इस्तान्बुल में शिप ...
 

इस्तान्बुल में शिप पर चुदाई  

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 Anonymous
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मैं परम आदरणीय गुरुजी का शुक्रगुजार हूँ जिन्होंने मेरी आत्मकथा के अंश "हवाई जहाज में चुदाई" को अपनी जग प्रसिद्ध वेबसाईट चोदोचुदो डॉट कॉम में जगह दी। फिर मैं अपने प्रिय पाठकों का भी बहुत शुक्रगुजार हूँ कि आप सभी ने मुझे बेहद सराहा। मुझे सैंकड़ों प्रशंसकों के ईमेल प्राप्त हुए, बदले में मैंने भी उन्हें निजी तौर पर जवाब लिखकर धन्यवाद देने की ईमानदारी से कोशिश की है।

मुझसे अधिकांश पाठकों ने जिज्ञासापूर्वक जानने की कोशिश की कि यह मनघड़ंत कहानी थी या एक सच्चाई। मेरे प्रिय पाठक मित्रो, मैं आपके सामने एक बार फिर दोहरा दूँ कि मैंने जो कुछ भी लिखा वह पूर्ण सत्य है जो वाकयी मेरे साथ इस्तान्बुल जाते समय घटित हुआ था, वे मेरी जिंदगी के कभी ना भुलाने वाले हसीन और यादगार पल थे।

आप सभी ने मुझसे यह भी जानने की कोशिश की है कि क्या क्रिस्टीना वास्तव में भारत आ रही है, इसका जवाब मैं फिर से दोहरा दूं कि जी हां ! वह इस वर्ष गर्मियों में 4 से 6 सप्ताह के लिये भारत आयेगी।

वह मेरे साथ हिमालय की खूबसूरत पहाड़ों पर जायेगी, जहाँ हम कामसूत्र की किताब को आधुनिक परिवेश में लिखने की कोशिश करेंगे क्योंकि आप सभी जानते हैं कि वास्तविक कामशास्त्र बहुत पुराना ग्रंथ है जो लगभग दो हजार वर्ष पुराने भारत के माहौल में लिखा गया है। अब समय की मांग है कि उसे दुबारा से आधुनिक जमाने के हिसाब से लिखा एवं चित्रांकित किया जाये। इसलिये लिखने का काम मैं करुँगा और पेंटिंग बनाने का कार्य क्रिस्टीना स्वयं करेगी।

जैसा कि मैंने पिछले संस्मरण "हवाई जहाज में चुदाई" में वादा किया था कि यदि आपको मेरी आत्मकथा पसंद आयेगी, तो मैं इसके आगे का भाग आपको फिर सुनाऊंगा। सैंकड़ों की तादाद में आपसे मिलने वाले प्रशंसा के पत्र इस बात के गवाह हैं कि आपने मेरी लेखनी को पसंद किया और आप सभी के आग्रह ने मुझे आगे के संस्मरण लिखने को बाध्य कर दिया।

जैसे कि इस्तान्बुल के अतातुर्क इंटरनेशनल एयरपोर्ट पर हम सुबह के करीब साढ़े आठ बजे पहुँचे। आप चौंकिये मत कि जब हम नई दिल्ली से सुबह के चार बजे निकले थे, तो आठ घंटे की यात्रा के बाद सुबह के साढ़े आठ बजे इस्तन्बुल कैसे जा पहुँचे। कारण बतला दूं कि भारत व तुर्की के बीच समयान्तर साढ़े तीन घंटे का है।

अब विमान से बाहर निकलने की बात :

क्रिस्टीना और मैं, हाथ में हाथ डाले लाउंज में बने एक रेस्टोरेंट में बिल्कुल चुपचाप जा बैठे। पेरिस के लिये उसकी अगली फ्लाईट तीन घंटे बाद थी और मुझे भी एयरपोर्ट से बाहर निकल कर होटल जाना था। हम दोनों रात भर के जगे हुए थे, पर नींद आंखो से कोसों दूर थी। कुछ समझ नहीं आ रहा था कि क्या करें। ना वह बिछड़ने के लिये तैयार थी और ना ही मैं। मेरे साथ क्रिस्टीना ने भी अपनी जिंदगी का एक अनमोल अनुभव लिया था।

