आप मुझे अच्छे लगने ...
 

आप मुझे अच्छे लगने लगे  

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 Anonymous
(@Anonymous)
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पिछले अक्टूबर की बात है....

मेरी टीचर वत्सला की सगाई होने वाली थी। वत्सला दीदी पढ़ाई में मेरा पूरा ध्यान रखती थी। मैं उनसे पढ़ने के लिये उनके घर भी जाती थी। मुझे वो अपने साथ इन्दौर ले गई थी। लड़के वाले वत्सला को देखने आने वाले थे। वैसे उनके उन लोगों से पुराने सम्बन्ध भी थे, कारण कि उनके परिवारों का बिजनेस भी एक ही था। सभी लोग शाम का इन्तज़ार कर रहे थे। मैं उन इन्तज़ार करने वालों में एक थी। मुझे भी घरवालों के साथ दुल्हे और उसके घरवालों का स्वागत करना था।

घर के पोर्च में एक स्कोर्पिओ गाड़ी आ कर रुकी, उसमें से मात्र तीन लोग उतरे। हम सभी लपक कर वहां पहुंच गये। एक सजीला छ: फ़ुट का जवान, सुन्दर और हंसमुख, गोरा चिट्टा, काले सूट में बिल्कुल राजकुमार लग रहा था। मैंने थाली से उसे तिलक लगाया, उसने मुझे देखा और मुस्कुरा दिया। मेरी आंखें उससे मिलते ही झुक गई, उसके चेहरे की सुन्दरता मेरे दिल में उतर गई। वो भी जैसे मुझे निहारता ही रह गया। मैं कहीं खो सी गई। सभी अन्दर आ चुके थे। मैं भाग कर सीधे वत्सला के पास पहुंची।

"हाय दीदी ! मैं तो मर गई ! वो बिलकुल कहीं का राजकुमार है !"

"अरे....तू ठीक तो है ना, किसकी बात कर रही है?" वत्सला ने कुछ आश्चर्य से मुझे देखा।

"दीदी.... एक दम गोरा चिट्टा, लम्बा, सुन्दर सा ! हाय दीदी....! क्या कहूं....! दूल्हा है या राजकुमार !"

"मैं जानती हूँ उसे, देखा है मैंने....हां सुन्दर तो है....पर तुझे वो राजकुमार लग रहा है?" मेरी बात को दीदी ने ज्यादा तूल नहीं दिया तो मेरा जोश भी ठण्डा पड़ गया। कुछ ही देर के बाद दीदी सज धज कर कमरे से निकल कर हॉल में आई। दीदी भी आंखे नीची किये धीरे धीरे चलती हुई सोफ़े के नजदीक आ गई। मैंने पहली बार दीदी को इतनी नज़ाकत के साथ चलते हुए देखा। पर दीदी हूर की परी सी लग रही थी। मन में सोचा- देखो तो क्या एक्टिंग करती है !

इसी समय दूल्हे ने मुस्करा कर मुझे देखा। मैं शरमा गई। बातचीत चलने लगी। बातचीत में पता चला कि दूल्हे का नाम सुनील है और वो एक भू वैज्ञानिक है। हम लोग खाने पीने का सामान सजाने लगे, पर किसी ने कुछ खाया पिया नहीं, बस औपचारिकता ही निभा दी। सुनील और दीदी को अकेले में बात करने की आज्ञा मिल गई। उन्हें दूसरे कमरे में ले जाया गया। मैं दरवाजे के पीछे छिप गई, पर सुनील ने मुझे देख लिया था।

"वत्सला.... आप बहुत सुन्दर हैं, पर आपकी सहेली भी आपसे कम नहीं !"

