेरी ओर देख कर मंद मंद मुस्कुरा रही थी। उसने मेरी ओर अंगूठा दिखाते हुए आँख मार दी तो मैं तो अपना मन मसोस कर ही रह गया। अब तो और 2-3 दिन इस चिड़िया को चोदने का तो बस ख्वाब ही रह जाएगा।

अंगूर भी इन 10-12 दिनों में कितनी बदल गई है। उसकी मासूमियत और किशोरपन तो जैसे मेरे हाथों का स्पर्श पाते ही धुल गया है और उसकी अल्हड़ जवानी अब बांकपन और शौखियों में तब्दील हो गई है। उसका शर्मीलापन तो जैसे पिंघल कर कातिलाना अदा बन गया है। उसके कपड़े पहनने का ढंग, सजने संवरने का तरीका और बोलचाल सब कुछ जैसे बदल गया है। मधु के साथ रह कर तो उसका कायाकल्प ही हो गया है। मुझे तो लगने लगा अगर जल्दी ही अंगूर को मैंने अपनी बाहों में नहीं भर लिया तो मैं पागल ही हो जाऊँगा। दर असल मुझे कहीं ना कहीं मिक्की और सिमरन कि छवि अंगूर में नज़र आने लगी थी।

खैर मौसी को किसी तरह रविवार को सुबह सुबह विदा किया। जब मैं उसे छोड़ने स्टेशन जा रहा था तो मैंने और अंगूर ने आँखों ही आँखों में इशारा किया कि आज दोपहर में जब मधुर सो जायेगी तो साथ वाले कमरे में हम दोनों उस दिन की याद एक बार फिर से ताज़ा कर लेंगे।

जब मैं मौसी को जोधपुर के लिए गाड़ी में बैठा कर वापस आया तो घर पर बम्ब फूट चुक्का था। मधुर के कमरे में गुलाबो और अंगूर दोनों को खड़ा देख कर किसी अनहोनी की आशंका से मेरा दिल बुरी तरह धड़कने लगा। अंगूर कहीं नज़र नहीं आ रही थी। पता नहीं क्या बात थी ? बाद में मधुर ने बताया कि ये दोनों अंगूर को लेने आई हैं। अब गुलाबो ठीक हो गई है और सारा काम वो ही कर दिया करेगी। दरअसल आज दिन में लड़के वाले अंगूर को देखने आने वाले थे। ओह ... बेचारी अंगूर ने पहले ही इस बात का अंदेशा जता दिया था कि उसके घर वाले उसे किसी निरीह जानवर की तरह उस बुढ़ऊ के पल्ले बाँध देंगे। जरूर यह काम अनार ने किया होगा।

मुझे उन दोनों पर गुस्सा भी आ रहा था और झुंझलाहट भी हो रही थी। पैसों के लिए एक छोटी सी बच्ची को 35 साल के उस खूसट के पल्ले बाँध देना तो सरासर अमानवीयता है। अगर पैसे ही चाहियें तो मैं दे देता मेरे लिए यह कौन सी बड़ी बात थी। पर मैं क्या बोलता। मुझे लगा मेरे चहरे को देख कर कहीं मधुर और अनार को कोई शक ना हो जाए मैं कमरे से बाहर आ गया। अंगूर ड्राइंग रूम के साथ बने बाथरूम में थी। मैं उधर ही चला गया। अंगूर की आँखों से झर झर नीर बह रहा था। मुझे देखते ही वो सुबकने लगी। उसकी कातर आँखें देख कर मुझे भी रोना सा आ गया।

“बाबू ... अम्मा और अंगूर दीदी को मना लो ... मैं सच कहती हूँ ... मैं जहर खा कर अपनी जान दे दूँगी पर उस मुन्ने लाल के साथ किसी भी सूरत में शादी नहीं करुँगी।”

“ओह ... अंगूर मैं बात करूँगा .... तुम चिंता मत करो !” मैंने कह तो दिया था पर मैं जानता था मैं कुछ नहीं कर पाऊंगा।

थोड़ी देर बाद अंगूर उनके साथ चली गई। जाते समय उसने बस एक बार मुड़ कर मेरी ओर देखा था। उसकी आँखों से गिरते आंसू तो बस यही कह रहे थे:

एक गहरी खाई जब बनती है तो अपने अस्तित्व के पीछे जमाने में महलों के अम्बार लगा देती है उसी तरह हम गरीब बदकिस्मत इंसान टूट कर भी तुम्हें आबाद किये जाते हैं।

मैं तो बुत बना बस उसे नज़रों से ओझल होते देखता ही रह गया। मैं तो उसे हौंसला भी नहीं दे पाया ना उसके गालों पर लुढ़क आये आंसूं को ही पोंछ पाया। बस मेरे दिल की गहराइयों और कांपते होठों से रसीद सिम्मी का यह शेर जरूर निकला पड़ा :

पलकों से गिर ना जाएँ ये मोती संभाल लो

दुनिया के पास देखने वाली नज़र नहीं है ।

दोस्तो ! आपको यह अंगूर का दाना कैसा लगा मुझे जरूर बताना।

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Posted : 16/02/2011 6:15 am
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