पहले तो विमान में यात्रा के आठ घंटे चुटकी बजाते ही आठ मिनट जैसे बीत गये, पर अब एक-एक मिनट भी एक वर्ष के समान लग रहा था। हम दोनों बिना कुछ बोले हर थोड़ी देर में घड़ी देख रहे थे। मैं विनम्रता पूर्वक स्वीकार करता हूँ कि ऐसा नहीं था कि मैंने जिंदगी मैं कोई पहली बार लड़की के साथ सम्भोग किया हो या फिर ना ही ऐसा था कि क्रिस्टीना ने भी कुवांरी लड़की की तरह पहली बार अपनी सील तुड़ाते हुए अपनी सुहागरात मनाई हो। पर इस रात की - इस चुदाई की - इस चुम्मा चाटी की - इस यात्रा की - इस सहयात्री की - हर बात निराली थी। शायद यह अनुभव जिंदगी में मुझे दुबारा कभी हासिल नहीं होगा।

मुझे अच्छी तरह याद है कि हम दोनों में से कोई भी उस रेस्टोरेंट में बैठे हुए एक शब्द नहीं बोला। हर क्षण पहाड़ जैसा लग रहा था, और अंत में विदाई की निष्ठुर घड़ी आ ही गई। रेस्टोरेंट में लगी घड़ी ने जैसे ही 11 बजने का संकेत दिया, क्रिस्टीना ने इशारा किया कि अब मुझे जाना होगा, मेरी फ्लाईट का समय हो चुका है।

मैं भी उसके साथ उठ खड़ा हुआ और उसे अलविदा कहने के लिये डिपार्चर गेट तक उसके साथ गया। आगे जालिम सिक्योरिटी गार्ड खड़े थे, मैं उसके आगे नहीं जा सकता था क्योंकि सिक्योरिटी चेकिंग के बाद सीधे विमान में प्रवेश करने का रास्ता था। क्रिस्टीना ने मेरे गले लगकर एक लम्बा सा विदाई का चुम्बन दिया और वह विमान में बैठने के लिये आगे बढ़ी। मैं चेतना-शून्य अवस्था में हक्का बक्का सा वहीं खड़ा उसे ताकता रहा, ताकि आँखों से ओझल होने तक उसे निहार सकूँ।

वह आगे बढ़ी, उसकी सिक्योरिटी चेकिंग हुई पर कुछ ही क्षण पश्चात वह आगे बढ़ने के बाद अचानक पलटकर, हिन्दी फिल्मों की तरह, वह अपने हैंड बेग को हाथ में लेकर मेरी तरफ दौड़ी चली आई और मुझसे लिपट गई। उसका चेहरा गवाह दे रहा था कि बिछुड़ने के गम से वह भी उतनी ही व्यथित है जितना कि मैं।

तत्काल मैंने उसका हाथ पकड़ा और लाऊंज में टर्किश एअर लाईन के काउंटर पर जाकर खड़ा हुआ और वहाँ खडी परिचारिका से निवेदन किया कि किसी कारणवश इसे इस्तान्बुल में रुकना पडेगा, अतः इसकी टिकट का एक्सटेंशन कर, परसों सुबह की फ्लाईट में बुक कर दीजिये।

थोड़ी सी ना-नुकुर के बाद उसने उसका रिज़र्वेशन मनचाही फ्लाईट में कर दिया, कारण वैसे भी सीजन नहीं होने से, विमानों में रश नहीं चल रहा था। जैसे ही नया रिज़र्वेशन कन्फर्म हुआ, क्रिस्टीना खुशी के मारे मेरे गले लग गई। अब वह मेरे साथ दो दिन और दो रात इस्तान्बुल में ही रुकेगी, यह जानकर मैं भी उसके गले लग कर अपनी खुशी का इज़हार करने लगा।

मेरे पास तो पहले से ही तुर्की का वीजा था, लेकिन क्रिस्टीना को इस्तान्बुल में प्रवेश हेतु वीजा लेना पड़ा। यूरोप की नागरिक होने के कारण उसे वीजा बहुत ही आसानी से मिल गया। उन लोगों के लिये एयरपोर्ट पर ही एक काउंटर बना हुआ है, जिस पर हाथों हाथ पासपोर्ट पर स्टांप लगाकर वीजा दे देते हैं।