मैं बाहर खड़ी कांप गई। मैंने छिप कर अन्दर देखा, सुनील दीदी को किस कर रहा था। दीदी अपना सुन्दर सा चाँद सा मुखड़ा ऊपर किये उनके चुम्बन का आनन्द ले रही थी।

"सुनील मेरा सपना पूरा हो रहा है, आप मेरे मालिक हो गये हो, अब मैं आपकी दासी हूँ !" दीदी ने झुक कर सुनील के पांव छू लिये। सुनील ने दीदी को उठा कर गले लगा लिया। दीदी रटे रटाये डायलोग बोल रही थी और एक्टिन्ग कर रही थी, जैसा वो मुझे करके दिखाती थी, बिलकुल फ़िल्मी डायलोग लग रहे थे, पर प्यार के शब्द हमेशा नये ही होते हैं, उसमें हमेशा नई ताजगी ही रहती है। मेरे मन में भी तंरगे फ़ूटने लगी और मुख से हाय निकल पड़ी।

वो दोनों प्यार में खोने लगे.... यानी वो पहले से एक दूसरे को जानते थे....और बात पक्की ही थी.... इतने में सुनील की नजर मुझ पर पड़ ही गई। दीदी को बाहों में लिए-लिए उसने मुझे पीछे से हाथ हिला दिया....

मैं शरम से पानी पानी हो गई.... पर हिम्मत करके मैंने बोल ही दिया,"पापा बुला रहे हैं...." फिर धीरे से बोली...."बाकी सगाई के बाद ....!"

दीदी झेंप गई और सुनील से अलग हो गई।

"कामिनी....प्लीज.... किसी को मत कहना...." दीदी के कातर नजरों मुझे देखा।

"दीदी....जब मियां-बीवी राजी तो क्या करेगा काजी....!" मैंने शरारत की.... सुनील मेरी तरफ़ मीठी निगाहों से मुझे देखता रह गया।

दूसरे दिन शाम को सुनील घर आ गया और बाज़ार जाने का प्रोग्राम बना लिया। मुझे भी दीदी ने साथ ले लिया। थोड़ा आगे चलते ही सुनील ने एटीएम बूथ के सामने कार रोक दी। दीदी को बूथ से पैसे निकालने थे।

"जीजू, आप कहाँ रहते हैं?"

" यहीं पास में राजेंद्र नगर में.... लो चॉकलेट लो !" उसने एक फ़ाइव स्टार चॉकलेट निकाली।

पर ये क्या....मेरे बढ़े हुए हाथ को पकड़ कर सुनील ने खींच लिया। मैं पिछली सीट से थोड़ा ऊंचा उठ गई। इतने में सब कुछ तेजी से घट गया। सुनील ने एकदम से मुड़ कर मुझे चूम लिया। और फिर ड्राईविंग सीट पर बैठ गया। मैं घबरा गई, मेरे चेहरे पर पसीना छलक आया। पर मुझे बहुत अच्छा लगा।

"जीजू....ये क्या.... दीदी ने देख लिया तो मुझे घर ही नहीं आने देगी...."

"कामिनी तुम हो ही इतनी प्यारी और मासूम....कि बस दिल ने कहा कि प्यार तो कर ही लो...." सुनिल बड़ा दिलफ़ेंक निकला....

"धत्त....जीजू.... आप तो बस !" मेरे दिल में एक मीठी सी हूक उठी।

"कल यहीं बूथ पर दिन को ठीक ११ बजे मिलना, नहीं तो मैं घर पर आ जाऊंगा !"

मैं घबरा उठी....ये क्या ?

"नही....नहीं.... " इतने में दीदी आती दिख गई,"अच्छा ....अच्छा ठीक है !" मेरा बदन पसीने से भीग गया।

"क्या हुआ.... तेरी तबियत ठीक तो है ना?" दीदी ने मुझे देखते कहा।

"हां हां.... चलो, ठीक है !" मैं अपने आपको कंट्रोल करने लगी। शीशे में सुनील अपनी मीठी मुस्कान बिखेर रहा था। मेरी तरफ़ देखकर मुस्कराना मुझे और नर्वस कर रहा था। मुझे लगा कि दीदी मुझ पर इतना विश्वास करती है, ये तो धोखा होगा। पर सुनील का मुझ पर लाईन मारना बन्द नहीं हुआ। सच तो ये था कि मुझे भी ये सब अच्छा लगने लगा था।

मैं ठीक ११ बजे दिन को एटीएम पर आ गई पर कोई कार आती दिखाई नहीं दी।

"हाय !" सुनील ने पीछे से मुझे पुकारा।

मैं उछल पड़ी,"आप....! पर कार?"

