अनिल लीना की ट्यूशन...
 

अनिल लीना की ट्यूशन - चौधरी सर और मैडम  

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मेरा नाम अनिल है. मेरी दीदी लीना मुझसे एक साल बड़ी है. यह तब की कहानी है जब हम एच. एस. सी. के पहले साल में याने ग्यारहवीं में थे. मैं अठारह साल का था. कायदे से तब तक हमें बारहवीं पास कर लेनी थी, और दीदी मुझसे आगे की क्लास में याने कॉलेज में होना चाहिये थी. पर हम दोनों की पढ़ाई लेट शुरू हुई थी, वहां हमारे जरा से छोटे शहर में, जो करीब करीब एक बड़े गांव सा ही था, किसी को हमें स्कूल में डालने की जल्दी नहीं थी और इसलिये हम दोनों को एक ही क्लास में एक साथ भरती कराया गया था.

लीना असल में मेरी एक दूर की मौसी की बेटी है, इसलिये रिश्ते में मेरी मौसेरी बहन सी है. बचपन से रहती हमारे यहां ही थी क्योंकि मौसी जिस गांव में रहती थी वहां स्कूल तो नहीं के बराबर था. मैं उसे दीदी कहता था. आठवीं पास करने के बाद पढ़ाई के लिये हमें शहर में मेरी नानी के यहां भेज दिया गया. नानी वहां उस वक्त अकेली थी क्योंकि नानाजी की मृत्यु हो चुकी थी और नानी का बेटा, याने मेरा मामा अपने परिवार के साथ कुछ साल को दुबाई चला गया था.

दसवीं पास करने के बाद हम दोनों उसी स्कूल के जूनियर कॉलेज में पढ़ने लगे. वहां एक पति पत्नी पढ़ाते थे, चौधरी सर और मैडम. वैसे वे स्कूल में टीचर थे पर साथ साथ कॉलेज में भी लेक्चर लेते थे. वे ट्यूशन लेते थे पर गिने चुने स्टूडेंट्स की. वे पढ़ाते अच्छा थे और उनकी पर्सनालिटी भी एकदम मस्त थी, इसलिये कॉलेज में बड़े पॉपुलर थे.

एक रिश्तेदार से उनके बारे में सुनकर उनकी ट्यूशन हमें नानी ने लगा दी थी. बोली कि एच. एस. सी. के रिज़ल्ट पर आगे का पूरा कैरियर निर्भर करता है और तुम दोनों पढ़ने में जरा कच्चे हो तो अब दो साल मैडम और सर से पढ़ो. हमने बस दिखाने को एक दो बार ना नुकुर की और फ़िर मान गये, सर और मैडम की जोड़ी बड़ी खूबसूरत थी. सर एकदम गोरे और ऊंचे पूरे थे. मैडम मझले कद की थीं और बड़ी नाजुक और खूबसूरत थीं. हमारी उमर ही ऐसी थी कि मैं और दीदी दोनों मन ही मन उन्हें चाहते थे.

पहले ट्यूशन लेने में वे आनाकानी कर रहे थे. मैडम नानी से बोलीं "हम बस स्कूल के बच्चों की ट्यूशन लेते हैं. असल में हम जरा सख्त हैं, डिसिप्लिन रखते हैं, छोटे बच्चे तो चुपचाप डांट डपट सह लेते हैं, ये दोनों अब बड़े हैं तो इन्हें शायद ये पसंद न आये. क्योंकि वही सख्ती हम सब स्टूडेंट्स के साथ बरतेंगे भले वे स्कूल के हों या कॉलेज के."

हम दोनों का दिल बैठ गया क्योंकि हम दोनों उस सुंदर पति पत्नी के जोड़े से इतने इम्प्रेस हो गये थे कि किसी भी हालत में उनकी ट्यूशन लगाना चाहते थे. नानी ने भी उनसे मिन्नत की, बोलीं कि कोई बात नहीं, आप को जिस तरीके से पढ़ाना हो, वैसे पढ़ाइये, इन्हें पीट भी दिया कीजिये अगर जरूरत हो"

नानी ने हमारी ओर देखा. मैं बोला "मैडम, प्लीज़ ... हम कोई बदमाशी नहीं करेंगे ... आप सजा देंगी तो वो भी सह लेंगे"

सर बोले "पर ये लीना, इतनी बड़ी है अब ..."

लीना भी धीरे धीरे बोली "नहीं सर, हम आप जैसे पढ़ाएंगे, पढ़ लेंगे"

आखिर सर और मैडम मान गये, हमारी खुशी का ठिकाना न रहा. बस अगले हफ़्ते से हमारी ट्यूशन चालू हो गयी.

पढ़ने के लिये हम उनके यहां घर में जाते थे, जो पास ही था, बस बीस मिनिट चलने के अंतर पर. धीरे धीरे हमें समझ में आया कि सर और मैडम कितने सख्त थे. हम जूनियर कॉलेज में हों या न हों, सर और मैडम को फ़रक नहीं पड़ता था. वे हमसे वैसे ही पेश आते थे जैसे स्कूल के बच्चों के साथ. मैं मझले कद का था और लीना दीदी भी दुबली पतली थी. बालिग होने के बावजूद हम दोनों दिखने में जरा छोटे ही लगते थे इसलिये सर और मैडम हमें बच्चे समझ कर ही पढ़ाते और ’बच्चों’ कहकर बुलाते थे. कभी कभी कान पकड़कर पीठ पर एकाध घूंसा भी लगा देते थे पर हम बुरा नहीं मानते थे, क्योंकि उस जमाने में टीचरों का स्टूडेंट पर हाथ उठाना आम बात थी, कोई बुरा नहीं मानता था. और सर और मैडम दोनों इतने खूबसूरत थे कि भले उनकी पिटाई या डांट का डर लगता हो फ़िर भी उनके घर जाने को हम हमेशा उत्सुक रहते थे.

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Posted : 10/12/2012 12:36 am
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लीना और मैं, हम दोनों बहुत करीब थे, सगे भाई बहन जैसे इसलिये मुझे दीदी के साथ जरा भी झिझक नहीं होती थी. जवानी चढ़ने के साथ लीना दीदी भी मुझे बहुत अच्छी लगती थी. उसे देखकर अब उससे चिपकने का मन होता था. मैडम तो पहले से ही मुझे बहुत अच्छी लगती थीं. नयी नयी जवानी थी इसलिये रात को उन दोनों के बारे में सोचते हुए लंड खड़ा हो जाता था. अब मैं दीदी से भी छेड़ छाड करता था. जब उसका ध्यान नहीं होता था तब उसे अचानक हौले से किस करता और कभी मम्मे भी दबा देता. दीदी कभी कभी फ़टकार देती थी पर बहुत करके कुछ नहीं बोलती और मेरी हरकत नजरंदाज कर देती, शायद उसे भी अच्छा लगता था. एक दो बार रात को ठंड ज्यादा होने के बहाने से उसकी रजाई में घुसकर मैंने दीदी से चिपटने की भी कोशिश की पर दीदी इतने आगे जाने को तैयार नहीं थी, मुझे डांट कर भगा देती थी. कभी तमाचा भी जड़ देती.

पर वैसे लीना दीदी चालू थी, उसके प्रति मेरा तीव्र आकर्षण उसे अच्छा लगता था, इसलिये जहां वो मुझे हाथ भर दूर अलग रखती थी, वहीं जान बूझकर रिझाती भी थी. अन्दर कुरसी में पढ़ने बैठती तो एक टांग दूसरी पर रख लेती जिससे उसकी स्कर्ट ऊपर चढ़ जाती और उसके दुबले पतले चिकने पैर मुझपर कयामत सी ढा देते. अपनी सफ़ेद रंग की रबर की स्लीपर उंगली पर नचाती रहती. कभी जान बूझकर सबसे तंग पुराने टॉप घर में पहनती जिससे उसके टॉप में से उसके जरा जरा से पर एकदम सख्त उरोज उभरकर मुझे अपनी छटा दिखाते.