फिर हम दोनों एयर पोर्ट से बाहर आकर मिले। हमने टेक्सी पकड़ी और डाउन टाउन में सुल्तान अहमेत नामक इलाके में होटल में आकर ठहर गये। यहाँ पहले से मेरे नाम से एक कमरा बुक था।

यह इस्तान्बुल का सबसे प्रसिद्ध और दर्शनीय इलाका है। यहाँ से पैदल दूरी पर ही मुख्य आकर्षण की अनेकों प्राचीन इमारतें हैं। हालांकि यह पुराना व भीड़-भाड़ वाला इलाका है, पर इसका भी अपना एक आकर्षण है। समुद्र भी हमारे होटल के बिल्कुल ही नजदीक ही था और हमारे कमरे से उसका खूबसूरत नजारा दिखता था।

हम दोनों रात भर के थके-मांदे अपने कमरे में घुसे और बिस्तर पर ढेर हो गये। एक बार तो इच्छा हुई कि चुदाई का एक और चक्र निपटा लूँ, पर सोचा कि अब जल्दी करने से क्या होगा, क्रिस्टीना कहीं भागी तो नहीं जा रही है, उसे तो मेरे साथ अगले दो दिन और दो रात तक रहना है। बेहतर यह ही होगा कि पहले अपनी थकान मिटा लें।

क्रिस्टीना बिलकुल छोटे बच्चे की तरह मेरे सीने से चिपक सो गई, मैं भी थका हुआ था, अतः क्रिस्टीना के साथ निंदिया रानी के आगोश में समा गया।

मैं अपनी बात को और आगे बढ़ाने से पहले तुर्की और इस्तान्बुल के बारे में थोड़ी सी जानकारी दे आपको दे दूँ कि तुर्की एक मुस्लिम राष्ट्र है, लेकिन यहाँ के मुसलमान बहुत उदारवादी और खुले विचारों वाले होते हैं। विशेषकर इस्तान्बुल की लड़कियां गोरी चिठ्ठी और बेहद खूबसूरत होती हैं। वे पश्चिमी परिधान में जन्नत की हूर जैसी नजर आती हैं।

तुर्की दुनिया का मात्र तीसरा देश है जो दो महाद्वीपों पर बसा हुआ है। तुर्की का अधिकांश भाग एशिया में है, इसका मात्र 3% हिस्सा ही यूरोप में है। इसी प्रकार इस्तान्बुल की आबादी भी एक करोड़ तीस लाख से अधिक होने के कारण, इसकी गिनती भी दुनिया के सबसे खूबसूरत महानगरों में होती है।

मैंने दुनिया के लगभग सभी बड़े शहर देखे हैं लेकिन मैं दावे से कह सकता हूँ कि इस्तान्बुल निश्चित रूप से दुनिया के सबसे खूबसूरत पांच शहरों में से एक है। आखिर क्यों ना हो, यह दुनिया का इकलौता महानगर है जो दो महाद्वीपों यूरोप व एशिया में बसा होने के साथ-साथ, दो समुद्रों मारमरा सी और ब्लेक सी (काला सागर) के किनारे पर बसा हुआ है। यह विश्व की चार महान सभ्यताओं रोमन, लेटिन, बाइजेंटाइन और ओटोमान का आश्चर्यजनक संगम है।

खैर ! मैं भी क्या मूर्ख हूँ जो क्रिस्टीना और मेरे किस्से के बीच में यह क्या तुर्की के भूगोल व इतिहास का रोना लेकर बैठ गया। जबकि आप सभी क्रिस्टीना के शरीर का भूगोल व इतिहास जानने को बेचैन होंगे।

शाम के लगभग 6 बज रहे होंगे, अचानक क्रिस्टीना की नींद खुल गई और वह मेरी बाहों से निकलकर बाथरुम की ओर चली तो मुझे उसके शरीर की मुलायम की गर्मी की कमी महसुस होने से मेरी भी नीन्द खुल गई। अब भूख भी लगने लगी थी क्योंकि सुबह से कुछ नहीं खाया था, कारण हम दोनों होटल में आते ही बिना कुछ खाये पिये ही सो गये थे। मैं विचार कर ही रहा था कि क्या करुँ कि तभी क्रिस्टीना बाथरुम से लौटकर आ गई। उसने मुझे एक मीठा सा चुम्बन देकर गुड इवनिंग कहा और बताया कि उसे भूख लग रही है।