वो मुस्कुरा उठा और इशारा किया।

"ओह.... " मेरा दिल धक धक कर रहा था। सुनील ने कार का दरवाजा खोला और मुझे आदर सहित अन्दर बैठाया।

"आपके आने का शुक्रिया !" दूसरी ओर से ड्राइविंग सीट पर आ गया। आते ही कार के शीशे ऊपर दिये और मुझे खींच कर अपने पास चिपका लिया। उसने अपने होंठो से मेरे कांपते होंठ मिला दिये। मुझे किसी लड़के ने जिन्दगी में पहली बार किस किया था। मुझे जाने कैसा लगने लगा। मैं बिना किसी विरोध के उसे किस करने दिया। उसके हाथ मेरे उरोजो पर आकर जम गये और हौले हौले उसे दबाने लगे, मैं बैचेन हो उठी, कसमसा उठी, मेरा मन कर रहा था कि मेरी छातियों के गोले वो मसलता ही जाये।

"सुनील क्या कर रहे हो ....यहाँ मत हाथ लगाओ !" मुझे ये सब अजीब सा, लेकिन कशिश भरा लग रहा था.... जाने कैसा एक मीठा मीठा सा वासनायुक्त आनन्द भी आ रहा था। तभी सामने से कोई गाड़ी आ गई।

"अरे भई....! ये सब घर जा कर करना !" साथ बैठी हुई औरत भी मुस्करा उठी। सुनील झेंप गया और जल्दी से उसने मुझे छोड़ दिया। मैंने उस कार वाली को हाथ हिला दिया, उसने भी मुस्कुरा कर हाथ हिला कर उत्तर दिया। सुनील ने कार स्टार्ट की और चल दिया। मेरे बाल उलझ गये थे, सारा कुछ अस्त व्यस्त हो गया था। मैंने बैग में से सामान निकल कर अपने आपको फिर से ठीक किया। मैं बार बार सुनील को देख रही थी। विश्वास नहीं हो रहा था कि ये सब मेरे साथ हो रहा है?

कुछ ही देर में हम एक फार्म-हाउस में थे। मैं डर रही थी कि ना जाने अब क्या होगा? ये सुनील क्या करेगा, पर यदि कुछ नहीं करेगा तो मैं उससे कभी बात नहीं करुंगी। अन्दर जाने पर उसने अपना फार्म-हाऊस दिखाया और कुछ ही देर में एक अन्धेरा कमरा पा कर मेरे से लिपट पड़ा। मैंने सुनील को पूरा मौका दिया कि वो इसका पूरा फ़ायदा उठा ले।

"नहीं सुनील !....प्लीज....नही.... !" मैं उससे विनती करने लगी.... पर उसने मुझे प्यार से पास पड़े बिस्तर पर लेटा दिया और मेरे ऊपर धीरे से लेट गया, उसका कठोर लण्ड मेरी चूत पर आ लगा। मैं कसमसा कर उल्टी लेट गई। पर उसने मुझे कब्जे में कर लिया और लण्ड मेरी गाण्ड में गड़ा दिया। मेरे दोनो स्तन अब उसके हाथो में थे सभी कुछ वो बड़े प्यार से कर रहा था। मैंने घबरा कर रोने का नाटक करने लगी।

"अरे....रे.... रो मत कामिनी, मुझे माफ़ कर दो .... प्लीज !" और वो जल्दी से अलग हो गया। मैंने अपने आप को सयंत किया और लगा कि जैसे मस्ती छिन गई हो।