एक दो बार मैंने उसकी ट्रेनिंग ब्रा और पैंटी उसकी अलमारी से चुरा कर उसमें मुठ्ठ मारी. वैसे बाद में धो कर रख दी पर उसे पता चल गया, उसने उस दिन मुझे जांघ में अपने बड़े नाखूनों से इतनी जोर से चूंटी काटी कि मैं बिलबिला उठा. चूंटी काटते वक्त मेरी ओर देख रही थी मानों कह रही हो कि ये तो बस जांघ में काटी है, ज्यादा करेगा तो कहीं भी काट सकती हूं. उसके बाद ऐसा करने की मेरी हिम्मत नहीं हुई. पर लगता है कि बाद में दीदी को मुझपर तरस आ गया. एक दिन मुझे बोली कि अनिल, इस प्लास्टिक के बैग में मैंने अपने पुराने कपड़े रखे हैं, वो नीचे जाकर नानी ने जो झोला बनाया है बुहारन को कपड़े देने के लिये उसमें डाल दे, अपने भी पुराने कपड़े ले जा.

मैंने जाते जाते उस बैग में देखा, दीदी के कपड़े और मैं उनमें हाथ ना डालूं! दीदी की सलवार कमीज़ के नीचे एक पैंटी और ब्रा भी थी. पुरानी नहीं लग रही थी, बल्कि वही वाली थी जिसमें मैंने मुठ्ठ मारी थी. मैंने चुपचाप उसे निकालकर अपनी अलमारी में छुपा लिया. बाद में लीना दीदी ने पूछा कि दे आया कपड़े? मैंने हां कहा और नजर चुरा ली. फ़िर कनखियों से देखा तो दीदी मन ही मन मुस्करा रही थी. बाद में उस पैंटी और ब्रा में मैने इतनी मुठ्ठ मारी कि हिसाब नहीं. हस्तमैथुन करता था और दीदी को दुआ देता था.

कहने का तात्पर्य ये कि मुझमें और दीदी में आपसी आकर्षण फटाफट बढ़ रहा था, पर अभी सीमा को लांघा नहीं था. और जैसा आकर्षण मुझे लीना दीदी की ओर लगता था, और शायद उसे थोड़ा बहुत मेरी ओर लगता हो, उससे ज्यादा हम दोनों को सर और मैडम की तरफ़ लगता. पहले हम इसके बारे में बात नहीं करते थे पर एक दिन आखिर हिम्मत करके मैंने दीदी से कहा "दीदी, मैडम कितनी सुंदर हैं ना? फ़िल्म में हीरोइन बनने लायक हैं" तो दीदी बोली "हां मैडम बहुत खूबसूरत हैं अनिल. पर ऐसा क्यों पूछ रहा है? क्या इरादा है तेरा?"

"कुछ नहीं दीदी. मैं कहां कुछ करता हूं? बस देखता ही तो हूं"

"पर कैसे देखता है मुझे मालूम है. अब कोई बदमाशी नहीं करना नहीं तो सर मारेंगे"

"तुझे भी तो सर अच्छे लगते हैं दीदी, झूट मत बोल. कैसे देख रही थी कल उनको जब वे अंदर के कमरे में शर्ट बदल रहे थे! दरवाजे में से मुड़ मुड़ कर देख रही थी अंदर, अच्छा हुआ मैडम तब हमारी नोटबुक जांच रही थीं और उन्होंने देखा नहीं, नहीं तो तेरी तो शामत आ ही गई थी"

दीदी झेंप गयी फ़िर बोली "और तू कैसे घूरता है मैडम को. कल उनका पल्लू गिरा था तो कैसे टक लगा कर देख रहा था उनकी छाती को. तुझे अकल नहीं है क्या? उन्होंने देख लिया तो?"

"वैसे पेयर अच्छा है" मैंने कहा.

दीदी बोली "कौन से पेयर की बात कर रहा है?"

"दीदी, सर और मैडम का पेयर! तुमको क्या लगा? अच्छा दीदी, ये बात है, तुम उस पेयर की बात कर रही थीं जो मैडम की छाती पर है! अब बदमाशी की बात कौन कर रहा है दीदी?"

दीदी मुंह छुपा कर हंसने लगी. वो भी इन बातों में कोई कम नहीं है.

"दीदी, मैडम को बोल कर देखें कि वे हमें बहुत अच्छी लगती हैं? शायद कुछ जुगाड़ हो जाये, एक दो प्यार के चुम्मे ही मिल जायें. मुझे लगता है कि उनको भी हम अच्छे लगते हैं. कल नहीं कैसे चूम लिया था हम दोनों के गाल को उन्होंने, जब टेस्ट में अच्छे मार्क मिले थे?"

"चल हट शरारती कहीं का. कुछ मत कर नहीं तो मार पड़ेगी फ़ालतू में. वैसे तो आज सर ने भी मेरे बाल सहला दिये थे और मेरी पीठ पर चपत मार के मुझे शाबाशी दी थी जब मैंने वो सवाल ठीक से सॉल्व किया था." दीदी बोली. वैसे उसे भी सर और मैडम बहुत अच्छे लगते थे ये मुझे मालूम था. पिछली बार वह चुपचाप उनके एल्बम में से उन दोनों का एक फ़ोटो निकाल लाई थी और अपने तकिये के नीचे रखती थी.

हमारी ये बात हुई उस रात हम दोनों को नींद देर से आयी. मैंने तो मजा ले लेकर मैडम को याद करके मुठ्ठ मारी. बाद में मुझे महसूस हुआ कि दीदी भी सोई नहीं थी, अंधेरे में भले दिखता न हो पर वो चादर के नीचे काफ़ी इधर उधर करवट बदल रही थी, बाद में मुझे एक दो सिसकियां भी सुनाई दीं, मुझे मजा आ गया, दीदी क्या कर रही थी ये साफ़ था.

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Posted : 10/12/2012 12:36 am
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इस बात के दो तीन दिन बाद हम जब एक दिन पढ़ने पहुंचे तो चौधरी सर बाहर गये थे. मैडम अकेली थीं. आज वे बहुत खूबसूरत लग रही थीं. उन्होंने लो कट स्लीवलेस ब्लाउज़ पहन रखा था और साड़ी भी बड़ी अच्छी थी, हल्के नीले रंग की. पढ़ाते समय उनका पल्लू गिरा तो उन्होंने उसे ठीक भी नहीं किया, हमें एक नया सवाल कराने में वे इतनी व्यस्त थीं. ब्लाउज़ में से उनके स्तनों का ऊपरी हिस्सा दिख रहा था. मैं बार बार नजर बचाकर देख रहा था, एक बार दीदी की ओर देखा तो उसकी निगाह भी वहीं लगी थी.

बाद में मैडम को ध्यान आया तो उन्होंने पल्लू ठीक किया पर एक ही मिनिट में वो फिर से गिर गया. इस बार मैडम ने नीचे देखा पर उसे वैसा ही रहने ही दिया. उसके बाद मैडम हमें कनखियों से देखतीं और अपनी ओर घूरता देख कर मुस्करा देती थीं. मेरा लंड खड़ा होने लगा. दीदी समझ गयी, मुझे कोहनी से मार कर सावधान किया कि ऐसा वैसा मत कर.