पहले तो मैंने सोचा की कमरे में ही खाने के लिये कुछ मंगवा लें। पर मुझे ख्याल आया कि मैं तो शुद्ध शाकाहारी हूँ, और तो और मैं अंडा भी नहीं खाता हूँ। अतः हिन्दुस्तान को छोडकर दुनिया के लगभग बाकी सभी देशों में मुझे खाने में समस्या आती ही है। क्योंकि दुनिया के अधिकांश देशों में वेज व नान वेज में कोई फर्क नहीं होता है। अंडे के बारे में ज्यादातर लोगों में यह भ्रम है कि यह तो वेज ही है। और तो और कई देशों में सी-फ़ूड (मछली, झींगा इत्यादि) को भी वेज खाना मानते हैं। हालांकि मैं एक शुद्ध शाकाहारी हूँ, पर यह अलग बात है कि मुझे औरतों का गर्म गोश्त खाने से कोई एलर्जी नहीं है। उन्हें तो मैं पूर्ण शाकाहारी वस्तु मानकर उनके शरीर के प्रत्येक अंग को पूरा का पूरा ही चबा डालता हूँ।

मैंने सोचा कि अपने लिये शाकाहारी खाने के लिये होटल में बने रेस्टोरेंट से पूछना ही बेहतर होगा। अतः मैंने क्रिस्टीना से कहा- तुम हाथ-मुंह धोकर तैयार हो जाओ, तब तक मैं नीचे रिसेप्शन से खाने के बारे जानकारी लेकर आता हूँ।

उसके हामी भरने के बाद मैंने रिसेप्शननिस्ट से डिनर के बारे में पूछा तो उसना सुझाव दिया कि अभी शाम तो साढ़े सात बजे नजदीक से ही एक क्रूज डिनर के लिये रवाना होगा। क्रुज पर बेहतरीन बेली डांस भी होगा और आपको अपनी शाम को यादगार बनाने के लिये इस्तान्बुल की नाईट लाइफ का आनंद लेना ही चाहिये। यह सुनकर मैं अपने कमरे की ओर दौड़ा और क्रिस्टीना से पूछा कि क्या वह डिनर के लिये, क्रूज पर चलना पसंद करेगी।

वह भी होटल से बाहर निकलकर ताजी हवा खाकर थोड़ा ताज़ा महसूस करना चाहती थी, अतः उसने भी तत्काल हां कर दी। हालांकि पहले मेरा मूड तो होटल में ही खाना खाकर चुदाई समारोह शुरु करने का था, क्योंकि विमान में जो चुदाई का आनंद लिया था, वह अलग किस्म का था। उसमें एक प्रकार का भय भी शामिल था। लेकिन अब बिल्कुल निश्चिंत होकर कमरे में ही रात भर मजे लेने का विचार था। किन्तु बेली डांस का नाम सुनकर मेरी भी इच्छा जागृत हो गई कि थोड़ी देर बाहर समन्दर की ताजी हवा में आउटिंग हो जायेगी और डिनर भी हो जायेगा।

एक बार मैंने बेली डांस काहिरा में नील नदी पर एक क्रूज डिनर के दौरान ही देखा था। वह एक यादगार डिनर था। अतः सोचा की अभी तो शाम ही हुई है, चुदाई के लिये तो अभी रात भर बाकी है। कुछ देर बाहर जाकर खाना खाकर फिर लौट कर चुदाई समारोह शुरु कर देंगे।