"सुनील ....तुम क्या दीदी के साथ भी इसी तरह जबर्दस्ती करोगे?" मैंने उसकी और देखा तो वो मुझे बहुत ही मायूस लगा, पर मैं उसे उदास नहीं करना चाह रही थी।

"सॉरी कहा ना.... ! तुम हो ही इतनी प्यारी कि तुम्हें देखते ही कोई भी होश खो बैठे !" उसने मेरे कपड़े ठीक किये और हम कमरे से बाहर निकल पड़े। वहां खड़े हो कर वो बताता रहा कि कहा क्या क्या है। पर मेरी नजरें उसके चेहरे पर लगी रही, सुन्दर सा चेहरा, मासूम सा.... ही-मैन जैसा, मेरा दिल पिघलने लगा। मुझे लगा कि वो मुझे प्यार करता है। मेरा क्या बिगड़ जाता अगर वो मेरे अंग मसल देता तो? उसे खुशी मिल जाती.... और क्या। इस बार मैं उसे जो वो करेगा करने दूंगी, यह सोच कर मैं उसके पास खिसक आई और धीरे से उसकी कमर में हाथ डाल दिया। वो बोलते बोलते अचानक रुक गया...."क्या कर रही हो कामिनी?"

"मुझे माफ़ कर दो सुनील.... मैंने तुम्हारा दिल दुखाया !" मैंने उसकी चौड़ी छाती पर अपना सर रख दिया।

"नहीं कामिनी, मैं गलत था.... मुझे ऐसा नहीं करना चाहिए था ! पर दिल भी क्या चीज़ है....है ना?" पर मैं अब कुछ नहीं सुन पा रही थी। मेरे हाथ उसके चूतड़ो पर कसने लगे थे। सुनील भी एक बार फिर बहक उठा.... उसके हाथ मेरे शरीर पर फ़िसलने लगे थे। पर मुझे अब सबकुछ भला लग रहा था। मेरे चूतड़ दबाते ही मेरे अंग अंग फ़ड़कने लगे, छाती मसलते ही नीचे गीलापन आने लगा। वो मेरे से लिपट पड़ा। मेरे हाथ उसके लण्ड की तरफ़ ना चाहते हुए भी बढ़ने लगे और पैन्ट के बाहर ही मेरे हाथों की गिरफ़्त में आ गया। हाय....इतना मोटा और लम्बा.... लण्ड इतना बड़ा होता है क्या ? लड़कियाँ क्या इतने मोटे लण्ड से चुदती हैं?

"कामिनी प्लीज इसे मत छेड़ो, नहीं तो फिर कुछ करना पड़ जायेगा...." उसका लण्ड मस्त हो उठा। कड़क होकर फ़ुफ़कारने लगा।

"मेरे सुनील, हाय.... ये इतना मोटा? क्या लण्ड है?" मैंने जवान लण्ड का पहली बार स्पर्श किया था।

"चुप !!! " मेरे होठों पर उसने गाली सुनते ही अंगुली रख दी, मेरा कुर्ता सुनील ने ऊंचा उठा दिया और पजामा नीचे फ़र्श पर गिरा दिया। मैं नीचे से नंगी हो गई। मेरे दिल में चुदाई का नशा चढ़ने लगा। मुझे अपने नंगेपन का अहसास रोमंचित करने लगा। उसने अपना लण्ड बाहर निकाल लिया और मेरी चूत से सटा दिया। लण्ड का स्पर्श पाते ही मेरी चूत फ़ड़क उठी।

मेरा मन कर रहा था कि सुनील चूत में घुसा दे ! हाय रे लण्ड....! उसने मेरे चूतड़ों पर हाथ रखा और जोर लगाने लगा। चूत गीली और चिकनी हो रही थी। लण्ड फ़च से जरा सा अन्दर घुस पड़ा। मेरे मुख से हाय निकल पड़ी।

"बाबू जी....खाना तैयार है....!" मुझे एक आवाज सुनाई दी। आवाज सुनते ही मेरा सारा नशा उड़ता नजर आने लगा। मैं छिटक कर दूर हो गई।