उसके बाद मैडम ने खुद अपनी छाती सहलाना शुरू किया जैसे उन्हें थोड़ी तकलीफ़ हो रही हो. छाती के बीच हाथ रखकर मलतीं और कभी अपने स्तनों के ऊपरी भाग को सहला लेतीं. अब मैं और दीदी दोनों उनके मतवाले उरोजों की ओर देखने में खो से गये थे, यहां तक कि मैडम को मालूम है कि हम घूर रहे हैं, यह पता होने पर भी हमारी निगाहें वहां लगी हुई थीं. और बुरा मानना तो दूर, मैडम भी पल्लू गिरा गिरा के झुक झुक कर हमें अपने सौंदर्य के दर्शन करा रही थीं.

पांच मिनिट बाद मैडम ने अचानक एक हल्की सी कराह भरी और जोर से छाती सहलाने लगीं.

दीदी ने पूछा "क्या हुआ मैडम?"

"अरे जरा दर्द है, कल शाम से ऐसा ही दुख रहा है. कल हम दोनों मिल कर जरा पलंग उठा कर इधर का उधर कर रहे थे तब शायद छाती के आस पास लचक सी आ गयी है. सर बोले कि आते वक्त दवाई ले आयेंगे"

दीदी ने मेरी ओर देखा. मैडम बोलीं "मालिश करने से आराम मिलता है पर मुझे खुद की मालिश करना नहीं जमता ठीक से. अब सर आयेंगे तब ..."

मैंने दीदी को कोहनी मारी कि चांस है. दीदी समझ गयी. पर मुझे आंखें दिखा कर चुप रहने को बोली. उसकी हिम्मत नहीं हो रही थी कि खुद मैडम को कुछ कहे.

मैडम ने थोड़ा और पढ़ाया, फ़िर उठकर पलंग पर लेट गयीं.

लीना बोली "मैडम, आप की तबियत ठीक नहीं है, हम जाते हैं, कल आ जायेंगे, आप आराम कर लें"

मैडम बोलीं "अरे नहीं, अभी ठीक हो जायेगा. लीना, जरा मालिश कर दे तू ही. जरा आराम मिले तो फ़िर ठीक हो जाऊंगी. सर को आने में देर है, और अभी तो तुम लोगों के दो लेसन भी लेना है"

लीना दीदी ने मेरी ओर देखा. मैंने उसे आंख मार दी कि कर ना अगर मैडम कह रही हैं. दीदी शरमाते हुए उठी. बोली "मैडम, तेल ले आऊं क्या गरम कर के?"

"अरे नहीं, ऐसे ही कर दे. और अनिल, तुझे बुरा तो नहीं लगेगा अगर मैं कहूं कि मेरे पैर दबा दे. आज बदन टूट सा रहा है, कल जरा ज्यादा ही काम हो गया, इन्हें भी अच्छी पड़ी थी घर का फ़र्निचर इधर उधर करने की" वे अंगड़ाई लेकर बोलीं.

मैं झट उठ कर खड़ा हो गया "हां मैडम, कर दूंगा, बुरा क्यों मानूंगा, आप तो मेरी टीचर हैं, आप की सेवा करना तो मेरा फ़र्ज़ है"

मैं साड़ी के ऊपर मैडम के पैर दबाने लगा. क्या मुलायम गुदाज टांगें थीं. लीना उनकी छाती के बीच हाथ रखकर मालिश करने लगी.

मैडम आंखें बंद करके लेट गयीं, दो मिनिट बाद बोलीं "अरे यहां नहीं, दोनों तरफ़ कर, जहां दर्द है वहां मालिश करेगी कि और कहीं करेगी!" कहके मैडम ने उसके हाथ अपने मम्मों पर रख लिये. दीदी शरमाते हुए उनकी ब्लाउज़ के ऊपर से उनकी छाती की मालिश करने लगी. मैंने दीदी को आंख मारी कि दीदी मैं कहता था ना कि मैडम को बोलेंगे तो कुछ चांस मिलेगा. दीदी ने मुझे चुप रहने का इशारा किया. उसका चेहरा लाल हो गया था, साफ़ थाकि उसे इस तरह मैडम की मालिश करना अच्छा लग रहा था.

"ऐसा कर, मैं बटन खोल देती हूं. तुझे ठीक से मालिश करते बनेगी. और अनिल, तू साड़ी ऊपर सरका ले, ठीक से पैर दबा और जरा ऊपर भी कर, मेरी जांघों पर दबा, वहां भी दुखता है"

मैडम ने बटन खोले. सफ़ेद लेस वाली ब्रा में बंधे उनके खूबसूरत सुडौल स्तन दिखने लगे. दीदी ने उन्हें पकड़ा और सहलाने लगी. मैडम ने आंखें बंद कर लीं. कुछ देर बाद लीना दीदी के हाथ पकड़कर अपने सीने पर दबाये और बोलीं "अरी सहला मत ऐसे धीरे धीरे, उससे कुछ नहीं होगा, दबा जरा .... हां ... अब अच्छा लग रहा है, लीना .... और जोर से दबा"

मैंने साड़ी ऊपर कर के मैडम की गोरी गोरी जांघों की मालिश करनी शुरू कर दी. मेरा लंड खड़ा हो गया था. लीना दीदी अब जोर जोर से मैडम के मम्मों को दबा रही थी. उसकी सांसें भी थोड़ी तेज चलने लगी थीं. मेरे हाथ बार बार मैडम की पैंटी पर लग रहे थे. मैडम बीच बीच में इधर उधर हिलतीं और पैर ऊपर नीचे करतीं, इस हिलने डुलने से उनकी साड़ी और ऊपर हो गयी.

मुझसे न रहा गया. मैंने चुपचाप मैडम की पैंटी थोड़ी सी बाजू में सरका दी. दीदी देख रही थी, पर कुछ नहीं बोली. अब वो भी मस्ती में थी. मैडम के मम्मे कस के मसल रही थी. मैडम को जरूर पता चल गया होगा कि मैंने उनकी पैंटी सरका दी है. पर वे कुछ न बोलीं. बस आंखें बंद करके मालिश का मजा ले रही थीं, बीच में लीना के हाथ पकड़ लेतीं और कहतीं ’अं ... अं ... अब अच्छा लग रहा है जरा ..."

मैंने मौका देख कर साड़ी उठाकर उसके नीचे झांक लिया, सरकायी हुई पैंटी में से मैडम की गोरी गोरी फ़ूली बुर की एक झलक मुझे दिख गयी.

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Posted : 10/12/2012 12:36 am
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मुझे ऐसा लग रहा था जैसे स्वर्ग का दरवाजा अब धीरे धीरे खुल रहा है. उस स्वर्ग सुख की मैं कल्पना कर ही रहा था कि अचानक उस कमरे का दरवाजा खुला और सर अंदर आ गये. दरवाजे पर खड़े होकर जोर से बोले "ये क्या चल रहा है?" लगता है वे एक दो मिनिट बाहर खड़े देख रहे होंगे कि अंदर क्या चल रहा है.

हम सपकपा गये और डर के उठ कर खड़े हो गये. मैडम शांत थीं. कपड़े ठीक करते हुए बोलीं "सर ... कुछ नहीं, ये दोनों जरा मेरी मालिश कर रहे थे, आप जल्दी आ गये?"

"ऐसी होती है मालिश? मुझे नहीं लगा था कि ये ऐसे बदमाश हैं. इतने भोले भाले दिखते हैं. मैडम, मैं पहले ही कह रहा था कि इन कॉलेज के लड़कों लड़कियों की ट्यूशन के चक्कर में न पड़ें, ये बड़े बदमाश होते हैं. पर आप को तो तब बड़ा लाड़ आ रहा था." फ़िर हमारी ओर मुड़कर बोले "आज दिखाता हूं तुम दोनों को, चलो मेरे कमरे में" कहकर वे मेरे और लीना के कान पकड़कर बाहर ले गये.