हम दोनों तैयार होकर पास ही समुद्रतट पर लगे जहाज़ पर चढ़ गये। थोड़ी ही देर में और भी सैलानी एकत्रित हो गये और फिर निर्धारित समय पर वह रवाना हो गया। इस्तान्बुल शहर के दोनों और बसे दो अलग अलग समुद्रों को मिलाने वाली लगभग 31 किलोमिटर लम्बी स्ट्रेच जिसे बास्फोरस के नाम से भी जाना जाता है, पर हमारा जहाज रवाना हुआ। इसकी चौड़ाई किसी बड़ी नदी के पाट से भी बहुत ज्यादा होगी। उसके दोनों ओर बसा हुआ इस्तान्बुल शहर, शाम के वक्त बत्तियों में बहुत ही खूबसूरत लग रहा था। उसके दोनों ओर किनारों पर बसे खूबसूरत भवन इस्तान्बुल की शान में कशीदा काढ़ रहे थे। इस स्ट्रेच के एक ओर का हिस्सा यूरोप में था और दूसरी ओर का हिस्सा एशिया में, जो अनेकों जगह से पुलों द्वारा आपस में जुड़ा हुआ था।

जहाज़ के डेक पर वेटर दौड़-दौड़ कर लजीज भोजन परोस रहे थे, कि तभी साजिन्दों के साथ खूबसूरत डांसरों ने प्रवेश किया। फिर शुरु हुआ इन्द्र-सभा को मात देने वाली अप्सराओं का मादक नृत्य।

ठंडी हवाओं से बचाव के लिये चारों ओर शीशे की छत और दीवाल बनी थी।

मैं आपकी जानकारी के लिये बतला दूँ कि बेली डांस अरब जगत का बहुत पुराना नृत्य है, जिसे अरेबिक डांस कहा भी जाता है। यह एशिया एवम् अफ़्रीका में फेले अनेकों अरबी देशों में प्राचीन काल से ही बहुत ही प्रसिद्ध है। इस डांस में शरीर के सभी अंगों को उपयोग में लाया जाता है, विशेषकर कमर के हिस्से को, इसीलिये इसे पश्चिमी जगत में बेली डांस के नाम से जाना जाता है। यह कह दें कि कमर के साथ नर्तकी के कूल्हे भी उत्तेजक मुद्रा में मटकते हैं, तो गलत नहीं होगा।

शायद आपको याद होगा अभिषेक बच्चन व ऐश्वर्या राय की फिल्म "गुरु" जिसके शुरु में मैय्या-मैय्या वाला गाना, वह एक बेली डांस ही था।

इसी प्रकार तुर्की का एक और "सूफी-दरवेश डांस" भी विश्व प्रसिद्ध है, जिसमे सूफी लोग गोल-गोल घुमकर डांस करते हैं। इसके भी इस्तन्बुल में शो भी होते रहते हैं। शायद आपको बहुचर्चित फिल्म जोधा-अकबर का गाना - "ख्वाजा मेरे ख्वाजा, मेरे दिल में समा जा" याद होगा। वह भी तुर्की का सूफी-दरवेश डांस ही था।

खैर पता नहीं आप भी मेरे बारे में क्या सोचते होंगे कि क्यों मैं बार बार विषय से भटक जाता हूँ। ऐसा लगता है कि मुझे किसी यूनिवर्सिटी में भूगोल-इतिहास का प्रोफेसर होना था। इसके बजाय मैं नसीब का मारा, इन्जिनीयर बनने के बाद भी किसी एयर-कंडीशंड आफिस में 9 से 5 बैठने के बजाय दुनिया भर में दर-दर भटकता फिर रहा हूँ।

मैंने केबरे, स्ट्रीप, डिस्को, साम्बा, सालसा जैसे अनेकों तरह के डांस देखे हैं, पर बेली डांस की बात कुछ और ही है।

क्रिस्टीना मेरे से सटकर बैठी खाना खा रही थी, कि तभी एक डांसर हमारे पास में आई और हमें हाथ पकड़कर डांस-फ्लोर पर ले गई। फिर क्या था, हम लोग भी उनकी स्टेप्स की नकल कर, डांस करने लगे। फिर क्रिस्टीना मेरे से चिपक कर डांस करने लगी। उसके उन्न्त वक्ष मेरे सीने से लगकर मेरे लिंगराज की आग को भड़काने लगे। मैं तो उसका दीवाना हो गया। मैंने भी उसे अपनी बाहों में भींच लिया और डांस करने लगा।