"ये क्या कर रहे थे, अभी तो मांऽऽऽ रीऽऽऽ अन्दर ही घुसा देते !" मुझे भी एकदम से शरम आ गई। मैंने तुरन्त कपड़े ठीक से पहने और सुनील भी सम्भल गया। अब वो अपनी रोज की मुस्कान के साथ नीचे चल पड़ा। मैं भी शर्म से सर झुका कर सीढ़यां उतरने लगी। मन में सोचने लगी कि हाय मैं कितनी बेशरम हो गई थी।

रात की बस से मैं भोपाल वापस आ गई। इन्दौर से आने के बाद मैं अनमनी सी रहने लगी। ये सब मेरे साथ पहली बार हुआ था। किसी लड़के ने मुझे पहली बार छुआ था। मैं पहली बार बह गई थी। पहली बार जवानी का उबाल सर पर चढ़ कर बोला था। धीरे धीरे दिन बीतने लगे। दिल भी धीरे धीरे शान्त हो गया। पर एक दिल में चुभन, एक कसक रह गई थी। मुझे कभी कभी ये लगता कि काश सुनील ने मुझे चोद दिया होता। उसका लण्ड एक बार तो मेरी चूत में घुस ही चुका था। बस मन करता था कि पूरा ही घुस जाये। रात को मैं उत्तेजित होकर कभी बैंगन तो कभी उंगली का सहारा लेकर अपनी सारी गर्मी बाहर निकाल देती थी।

वत्सला की शादी का दिन भी आ गया। उसने भोपाल की नौकरी छोड़ दी थी।

मुझे एक बार फिर से इन्दौर जाना पड़ गया। दिसम्बर के पहले सप्ताह में शादी थी।मैं सुनील से मिलना तो चाहती थी पर इस बार मैं सुनील से बचती रही। पर वत्सला के साथ रहने से मैं उसकी नजरों में आ ही जाती थी। मन कसक बढ़ती ही जा रही थी। शादी के कारण सुनील को भी समय नहीं मिल पाया। पर अन्दर ही अन्दर मैं उसे देखने और मिलने को तड़पती रही। पर मन को कठोर बना कर उनके बीच में नहीं आई। मन तो मिलने को तड़प गया था। शादी के कार्यक्रम समाप्त होते ही मैं तुरन्त फिर से भोपाल आ गई। शायद सुनील की नजरें भी मुझे तलाशती रह गई होगी।

जनवरी में मुझे इन्दौर आना हुआ। मन में दुआ कर कर रही थी कि सुनील मुझे इन्दौर में मिल जाये और बस एक बार मैं जी भर कर प्यार कर लूं और हो सके तो चुदा लूं। वत्सला ने मुझे अपने घर में ही ठहरा लिया। मुझे नहीं पता था कि सुनील उन दिनो इन्दौर आया हुआ था, बस सुनील के बारे में मैं ये जानकर मैं खुशी से पागल हो गई।

मैं वत्सला के गेस्ट रूम में ठहरी थी। मुझे बेसबरी से सुनील का इन्तज़ार था। शाम को सुनील घर आ चुका था। मुझे देख कर गेस्ट रूम में आ गया। उसे देखते ही मैं पिघल गई। मेरा मन कर रहा था कि उसके गले लग जाऊं और वो मेरा शरीर भींच डाले। खुदा मेरी सुन ली और सब कुछ अपने आप ही होने लगा।

हाय....कामिनी ! कैसी हो, कब आई?

आज ही, आप तो आसाम गए हुए थे ना....?