मैडम ने बोलने की कोशिश की "सर ... उनका कोई कुसूर नहीं है ... वो तो .."

"मैडम, मैं आप से बाद में बोलूंगा, पहले इनकी खबर लूं. और आप बैठिये यहीं चुपचाप" मैडम को डांट लगाकर वे खींच कर हम दोनों को बाहर लाये.

बाहर आते समय मैडम पीछे से फ़ुसफ़सा कर मुझे बोलीं "घबरा मत अनिल, सर गुस्से में हैं, माफ़ी मांग लेना तो शांत हो जायेंगे. जैसा वो कहें वैसे करना तो माफ़ कर देंगे, हं सख्त पर दिल के नरम हैं"

बाहर आ कर सर ने दरवाजा बाहर से बंद कर दिया. "क्या हो रहा था ये? बोलो? बदमाशी कर रहे थे ना तुम दोनों?" सर हम पर चिल्लाये.

हम दोनों चुप खड़े रहे. फ़िर मैं हिम्मत करके बोला "नहीं सर, मैडम की तबियत ठीक नहीं थी तो ..."

"तो उनके बदन को मसलने लगे दोनों? क्यों? मैडम इतनी अच्छी लगती हैं तुम दोनों को कि अकेले में उनपर हाथ साफ़ करने लगे?"

"नहीं सर ..."

"क्या मतलब? मैडम अच्छी नहीं लगतीं?" वे मेरे कान पकड़कर बोले. मैं डर के मारे चुप हो गया.

"चुप क्यों है? मैंने पूछा कि क्यों कर रहे थे ऐसा काम तुम दोनों? तू बता अनिल, मैडम अच्छी लगती हैं तुझे, इसलिये कर रहे थे? ..." चौधरी सर मेरे कान को मरोड़ते हुए बोले " ... या और कोई वजह है?" मैं बिलबिला उठा. बहुत डर लग रहा था. न जाने वे मेरी क्या हालत करें.

"सुना नहीं मैंने क्या कहा? मैडम अच्छी लगती हैं?" उन्होंने मेरे गाल पर जोर से चूंटी काटी. बहुत दर्द हुआ. धीमी आवाज में मैं बोला "हां सर"

"क्या पसंद है? उनकी बुर या मम्मे?" मेरे हाथ को पकड़कर वे बोले. मैं डर के मारे उनकी ओर देखने लगा.

"बता नहीं तो इतनी मार खायेगा कि अस्पताल पहुंच जायेगा, चल बोल ... तेरी दीदी मैडम के मम्मे मसल रही थी और तू साड़ी उठाकर मैडम की बुर देख रहा था, इसलिये मैंने पूछा कि क्या अच्छा लगता है तुम लोगों को, बुर या मम्मे?" और कस के मेरा कान और मरोड़ दिया.

"सर... सब अच्छा लगता है सर ..... पर सर जान बूझकर नहीं किया हमने सर"

"अब तुझे पीटूं, तेरी मरम्मत करूं और तेरे घर में बताऊं कि पढ़ाई करने आता है और क्या लफ़ंगापन करता है इधर?" चौधरी सर ने मेरी गर्दन पकड़कर पूछा.

"नहीं सर, प्लीज़, बचा लीजिये, अब कभी नहीं करूंगा" मैं गिड़गिड़ाया.

"और तू लीना? शरम नहीं आती? छोटे भाई के साथ यहां पढ़ने आती है और ऐसा छिनालपन करती है?" चौधरी सर ने लीना दीदी की ओर देखकर कहा.

दीदी तो रोने ही लगी. मुझे मैडम ने बताया था वो याद आया कि सर जो कहें चुपचाप सुनना, उनसे माफ़ी मांग लेना. मैं चौधरी सर के पैर पड़ गया. "सर, बचा लीजिये, आप कहेंगे वो करूंगा"

"और ये छोकरी, तेरी दीदी?" चौधरी सर ने दीदी की चोटी पकड़कर खींची.

"सर ये भी करेगी" मैं दीदी की ओर देखकर बोला "दीदी, बोलो ना"

"हां सर, आप जो कहेंगे वो करूंगी, कुछ भी सजा दीजिये सर, पर घर पर मत बताइये सर ... प्लीज़" दीदी आंसू पोछती हुई बोली.

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Posted : 10/12/2012 12:36 am
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"अच्छा ये बताओ, सच में मजा आता है तुम लोगों को यह सब करते हुए जो मैडम के साथ कर रहे थे?" चौधरी सर ने थोड़ी नरमी से पूछा. "अब सच नहीं बोले तो झापड़ मारूंगा. अच्छा लगता है ना ये सब करते हुए?"

हम दोनों ने सिर हिलाया. "घर में भी करते हो यह सब? एक ही कमरे में सोते हो ना? भाई बहन हो, शरम नहीं आती?" उन्होंने फ़िर से कड़ी आवाज में पूछा.

"नहीं सर, सच में, बस थोड़ा किस विस कर लेते हैं. और कुछ नहीं करते सर घर में. और सर ... सगे भाई बहन नहीं हैं ... मैडम बहुत अच्छी लगती हैं इसलिये गलती हो गयी. " मैंने कहा.

"मैं नहीं मानता. इतने बदमाश हो तुम दोनों! सगे भले न हो पर हो ना भाई बहन ... दीदी कहते हो ... रोज मुठ्ठ मारते हो अनिल तुम? दीदी को देखकर? और क्यों री लीना? तुझे मजा आता है भाई का लंड देखकर? तू इससे चुदवाती होगी जरूर"

"नहीं सर, सच में, प्लीज़ ... मैं सच कह रही हूं सर" लीना फ़िर रोने को आ गयी.

"तो फ़िर? तू भी मुठ्ठ मारती है क्या? मोमबत्ती से? और तूने जवाब नहीं दिया रे नालायक, मुठ्ठ मारता है क्या घर में?" कहकर चौधरी सर ने फ़िर मेरा कान मरोड़ा.

"हां सर, मारता हूं. रहा नहीं जाता सर, खास कर जब से मैडम को देखा है" मैंने कहा.

"लीना देखती है तुझे मुठ्ठ मारते हुए?"

"हां सर ... याने रात को बत्ती बुझाकर मारते हैं सर ... दीदी को पता चल जाता है अक्सर" मैं सिर झुकाकर बोला.

"और ये मारती है तब देखता है तू?" चौधरी सर ने लीना का कान पकड़कर पूछा.

"दिखता नहीं है सर, ये चादर के नीचे करती है, पैंटी में हाथ डालकर. इसकी सांस तेज चलने लगती है तो मेरे को पता चल जाता है" मैंने सफ़ाई दी.

"और तुम? कैसे मुठ्ठ मारते हो? मजा ले लेकर, सहला सहला कर? या बस मुठ्ठी में लेकर दनादन? और क्यों री लीना? किस कैसे करती हो अपने भाई को? करती हो ना?" चौधरी सर ने लीना की पीठ में एक हल्का सा घूंसा लगाते हुए कहा. उसकी बिचारी की बोलती ही बंद हो गयी. "तो अनिल, तूने बताया नहीं कि कैसे मैडम के नाम की मुठ्ठ मारते हो?"

मैंने साहस करके कहा "सर मजा ले लेकर मारता हूं, सहलाता हूं अपने लंड को प्यार से, मैडम का खूबसूरत बदन आंखों के आगे लाता हूं, फ़िर जब नहीं रहा जाता तो ..."