अब मैं मौका देखकर उसके अंग-प्रत्यंग पर हाथ फिराकर उसे उत्तेजित करने की कोशिश लगा। थोड़ी ही देर में हम थक कर अपनी सीट पर आ बैठे। अब मेरा मन खाना खाने में नहीं बल्कि क्रिस्टीना को खाने का होने लग गया। मैं मेज़ के नीचे से हाथ उसकी जांघों पर फिराने लगा। वह भी गर्म होने लगी वह भी मौका देखकर अपना हाथ मेरे लिंग महाराज पर फिराने लग गई। फिर हम दोनों पर मदहोशी छाने लग गई।

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Posted : 15/02/2011 6:13 am
 Anonymous
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अभी तो क्रूज़ पर डांस व डिनर खत्म होने में करीब दो घंटे बाकी थे, और हमारा स्टीमर तो किनारे से बहुत दूर निकल आया था। यहाँ तो यह हालत थी कि हम दोनों ही बेकाबू होने लग गये। अब लगा कि क्रूज़ पर डिनर के लिये आने का निर्णय बहुत ही गलत था, इससे तो अच्छा होता कि वहीं होटल में रुक कर चुदाई का आनंद लेते, लेकिन अब पछताने से क्या होता।

वैसे भी आज क्रिस्टीना गजब ढा रही थी। उसने काले रंग की जीन्स और टी-शर्ट पहनी थी, उस पर भी मैच करता हुआ एक काले रंग की स्कीवी, और गले में काले रंग का स्कार्फ। उसके गौरे जिस्म पर काला रंग तो बेहद जंच रहा था। वैसे भी इन गौरी चमड़ी वाली इन यूरोपियन बालाओं का पसन्दीदा रंग काला ही होता है।

जिन पाठकों ने इस कथा का पिछला भाग नहीं पढ़ा हो तो उन लोगों के लिये मैं क्रिस्टिना के शरीर का वर्णन दुबारा कर दूं। वह इतनी खूबसूरत थी जैसे कोई माडल हो, उम्र लगभग तीस वर्ष, एकदम संगमरमरी गौरी चमड़ी, जैसे नाखून गड़ा दो तो खून टपक जायेगा, ब्लांड (सर पर सुनहरे, लम्बे बाल), अप्सराओं जैसा अत्यन्त खूबसूरत चेहरा, बड़ी बड़ी नीली आँखें, इनमे डूबने को दिल चाहे, तीखी नाक, धनुषाकार सुर्ख गुलाबी रंगत लिये हुए औंठ, अत्यन्त मनमोहक मुस्कान जो सामने वाले को गुलाम बना दे, लम्बाई लगभग पांच फीट छह इंच, टाईट जींस को पीछे से उसकी गांड देखने पर, उसकी चूत छोड़कर गांड मारने की इच्छा जागृत हो जाये।

ओह क्षमा करें, मैं खास बात तो बताना ही भूल गया कि उसके उन्नत स्तन 34, कमर 26 और गांड 36 ईंची थे। इन सब बातों का सारांश यह निकलता था कि उसे पहली बार देखने पर किसी भी साधु सन्यासी का लण्ड भी दनदनाता हुआ खड़ा होकर फुंफकारें मारने लगे। सोने पर सुहागा यह कि वह एक शानदार जिस्म की मालिक होने के साथ साथ इटेलिजेंट भी थी।

अब मेरे लगातार हाथ फेरने से क्रिस्टीना गर्म होने लग गई, फिर उसने धीरे से मेरे कान में कहा- सुबह तो एयरोप्लेन में जमीन से 35,000 फुट की ऊंचाई पर जन्नत के मजे दिला दिये, अब तुम यहाँ पानी पर चलते हुए जहाज में कुछ करो तो मैं तुम्हें कुछ जानूँ !