-हां छुट्टी पर आया हूँ, और कहते हुए सुनील ने अपनी बाहें खोल दी, मैंने अपना सर झुका लिया। उसने आगे बढ़ कर मुझे बाहों में कस लिया.... और एक गहरा चुम्मा ले लिया। मेरे मन में फिर से भावनाये तड़पने लगी और जागने लगी। इस बार मैंने भी शरम छोड़ कर प्रत्युत्तर में उसे गहराई से चूम लिया।

- लव यू डियर। सुनील ने अपने प्यार का इजहार किया।

- लव यू टू। मैंने भी इकरार कर लिया।

उसने मेरे उरोज दबा दिये और धीरे धीरे सहलाने लगा। मेरे चूचक कड़े होने लगे, शरीर में गुदगुदी सी भरने लगी। मैंने भी प्रति-उत्तर में अपनी छातियां उसके हाथों में दबा दी और सिसक उठी। मैंने उसके चूतड़ो को दबा कर सहलाना आरम्भ कर दिया था। उसका लण्ड कठोर होने लगा और मेरी चूत पर गड़ने लगा था। मैंने उसका लण्ड हाथ में भर लिया। उसके मुख से सिसकारी निकल पड़ी। वो प्यार से मुझे देखने लगा।

-कामिनी आज की रात अपनी रिजर्व रही?

- कर ही क्या सकते हैं? वत्सला है ना !

- चुपके से, ठीक है ना !

मैं मुस्कुरा उठी, मेरे मन में चुदने की चाह उठने लगी, सोच कर ही चूत पनीली होने लगी। पर मन नहीं माना। कैसे होगा? सुनील जैसे ही बाहर गया। इतने में मैंने कुछ सोच लिया था। मैंने वत्सला को सबकुछ बताने की ठान ली थी और फिर रात की बस से भोपाल चले जाने का फ़ैसला कर लिया। मन से मैं वत्सला को धोखा नहीं देना चाहती थी। उसका मुझपर गहरा विश्वास था। मैंने वासना को मन में पीछे धकेला।

मैं वत्सला के पास गई- दीदी, मुझे कुछ कहना है !

-हां कहो, क्या बात है?

- आप नाराज हो जायेंगी !

- समझ गई, जरूर सुनील ने कुछ गड़बड़ किया होगा, है ना? मैंने सर हिला कर हां कह दिया।

- पर दीदी, वो मुझ से प्यार करने लगे है, मैं आपको ये बताना चाह रही थी कि .... मेरी बात काटते हुए वो बोली- अच्छा तो बात यहां तक पहुंच गई? अच्छा अब क्या करोगी? वत्सला ने मुझे तिरछी नजरों से देखा।

- उन्होंने मुझे रात के लिए कहा है ! उन्हें मना करो ना। मैंने झिझकते हुये दिल कड़ा करके कह ही दिया।

- चल तो क्या हुआ? एक ही रात की तो बात है। उसने शरारत भरी हंसी सुनाई दी।

- जी? दीदी आप ये कह रही हैं? मैं विस्मित हो उठी, और उसका मजाक समझ में नहीं आया।

- मुझे सब पता है, तुम दोनों की आशिकी के बारे में, अब बनो मत। मुझे सुनील सब बता देता है - वत्सला प्यार से मुझे देखने लगी।

- तो क्या सुनील रात को मेरे साथ....

- तुम्हारा मन सच्चा और साफ़ है, तुमने आगे हो कर मुझे बताया है, तुम मेरी प्यारी सहेली हो। वत्सला मेरी बात से खुशी से भर गई।

-दीदी, पर वो तो तुम्हारे सब कुछ है ना....फिर?

- सब कुछ में से तुम भी कुछ ले लो....बस। उसी ने तुम्हें यहाँ रुकने के लिये कहा था, और मन की बात बताई थी, अब तुम तो गई काम से, ये रात कामिनी की चुदाई के नाम ! - वो हंस पड़ी।

मैं शर्म से दीदी से लिपट गई। डिनर के बाद मैं अपने कमरे में आ गई और ड्रेस बदल ली और पजामा और टॉप पहन लिया। डिनर के बाद सुनील और वत्सला मेरे कमरे में आ गये...."तो मेरी प्यारी सहेली, चुदने को तैयार हो? मेरी शुभकामनायें तुम दोनों के साथ हैं ! आज की रात सुनील को कामिनी और कामिनी को सुनील दिया तोहफ़े में वत्सला ने !"