"क्या बदमाश नालायक हैं ये दोनों! जरा वो बेंत तो लाना, कहां गया!" मुड़कर चौधरी सर ने बेंत उठाकर कहा "ये रहा. लगता है कि बेंत के बजाय चप्पल से ही पीटूं तुम दोनों को. इतना पीटूं कि चलने के लायक न रहो नालायको. फ़िर घर जाकर तुम्हारी नानी को सब बता देता हूं"

"नहीं नहीं सर, दया कीजिये, हमें बचा लीजिये" लीना ने भी झुक कर सर का पैर पकड़ लिया.

चौधरी सर कुछ देर हमारी ओर देखते रहे, फ़िर बोले "मैं कहूंगा वो करोगे? जैसा भी कहूंगा, करना पड़ेगा, सजा तो मिलनी ही चाहिये तुम दोनों को"

"हां सर करेंगे" मैं और लीना दीदी बोले.

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Posted : 10/12/2012 12:37 am
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"तुम लोग वैसे हमारे स्टूडेंट हो इसलिये माफ़ कर रहा हूं. तुम को देख के लगता नहीं था कि ऐसे बदमाश निकलोगे. वैसे मैं मानता हूं कि मैडम भी सुंदर हैं, जवानी में उनको देखकर मन भटकना स्वाभविक है पर तुम दोनों को इतनी अकल तो होनी चाहिये कि कहां क्या करना चाहिये! आओ, मेरे बाजू में बैठ जाओ. घबराओ नहीं, मैं नहीं पीटूंगा, कम से कम तब तक तो नहीं पीटूंगा जब तक तुम दोनों मेरी बात मानोगे" बेंत रखते हुए चौधरी सर बोले.

मैं और लीना चुपचाप चौधरी सर के दोनों ओर सोफ़े पर बैठ गये. "दूर नहीं पास आओ, चिपक कर बैठो. मैडम से कैसे चिपके थे तुम दोनों, अब क्यों शरम आती है नालायको?" मेरी और लीना की कमर में हाथ डालकर पास खींचते हुए चौधरी सर बोले.

हम शरमाते हुए घबराते हुए उनसे चिपक कर बैठे रहे.

"अनिल, तुम अपनी ज़िप खोलो और लंड बाहर निकालो" चौधरी सर बोले.

मैं थोड़ा घबरा गया. उनकी ओर देखने लगा. चौधरी सर बेंत उठाने लगे. "तुम लोग सुधरोगे नहीं, तुम्हें तो ठुकाई की जरूरत है, मैंने क्या कहा था? जो कहूंगा वो चुपचाप चूं चपड़ न करते हुए करोगे, अब ऐसे बैठे हो जैसे बहरे हो"

"नहीं सर, सॉरी सर, प्लीज़ ......" कहते हुए मैंने ज़िप खोली और लंड बाहर निकाल लिया. लंड क्या था, नुन्नी थी, डर के मारे बिलकुल बैठा हुआ था.

"अच्छा है पर जरा सा है. तू तो कहता था कि मैडम को देख कर खड़ा हो जाता है! इसको देख कर तो नहीं लगता कि मैडम तुमको अच्छी लगती हैं"

"सर वो अभी .... पहले खड़ा था सर पर अब ..." मैं बोला और चुप हो गया.

"मेरी डांट खाकर घबरा गया, है ना! इसे अब जरा मस्त करो, कैसे इसे खड़ा करके मुठ्ठ मारते हो, जरा दिखाओ" चौधरी सर ने मुझे कहा, फ़िर लीना की ओर देखकर बोले "और लीना, तू कहती है ना कि सिर्फ़ अपने भाई को किस करती है तो करके दिखा किस"

लीना शरमा कर उनकी ओर देखने लगी. फ़िर उठकर मेरे पास आने लगी तो चौधरी सर ने हाथ पकड़कर फ़िर बिठा लिया. "अरे उसे मत तंग करो, उसे मैंने पहले ही काम दे दिया है. लीना, तुम समझो कि मैं ही तुम्हारा भाई हूं और मुझे किसे करके दिखाओ"

लीना घबराकर शरमाती हुई उनकी ओर देखने लगी.

"ऐसे क्यों देख रही हो, मैं इतना बुरा हूं क्या दिखने में कि तेरे को मुझे किस भी नहीं किया जाता?" चौधरी सर ने उसकी ओर देख कर पूछा.

"नहीं सर आप ... मेरा मतलब है ..." लीना को समझ में नहीं आया कि क्या कहे. मैंने दीदी को कहा "दीदी कर ले ना किस, सर तो कितने अच्छे हैं दिखने में, तू नहीं कहती थी मुझसे रोज कि हाय अनिल ... सर कितने हैंडसम हैं ?"

"अच्छा? मैं अच्छा लगता हूं तुझे लीना? फ़िर जल्दी किस करो, परेशानी किस बात की है?" सर बोले.

लीना ने शरमाते हुए चौधरी सर का गाल चूम लिया. "बस ऐसे ही? इसे किस कहते हैं? गाल पर बस जरा सा? नन्हे बच्चे का चुम्मा ले रही है क्या? ये होंठ किस लिये हैं?" चौधरी सर ने डांटा तो लीना ने आखिर उनके होंठों पर होंठ रख दिये. कुछ देर चूमने के बाद वह अलग हुई. उसका चेहरा लाल हो गया था.

"और? मैं नहीं मानता कि तू बस अपने भाई को ऐसे दस सेकंड सूखे सूखे चूमती है. ठीक से कर के बता नहीं तो ..." बेंत को सहलाते हुए चौधरी सर बोले. लीना ने हड़बड़ा कर उनके गले में अपनी बाहें डालीं और फ़िर से उनका चुंबन लेने लगी. इस बार वह एक मिनिट तक उनके होंठों को चूमती रही.

"यह हुई ना बात! अच्छा तेरा भाई भी ऐसे किस करता है कि बैठा रहता है? देखो मैं करके दिखाता हूं" कहकर चौधरी सर ने लीना को पास खींचकर उसके मुंह पर अपना मुंह रख दिया और फ़िर चूमने लगे. जल्द ही वे दीदी के होंठों को अपने होंठों में लेकर चूसने लगे. दीदी ने कसमसा कर अलग होने की कोशिश की पर चौधरी सर ने उसकी कमर में हाथ डालकर पास खींच लिया और पूरे जोर से उसके चुम्बन लेने लगे. दीदी ने एक दो बार छूटने की कोशिश की फ़िर चुपचाप बैठी हुई चुम्मा देती रही.

"ऐसा करता है कि नहीं ये नालायक?" सर ने पूछा. लीना दीदी शरमा कर नीचे देखने लगी. उसके चेहरे पर से लगता था कि सर के चुंबन से उसे मजा आ गया था. सर मुस्करा कर फ़िर दीदी को चूमने लगे.

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Posted : 10/12/2012 12:37 am
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"तेरा लंड खड़ा हुआ कि नहीं नालायक" चौधरी सर ने चुम्मा तोड़कर मुझे पूछा पर अब उनकी आवाज में गुस्से की बजाय थोड़ा सा अपनापन था. दीदी और सर की चूमाचाटी देखकर मेरा लंड आधा खड़ा हो गया था. मैं उसे प्यार से सहलाता हुआ और खड़ा कर रहा था. अब मुझे मजा आने लगा था, डर कम हो गया था. लंड ने सिर उठाना शुरू कर दिया था.

"बहुत अच्छे, पूरा तन्ना कर खड़ा करो" मेरी पीठ थपथपाकर शाबासी देते हुए चौधरी सर लीना दीदी की ओर मुड़े "अच्छा तो लीना, चुम्मे का मजा लेते हुए तेरा ये भाई और कुछ करता है कि नहीं? याने देखो ऐसे!" कहकर उन्होंने फ़िर से दीदी को एक हाथ से पास खींचकर चूमना शुरू कर दिया और दूसरे हाथ से फ़्रॉक के ऊपर से ही उसके मम्मों को सहलाना शुरू कर दिया. इस बार दीदी कुछ नहीं बोली, बस आंखें बंद करके बैठी रही. जरूर उसे मजा आ रहा था.