यह सुनकर मैं चिहुंका और मेरे दिमाग की घण्टियाँ बज गई, मैंने उससे कहा- मैं देखकर आता हूँ कि इन परिस्थितियों में मैं क्या कुछ कर सकता हूँ।

मैं अपनी सीट से उठा और सबसे पहले टायलेट की ओर भागा कि कहीं शायद दुबारा टायलेट पोलो खेलने का एक मौका मिल जाये। लेकिन जहाज बहुत बड़ा नहीं था अतः उसमें मात्र दो ही टायलेट थे। यात्री भी 75 से अधिक ही थे, अतः कोई ना कोई वहाँ आ जा रहा था। फिर खाने खाने व शराब पीने के बाद लगभग सभी को पेशाब के लिये, कम से कम एक बार तो आना ही था, अतः टायलेट पोलो खेलने का चांस मिलने की संभावना बिल्कुल भी नहीं थी। मैंने पूरे डेक पर घूम-फिर कर देखा कि कहीं कोई कमरा हो, पर कहीं कुछ नहीं था। अब मैं निराश हो ही चला था।

तभी मेरी निगाह उपर की तरफ जहाज के केप्टन की ओर गई, देखा कि वह सफेद झक से कपड़े पहने व्हील हाथ में लिये अपने कांच के केबिन में खड़ा है। मैंने आशा भर नजरों से उसकी ओर देखा और फिर उपर जाने के लिये सीढ़ी पर चढ़ा।

पास पहुँचने पर उसने पूछा- मैं आपकी क्या मदद कर सकता हूँ?

तो मैंने उसे बताया- मेरी दोस्त की तबीयत अचानक खराब हो गई है और उसे चक्कर आ रहे हैं। वह थोड़ी देर लेटना चाहती है, क्या आपके पास कोई कमरा है जहाँ वह थोड़ी देर आराम कर सके।

कुछ क्षण सोचकर उसने कहा- हमें किनारे पर पहुँचने में अभी करीब दो घंटे लगेंगे, तब तक आप चाहें तो लोअर डेक पर बने एक कमरे में जा सकते हैं वहाँ एक छोटा सा पलंग और एक मेज-कुर्सी लगी है उसमें रात को जहाज का चौकीदार रहता है, लेकिन वह भी हमारे के किनारे पर पहुँचने पर आयेगा, तब तक वह कमरा खाली ही है। आप चाहें तो उसकी चाभी ले जा सकते हैं।

अंधे को क्या चाहिये- दो आँखें।

मैंने उसे धन्यवाद बोला और चाभी लेकर तत्काल क्रिस्टीना के पास आया।उसका हाथ पकड़कर आहिस्ता से उसे नीचे की तरफ बने बने कमरे में ले गया। कमरा हालांकि छोटा, मगर साफ सुथरा था। उस पर लगा पलंग भी बड़ा नहीं था, मगर चुदाई के लिये पर्याप्त था। कमरे में घुसते ही सबसे पहले मैंने दरवाजा बंदकर खिड़की के पर्दे लगा दिये। यह हालांकि यह कमरा बहुत एक तरफ था, और उस ओर किसी के भी आने की सम्भावना नहीं थी।

क्रिस्टीना अभी भी दरवाजे के पास खड़ी मुस्करा रही थी, उसे विश्वास नहीं हो रहा था कि मैं उसकी इच्छा पूरी करने में सफल हो रहा हूँ। अब मैंने उसे अपनी गोद में उठाया और पलंग पर बैठ गया, वह मेरी गोद में ही लेटी हुई थी। मैंने उसका लम्बा सा चुम्मा लिया, उसकी सांसों में एक मादकता की महक थी, उसके रसीले होठों में एक इस दुनिया-जहां को भुलाने वाला जादू था। जब वह मुझसे चिपक रही थी तो मेरे सीने में दो दहकते हुए अंगारे से चुभने लगे। ऐसा लग रहा था कि उसके दोनों वक्ष, दो गर्म भट्टियों में तब्दील हो चुके है, और यह गर्माहट मुझे जलाकर भस्म कर देगी।

हम दोनों अपने बस में नहीं थे। दोनों एक दूसरे के शरीर को टटोलने लगे। कामुकता अपनी सीमा को लांघ चुकी थी।

आज सुबह हवाई जहाज में चुदाई करते समय हम दोनों ने कोई भी आवाज नहीं निकालकर, जो चुदाई की थी, उस संयम का बांध अब टूट चुका था। हम दोनों नीडर होकर आवाजें निकाल रहे थी, क्योंकि हम डेक से काफी दूर थे जहाँ पार्टी चल रही थी। इसके अलावा जहाज के इन्जिन के शोर के साथ-साथ पानी के कटने की आवाज में हमारी मदभरी आवाजें तो उस कमरे से बाहर जा नहीं सकती थी। अब मैं जैसे ही क्रिस्टीना की गर्दन पर अपनी जीभ फिराने लगा तो, वह तड़पने लगी। उसके बाद जैसे ही मैंने उसके कान की लोम अपने मुँह में ली, वह अपने काबू में नहीं रही। उसने मेरी जींस को खोलकर उसमें से मेरे लिंग महाराज को आजाद कर दिया और उसे सहलाने लगी।