-तुम्हारी दीदी ने तुम्हें चोदने की आज्ञा दे दी है, अब अपने चूत के द्वार खोल भी दो !" सुनील बेशर्मी से नेहा के सामने ही कहने लगा।

- धत्त, ये क्या कहते हो ! और मैं उसे घूंसे मारने लगी....उसने मेरा हाथ पकड़ लिया और मुझे बिस्तर पर गिरा दिया। मैं आज पूरी तैयारी में थी और चुदने का मूड बना लिया था। मेरा रोम रोम वासना में झुलस रहा था। उसका लण्ड पजामें में से उभर कर बाहर दिखने लगा था।

-कामिनी ! इसे देख ! लगता है पजामा फ़ाड़ देगा, पकड़ ले इसे !" वत्सला ने सुनील के लण्ड पर हाथ रख कर कहा।

-दीदी, नहीं शरम आती है !" पर मैंने दीदी के सामने हिम्मत करके लण्ड पकड़ ही लिया। दीदी मुस्करा उठी।

- दीदी का दिल कितना बड़ा है ! मेरे मुंह से निकल पड़ा।

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Posted : 04/12/2010 8:03 am
 Anonymous
(@Anonymous)
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- उसका तो दिल, बोबे, चूतड़ सब बड़े हैं। मेरा तो बस लण्ड ही बड़ा है। सुनील ने हंसते हुए माहौल हल्का कर दिया।

सुनील के हाथ मेरी कमर से होते हुए टॉप के अन्दर सरकते हुए मेरे बोबे की तरफ़ बढ़ने लगे। दीदी ने देखा कि मामला गरम हो रहा है तो गुडनाईट कह कर वहां से जाने लगी, मैं वत्सला को देखती रह गई। दीदी मुड़ कर बाहर निकल गई और दरवाजा बन्द कर दिया।

मेरे बोबे सुनील के हाथों में खेल रहे थे। मैं पसीने में नहा गई। उसने मेरा टॉप उतार डाला और मेरे स्तन नंगे हो गये। मैंने तुरन्त अपने दोनों हाथो से उन्हें छुपा लिया और पास में पड़ा कपड़ा छाती पर डाल लिया। सुनील ने अपना पजामा उतार दिया। उसका फ़ड़कता हुआ लण्ड बाहर निकल कर झूमने लगा। उसने बाहर से ही मेरी चूत को सहला दिया। उसका लण्ड देख कर मैं तो पगला गई। उसने मुझे बाहों में भर लिया और अपनी कमर मेरी चूत की तरफ़ दबा दी। उसका लौड़ा जोर मार रहा था और मेरी चूत पर रगड़ मार रहा था। मैं भी अपनी चूत को उभार कर उसके लण्ड से घिसने लगी.... जिस्म पिघलने लगे....दिलो में प्यार उमड़ पड़ा। मेरा पजामा भी जाने कब उतर गया। पूरा कमरा आहों से गूंज उठा। वासनायुक्त सिसकारियाँ हम दोनों के मुख से निकलने लगी। चूत के द्वार पर ठोकर मारते हुए उसका लण्ड मेरी चूत में उतरने लगा।

जिसका मुझे इन्तज़ार था वो पल आ गया था। उसका लण्ड मेरे चूत की प्यास बुझाने को आतुर था। मुझे तो जैसे जन्नत मिल गई थी। चूत की दीवारों पर सुनील के लौड़े की रगड़ से मेरे तन मन में उत्तेजना की मिठास भरने लगी। मैं सुनील को अपने में खींच कर समाने का प्रयत्न करने लगी।