धीरे धीरे सर ने दीदी के मम्मों को हौले हौले मसलना शुरू कर दिया. "ऐसे करता है या नहीं? इसे अकल है कि नहीं कि अपनी खूबसूरत दीदी का चुम्मा कैसे लिया जाता है!" फ़िर मेरी ओर मुड़कर उन्होंने मेरे खड़े थरथराते लंड को देखा. मैं अब मस्त था, बहुत मजा आ रहा था, दीदी और सर के बीच की कार्यवाही देखकर मेरा लंड पूरा खड़ा हो गया था.

"अब खड़ा हुआ है मस्त. अनिल, काफ़ी सुंदर है तेरा लंड. इसे बस ऐसे ही हथेली से रगड़ते हो या ऐसे भी करते हो?" कहते हुए चौधरी सर ने मेरे लंड को हथेली में लेकर दबाया. फ़िर लंड को मुठ्ठी में लेकर अंगूठे से सुपाड़े के नीचे मसलना शुरू किया. मेरा और तन कर खड़ा हो गया और मेरे मुंह से सिसकी निकल गयी.

"मजा आया?" सर ने मुस्कराकर पूछा. मैंने मुंडी डुलाई. "जल्दी से मस्त करना हो लंड को तो ऐसे करते हैं. मुझे लगा था कि तुझे आता होगा पर तुझे अभी काफ़ी कुछ सीखना है, लेसन देने पड़ेंगे" वे बोले.

उनका हाथ मेरे लंड पर अपना जादू चलाता रहा. वे मुड़कर फ़िर दीदी के साथ चालू हो गये. फ़िर से दीदी की चूंची को फ़्रॉक के ऊपर से मसलते हुए बोले "ब्रा नहीं पहनती लीना तू अभी? उमर तो हो गयी है तेरी."

"पहनती हूं सर" लीना दीदी सहम कर बोली "ट्रेनिंग ब्रा पहनती हूं पर हमेशा नहीं"

"कोई बात नहीं, अभी तो जरा जरा सी हैं, अच्छी कड़ी हैं इसलिये बिना ब्रा के भी चल जाता है. अब बता तेरा भाई ऐसे मसलता है चूंची? या निपल को ऐसे करता है?" कहकर वे दीदी का निपल जो अब कड़ा हो गया था और उसका आकार दीदी के टाइट फ़्रॉक में से दिख रहा था, अंगूठे और उंगली में लेकर मसलने लगे. दीदी ’सी’ ’सी’ करने लगी. वह अब बेहद गरम हो गयी थी. अपनी जांघें एक पर एक रगड़ रही थी.

सर मजे ले लेकर दीदी की ये अवस्था देख रहे थे. उन्होंने प्यार से मुस्करा कर दूर से ही होंठ मिला कर चुंबन का नाटक किया. दीदी एकदम मस्ता गई, मचलकर उसने खुद ही अपनी बांहें फ़िर से सर के गले में डाल दी और उनसे लिपट कर उनके होंठ चूसने लगी.

सर का हाथ अब भी मेरे लंड पर था और वे उसे अंगूठे से मसल रहे थे. मैंने देखा कि अब चौधरी सर का दूसरा हाथ दीदी की चूंची से हट कर उसकी जांघों पर पहुंच गया था. दीदी की जांघें सहला कर चौधरी सर ने उसका फ़्रॉक धीरे धीरे ऊपर खिसकाया और दीदी की बुर पर पैंटी के ऊपर से ही फ़ेरने लगे. दीदी ने उनका हाथ पकड़ने की कोशिश की तो सर ने चुम्मा लेते लेते ही उसे आंखें दिखा कर सावधान किया. बेचारी चुपचाप सर को चूमते हुए बैठी रही. सर चड्डी के कपड़े पर से ही उसकी बुर को सहलाते रहे.

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Posted : 10/12/2012 12:37 am
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दीदी ने जब सांस लेने को चौधरी सर के मुंह से अपना मुंह अलग किया तो चौधरी सर बोले "लीना, तेरी चड्डी तो गीली लग रही है! ये क्या किया तूने? बच्ची है क्या? कुछ बच्चों जैसा तो नहीं कर दिया?"

दीदी नजरें झुका कर लाल चेहरे से बोली "नहीं सर ... ऐसा कैसे करूंगी, वो आप जो .... याने .... " फ़िर चुप हो गयी.

"अरे मैं तो मजाक कर रहा था, मुझे मालूम है तू बच्ची नहीं रही. और इस गीलेपन का मतलब है कि मजा आ रहा है तुझे! क्या बदमाश भाई बहन हो तुम दोनों! पर मजा क्यों आ रहा है ये तो बताओ? क्यों रे अनिल? अभी रो रहे थे, अब मजा आने लगा?" चौधरी सर ने पूछा. उनकी आवाज में अब कुछ शैतानी से भरी थी.

मैं क्या कहता, चुप रहा. "क्यों री लीना? मेरे करने से मजा आ रहा है? पहले तो मुझे चूमने से भी मना कर रही थीं. अब क्या सर अच्छे लगने लगे? बोलो.. बोलो" चौधरी सर ने पूछा.

लीना ने आखिर लाल हुए चेहरे को उठा कर उनकी ओर देखते हुए कहा. "हां सर आप बहुत अच्छे लगते हैं, जब ऐसा करते हैं, कैसा तो भी लगता है" मैंने भी हां में हां मिलाई. "हां सर, बहुत अच्छा लग रहा है, ऐसा कभी नहीं लगा, अकेले में भी"

"अच्छा, अब ये बताओ कि मैं सिर्फ़ अच्छा करता हूं इसलिये मजा आ रहा है या अच्छा भी लगता हूं तुम दोनों को?" चौधरी सर अब मूड में आ गये थे. मैंने देखा कि उनकी पैंट में तंबू सा तन गया था. अपना हाथ उन्होंने अब दीदी की पैंटी के अंदर डाल दिया था. शायद उंगली से वे अब दीदी की चूत की लकीर को रगड़ रहे थे क्योंकि अचानक दीदी सिसक कर उनसे लिपट गयी और फ़िर से उन्हें चूमने लगी "ओह सर बहुत अच्छा लगता है, आप बहुत अच्छे हैं सर"

"अच्छा हूं याने? अच्छे दिल का हूं कि दिखने में भी अच्छा लगता हूं तुम दोनों को" चौधरी सर ने फ़िर पूछा. दीदी का चुम्मा खतम होते ही उन्होंने मेरी ओर सिर किया और मेरा गाल चूम लिया. "क्यों रे अनिल? तू बता, वैसे तुम और तेरी बहन भी देखने में अच्छे खासे चिकने हो"

मैं अब बहुत मस्त हो गया था. सर से चिपट कर बैठने में अब अटपटा नहीं लग रहा था. मेरा ध्यान बार बार उनके तंबू की ओर जा रहा था. अनजाने में मैं धीरे धीरे अपने चूतड़ ऊपर नीचे करके सर की हथेली में मेरे लंड को पेलने लगा था. अपने लंड को ऊपर करते हुए मैं बोला "आप बहुत हैंडसम हैं सर, सच में, हमें बहुत अच्छे लगते हैं. दीदी अभी शरमा रही है पर मुझसे कितनी बार बोली है कि अनिल, चौधरी सर कितने हैंडसम हैं. कल सर जब आप ने इसके बाल सहलाये थे और गालों को हाथ लगाया था तो दीदी को बहुत अच्छा लगा था"

"तेरी दीदी भी बड़ी प्यारी है." सर ने दो तीन मिनिट और दीदी की पैंटी में हाथ डालकर उंगली की और फ़िर हाथ निकालकर देखा. उंगली गीली हो गयी थी. सर ने उसे चाट लिया. "अच्छा स्वाद है लीना, शहद जैसा" लीना आंखें बड़ी करके देख रही थी, शर्म से उसने सिर झुका लिया. "अरे शरमा क्यों रही है, सच कह रहा हूं. एकदम मीठी छुरी है तू लीना, रस से भरी गुड़िया है"

चौधरी सर उठ कर खड़े हो गये. "बैठो, मैं अब तुम्हारी मैडम को बुलाता हूं. तुम दोनों ने जो किया सो किया, तुमको न रोक कर बड़ा गलत कर रही थीं वे, पर अब जाने दो, तुम दोनों भाई बहन सच में बड़े प्यारे हो, तुम्हें माफ़ किया जाता है, मैडम को भी बता दूं. बड़े नरम दिल की हैं वे, वहां परेशान हो रही होंगी कि मैं तुम दोनों की धुनाई तो नहीं कर रहा .... पर उसके पहले ... लीना ... तुम अपनी पैंटी उतारो और सोफ़े पर टिक कर बैठो"

लीना घबराकर शर्माती हुई बोली "पर सर ... आप क्या करेंगे?"

"डरो नहीं, जरा ठीक से चाटूंगा तुम्हारी बुर. गलती तुम्हारी है, मैडम के साथ ये सब करने के पहले से सोचना था तुमको, और फ़िर तेरी चूत का स्वाद इतना रसीला है कि चाटे बिना मन नहीं मानेगा मेरा. अब गलती की है तुमने तो भुगतना तो पड़ेगा ही. चलो, जल्दी करो नहीं तो कहीं फ़िर मेरा इरादा बदल गया तो भारी पड़ेगा तुम लोगों को ...." टेबल पर पड़े बेंत को हाथ लगाकर वे थोड़े कड़ाई से बोले.

"नहीं सर, अभी निकालती हूं. अनिल तू उधर देख ना! मुझे शर्म आती है" मेरी ओर देखकर दीदी बोली, उसके गाल गुलाबी हो गये थे.

"अरे उससे अब क्या शरमाती हो. इतना नाटक सब रोज करती हो उसके साथ, आज दोनों मिल कर मैडम को .... और अब शरमा रही हो! चलो जल्दी करो"

लीना ने धीरे से अपनी पैंटी उतार दी. उसकी गोरी चिकनी बुर एकदम लाजवाब लग रही थी. बस थोड़े से जरा जरा से रेशमी बाल थे. मेरी भी सांस चलने लगी. आज पहली बार दीदी की बुर देखी थी, रोज कहता था तो दीदी मुकर जाती थी. बुर गीली थी, ये दूर से भी मुझे दिख रहा था.

"अब टांगें फ़ैलाओ और ऊपर सोफ़े पर रखो. ऐसे ... शाब्बास" चौधरी सर उसके सामने बैठते हुए बोले. लीना दीदी टांगें उठाकर ऐसे सोफ़े पर बैठी हुई बड़ी चुदैल सी लग रही थी, उसकी बुर अब पूरी खुली हुई थी और लकीर में से अंदर का गुलाबी हिस्सा दिख रहा था. चौधरी सर ने उसकी गोरी दुबली पतली जांघों को पहले चूमा और फ़िर जीभ से दीदी की बुर चाटने लगे.

"ओह ... ओह ... ओह ... सर ... प्लीज़" लीना शरमा कर चिल्लाई. "ये क्या कर रहे हैं?"

"क्या हुआ? दर्द होता है?" सर ने पूछा?

"नहीं सर ... अजीब सा ... कैसा तो भी होता है" हिलडुलकर अपनी बुर को सर की जीभ से दूर करने की कोशिश करते हुए दीदी बोली "ऐसे कोई ... वहां ... याने जीभ ... मुंह लगाने से ... ओह ... ओह"

"लीना, बस एक बार कहूंगा, बार बार नहीं कहूंगा. मुझे अपने तरीके से ये करने दो" सर ने कड़े लहजे में कहा और एक दो बार और चाटा. फ़िर दो उंगलियों से बुर के पपोटे अलग कर के वहां चूमा और जीभ की नोक लगाकर रगड़ने लगे. दीदी ’अं’ ’अं’ अं’ करने लगी.

"अब भी कैसा तो भी हो रहा है? या मजा आ रहा है लीना?" सर ने मुस्कराकर पूछा.

"बहुत अच्छा लग रहा है सर .... ऐसा कभी नहीं .... उई ऽ ... मां ....नहीं रहा जाता सर .... ऐसा मत कीजिये ना ...अं ...अं.." कहकर दीदी फ़िर पीछे सरकने की कोशिश करने लगी, फ़िर अचानक चौधरी सर के बाल पकड़ लिये और उनके चेहरे को अपनी बुर पर दबा कर सीत्कारने लगी. सर अब कस के चाट रहे थे, बीच में बुर का लाल लाल छेद चूम लेते या उसके पपोटों को होंठों जैसे अपने मुंह में लेकर चूसने लगते.

दीदी अब आंखें बंद करके हांफ़ते हुए अपनी कमर हिलाकर सर के मूंह पर अपनी चूत रगड़ने लगी. फ़िर एक दो मिनिट में ’उई... मां ... मर गयी ऽ ...’ कहते हुए ढेर हो गयी, उसका बदन ढीला पड़ गया और वो सोफ़े में पीछे लुढ़क गयी.

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Posted : 10/12/2012 12:37 am
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सर अब फ़िर से जीभ से ऊपर से नीचे तक दीदी की बुर चाटने लगे, जैसे कुत्ते चाटते हैं. एक दो मिनिट चाटने के बाद वे उठ कर खड़े हो गये. उनके पैंट का तंबू अब बहुत बड़ा हो गया था.

"अच्छा लगा लीना? मजा आया?" सर ने पूछा. दीदी कुछ बोली नहीं, बस शरमा कर अपना चेहरा हाथों से छुपा लिया और मुंडी हिलाकर हां बोली.

"अच्छी है लीना तेरी बुर, बहुत मीठी है. जरूर मैडम ने गेस कर लिया होगा कि कैसे मतवाले जवान भाई बहन हो तुम दोनों नहीं तो वो हाथ भी नहीं लगाने देतीं तुम दोनों को. चलो, उन्हें बुलाता हूं, फ़ालतू डांट दिया बेचारी को" कहकर वे उठे और जाकर दरवाजा खोला. मैडम दरवाजे पर ही खड़ी थीं. शायद सुन रही होंगी कि अंदर क्या हो रहा है. बाद में मुझे लगा कि शायद वे की होल से अंदर भी देख रही थीं. मैंने जल्दी दे लंड पैंट के अंदर करके ज़िप लगा ली.

दरवाजा खोलते ही वे अंदर आ गयीं "सुनिये सर, माफ़ कर दीजिये, बच्चे ही हैं, हो जाता है, आखिर जवानी का नशा है. इन्हें पीटा तो नहीं? तुम्हारा कोई भरोसा नहीं, तुमको गुस्सा आ गया एक बार तो ..." वे अब भी उसी हालत में थीं, ब्लाउज़ सामने से खुला हुआ था और ब्रा दिख रही थी. मुझे न जाने क्यों ऐसा लगा कि पैंटी भी शायद नहीं पहनी थी, पर साड़ी के कारण कुछ दिख नहीं रहा था.