लगता था कि लण्ड और गहराई तक चोद दे.... सुनील मुझे प्यार से जड़ तक चोद रहा था। उसकी आंखें बन्द थी। मैं भी खुमारी में झूम रही थी। सुनील की कमर आगे पीछे चल रही थी। उसकी मर्दानगी मुझे पानी पानी किये दे रही थी। मुझ पर खुशियों की बरसात हो रही थी....मेरा तन रह रह कर वासनायुक्त मिठास से भर उठता था।

पलंग भी चरमरा उठा। मेरी टांगे ऊपर उठी हुई थी। उसका लण्ड मेरी दोनो टांगो के बीच चूत में फ़िट था। दो जिस्म एक होने की जी तोड़ कोशिश कर रहे थे। जबरदस्त धक्के दोनो तरफ़ से लग रहे थे। चूत लण्ड को पूरा निगलना चाह रही थी और लण्ड चूत को फ़ाड़ कर अपना हक जमाना चाहता था। और.... और....लगा कि जैसे एक बिजली हम पर गिर पड़ी !

और मैं जैसे चीखते हुए निचुड़ सी गई, मेरा सारा रस निकलने लगा। तभी सुनील भी ऐंठ कर और लण्ड का जोर लगा कर अपना वीर्य उगलने लगा। हम दोनों तरावट में डूब गये और अपना रस चूत में मिलाने लगे। दोनों का मिला जुला रस चूत से बाहर निकलने लगा। अधखुली आंखों से हमने एक दूसरे को देखा और फिर से प्यार की दुनिया में खो गये....

हम बहुत खुश थे। हमारे जिस्म एक हो चुके थे। अब हम दोनों प्यार की कसमें खाने लगे....जान न्यौछावर करने की बातें होने लगी और.... सुनील का लण्ड एक बार फिर से कठोर होने लगा....मेरी चूत में भी कुलबुलाहट होने लगी। बिना किसी इन्तज़ार के हमारा दूसरा दौर चालू हो गया....

पर इस बार निशाना गोल गोल चूतड़ थे.... मेरी ग़ाण्ड में लण्ड जाना सुई में धागा पिरोने जैसा था। मेरी ग़ाण्ड भी पहली बार चुदने जा रही थी। टाईट छोटा सा छेद और लण्ड उसके सामने मोटा और भारी भरकम था.... पर जानकार धागा पिरोना जानते थे.... दर्द भरी चीख के साथ मैं चुदने लगी, चुदती रही और मेरी गाण्ड भी चुद गई।

सवेरे वत्सला चाय लेकर रूम में आ गई। मैं बाथरूम में थी। सुनील शान्त पड़ा सो रहा था और अभी भी नंगा था। मैं बाथरूम से बाहर आई तो वत्सला को देख कर चौंक गई और एकदम से शरमा गई। मैंने अपना चेहरा हाथो में छुपा लिया। भाग कर डाइनिंग रूम में आ गई। कुछ देर बाद वत्सला वहाँ आई,"कामिनी, मजा रहा ना?" शरारत से उसने पूछा।

"दीदी !! कुछ मत कहो !! चुप हो जाओ !" मैं फिर से शरमा गई।

"रात भर चुदी हो ना, अच्छा बताओ ! क्या क्या किया?"

"बता दूँ? - जीजाजी बहुत प्यारा चोदते हैं....लण्ड भी बहुत प्यारा और गोरा है।"

"हाँ हाँ, ये तो मुझे पता है। और क्या?"

"तीन बार चुद गई और एक बार....!!!"

"क्या एक बार ? समझ गई ! सुनील ने तेरी गाण्ड मार दी ना !" मैंने शरमा कर दीदी के सीने में सर छुपा लिया। वत्सला ने मेरे बोबे मसल दिये और मेरे होठों पर एक गहरा चुम्मा ले लिया।

"दीदी" मैं सिसक उठी। मेरी चूतड़ों को दबा कर सहला दिया.... पर हाय ! ये तो मर्दों वाले हाथ थे....

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Posted : 04/12/2010 8:04 am
 Anonymous
(@Anonymous)
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Posted : 18/12/2012 4:24 am