"पीटने वाला था, बेंत भी निकाली थी, आज इनका मैं भुरता बना देता, खास कर इस लीना की तो चमड़ी उधेड़ देता, बड़ी है अनिल से, दीदी है इसकी, इसे तो अकल होना चाहिये! पर पता नहीं क्यों, ये इनोसेंट से लगे मुझे, रो भी रहे थे, माफ़ी मांग रहे थे, इन्हें समझाया बुझाया, उस में टाइम लग गया."

"चलो अच्छा किया. आखिर बेचारे नासमझ हैं. पर ये लीना चड्डी उतार कर क्यों बैठी है? और ये अनिल?" मेरे लंड को देखकर मुस्कराते हुए वे बोलीं.

"अरे कुछ नहीं, जरा धमका कर देख रहा था और पूछ रहा था कि ये भाई बहन आपस में क्या करते हैं रात को, इनकी नानी तो बूढ़ी है, सो जाती है जल्दी, है ना अनिल? मैं बस देख रहा था कि अब भी सच कहते हैं या नहीं!" चौधरी सर ने पूछा.

मैडम बोलीं "अब क्या करें इनका?"

"कुछ नहीं, माफ़ कर देते हैं. पर इन्हें काफ़ी कुछ सिखाने की जरूरत है. ऐसा करो तुम लीना को अपने कमरे में ले जाओ और जरा एक पाठ और पढ़ाओ. इनको संभालना, समझाना अब हमारी ड्यूटी है, कहीं बिगड़ गये तो ..."

लीना सिर झुकाकर पैंटी पहनने लगी तो मैडम बोलीं "अरे रहने दे, बाद में पहन लेना. अभी चल मेरे साथ उस कमरे में" और चौधरी सर की ओर मुस्कराते हुए वे लीना दीदी का हाथ पकड़कर ले गयीं. मैं भी पीछे हो लिया तो चौधरी सर मेरा हाथ पकड़कर बोले ’तू किधर जाता है बदमाश? तेरा पाठ अभी पूरा नहीं हुआ है. लीना का कम से कम एक तो लेसन हो गया! और अब मैडम भी लेसन लेने वाली हैं"

मैं घबराते हुए बोला "सर, मैं ... अब क्या करूं?" वहां मैडम ने अपने कमरे में जाकर दरवाजा बंद कर लिया था.

"घबरा मत, इधर आ और बैठ" चौधरी सर ने सोफ़े पर बैठते हुए मुझे इशारा किया. मेरा लंड अब भी खड़ा था, पर अब फटाफट बैठने लगा था. डर लग रहा था पर एक अजीब से सनसनाहट भी हो रही थी दिमाग में. अंदाजा हो गया था कि अब क्या होगा, सर किस किस्म के आदमी थे, ये भी साफ़ हो चला था. पर कोई चारा नहीं था. जो कहेंगे वो करना ही पड़ेगा ये मालूम था.

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Posted : 10/12/2012 12:37 am
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मैं उनके पास बैठ गया तो उन्होंने मुझे कमर में हाथ डालकर पास खींच लिया. "अब बता, लीना की चूत देख कर मजा आया?"

"हां सर"

"आज तक सच में नहीं देखी थी?"

"नहीं सर, आपकी कसम. वो क्या है, दीदी चांस नहीं देती हाथ वाथ लगाने का"

"वैसे उसने नहीं तेरे को हाथ लगाने की कोशिश की? याने यहां? आखिर तू भी जवान है और वो भी" सर मेरे लंड को पैंट के ऊपर से सहलाते हुए बोले.

"नहीं सर, वैसे कई बार मेरा खड़ा रहता है घर में, उसे दिखता है तो टक लगाकर देखती है और मेरा मजाक उड़ाती है लीना दीदी"

अचानक सर ने मुझे खींच कर गोद में बिठा लिया.

"सर, ये क्या ... " मैं घबरा कर चिल्लाया.

"गोद में बैठ अनिल, स्टूडेंट भले सयाना हो जाये, टीचर के लिये छोटा ही रहता है"

बैठे बैठे मुझे उनके लंड का उभार अपने चूतड़ के नीचे महसूस हो रहा था. उन्होंने मुझे बांहों में भर लिया और मेरे बाल चूम लिये. फ़िर मेरा सिर अपनी ओर मोड़ते हुए बोले "अब तू चुम्मा देकर दिखा, लीना ने तो फ़र्स्ट क्लास दिखा दिया."

"पर सर ... मैं तो ... मैं तो लड़का हूं" मैंने हकलाते हुए कहा.

"तो क्या हुआ! ऐसा कहां लिखा है कि लड़के लड़के चुम्मा नहीं ले सकते? वैसे तू इतना चिकना है कि लड़की ही है समझ ले मेरे लिये. अब नखरा न कर, लीना तो पास हो गयी अपने लेसन में, तुझे फ़ेल होना है क्या?"

मैंने कभी सपने में भी नहीं सोचा था कि किसी मर्द के साथ मैं इस तरह की हालत में होऊंगा. मैंने डरते डरते उनके होंठों पर होंठ रख दिये. उन्हें चूमते हुए चौधरी सर ने मेरी ज़िप खोल कर लंड बाहर निकाल लिया और उसे हाथ में लेकर पुचकारने लगे. लंड में इतनी मीठी गुदगुदी होने लगी कि धीरे धीरे मेरी सारी हिचकिचाहट और - ये कुछ गलत हो रहा है - ये एहसास पूरा मन से निकल गया. डर भी खतम हो गया. अब बचा था तो बस लंड में होती अजीब मीठी चाहत की फ़ीलिंग जिसके आगे दुनिया का कोई नियम नहीं टिकता.

पास से मैंने सर को देखा, वे सच में काफ़ी हैंडसम थे. बहुत देर बस सर चूम रहे थे और मैं चुप बैठा था पर आखिर मैंने भी उनके होंठों को चूमना शुरू कर दिया. उनके होंठ मांसल मांसल से थे, पास से सर ने लगाये आफ़्टर शेव की भीनी भीनी खुशबू आ रही थी.

"मुंह बंद क्यों है तेरा? ठीक से किस करना हो तो मुंह खुला होना चाहिये, इससे किस करने वाले पास आते हैं और प्यार बढ़ता है" सर बोले. मैंने अपना मुंह खोला और सर ने भी अपने होंठ अलग अलग करके मेरे निचले होंठ को अपने होंठों में लिया और चूसने लगे. अब मुझे उनके मुंह का गीलापन महसूस हो रहा था, स्वाद भी आ रहा था.

"शाब्बास, अब ये बता कि तू जीभ नहीं लड़ाता अपनी दीदी से? ऐसे ... जरा मुंह खोल तो बताता हूं. तेरी दीदी के साथ भी करने वाला था पर बेचारी बहुत शर्मा रही थी आज पहली बार ... तूने सच में जीभ नहीं लड़ाई अब तक किसी से?" वे एक हाथ से मेरे लंड को और एक से मेरी जांघों को सहलाते हुए बोले.

"नहीं सर, अब तक नहीं ... जब किस भी नहीं किया तो ये तो दूर की बात है"

"कोई बात नहीं, अब करके देख, जीभ बाहर निकाल" वे बोले. मैंने मुंह खोला और जीभ निकाली. सर ने अपनी जीभ भी मुंह से निकाली और मेरी जीभ से लड़ाने लगे. पहले मुझे अटपटा लगा पर फ़िर उनकी वो लाल लाल लंबी जीभ अच्छी लगने लगी. मैंने भी अपनी जीभ हिलाना शुरू कर दी. चौधरी सर ने सहसा उसे अपने मुंह में ले लिया और चूसने लगे

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