मैंने भी उसका स्कीवी, टी-शर्ट और फिर जींस भी निकाल दी, अब वह मेरे सामने काली ब्रा और पेंटी में जन्नत की हूर लग रही थी। लेटेस्ट स्टाइल की ब्रा में उसके झांकते हुए 34 इन्ची वक्ष का ऊपरी भाग, जो किसी पहाड़ की चोटियों जैसा लग रहा था। यह नजारा तो किसी भी साधु सन्यासी की नियत खराब करने के लिये काफी थे, तो फिर मुझ जैसे इंसान की क्या बिसात थी।

इधर क्रिस्टीना ने भी आवेश में आकर मुझे भी बिलकुल नंगा कर दिया। अब हम पागलों की तरह एक दूसरे के शरीर के अंग-प्रत्यंग को मसलने में लगे थे। देखने में ऐसा लग रहा था कि हम दोनों कुश्ती लड़ रहे हों। बिल्कुल सही, वह बेड-रेसलिंग ही तो थी। दुनिया का एक मात्र गेम, जिसमें दोनों खिलाड़ी ही जीतते हैं।यदि कोई हार-जीत होती भी है तो हारने वाला हारकर भी बहुत खुश होता है।

फिर मुझसे रहा नहीं गया और मैंने उसकी प्यारी सी रेशमी ब्रा के हुक खोल दिये, तो वह झटके से बहुत दूर जाकर गिरी। उसके दूधिया रंगत लिये हुए बेहद टाईट वक्ष ऐसे लग रहे थे जैसे कोई दो हिमाच्छादित पर्वत-शिखर हों। जैसे ही मैंने अपनी जीभ उसके एक वक्ष के दूध की टोंटी पर फिराई तो वह तो जोर जोर से सीत्कार कर कामोत्तेजक आवाजें निकालने लगी। उसने मेरा लण्ड पकड़ लिया, और उस पर हाथ फिराने लगी।

मैं पागलों की तरह कभी बायां स्तन तो कभी दायां स्तन अपने मुंह में लेने लगा। मेरे ख्याल से जवान औरत का स्तन दुनिया का सबसे मीठा फल होता है। सारी दुनिया भले ही आम को फलों का राजा मानती है, लेकिन मेरी राय से तो आप सब भी सहमत होंगे एक उन्नत स्तन के मुकाबले में बेचारे उस हापुस आम की क्या बिसात। अब मैं इसके वक्ष रूपी फल का रसास्वादन करने लगा। मुझे लग रहा था कि, दुनिया मेरे मुंह में समा गई है।

अब क्रिस्टीना भी कुछ अपने मुँह में लेना चाहती थी। वह थोड़ी देर बाद वह नीचे खिसक गई और मेरा लण्ड मुंह में लेकर चूसने लगी। फिर कुछ देर बाद मैंने भी पलटी खाते हुए 69 की पोजीशन बनाते हुए, उसकी पेंटी निकाल दी और उसकी रसीली मुलायम झांटदार चूत का रसास्वादन करने लगा। मैं अपनी जबान उसकी नर्म और गर्म चूत मे अंदर बाहर कर, उसे चुदाई का अहसास देने लगा। कुछ देर तक अनवरत जिह्वा-चोदन करने के बाद मुझे अपने मुंह में कुछ गर्म द्रव का अहसास हुआ और फिर क्रिस्टीना कांपती हुई ठंडी पड़ गई। मैं समझ गया कि वह झड़ गई है।

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Posted : 15/02/2011 6:14 am
 Anonymous
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अब क्रिस्टीना भी कुछ अपने मुँह में लेना चाहती थी। वह थोड़ी देर बाद वह नीचे खिसक गई और मेरा लण्ड मुंह में लेकर चूसने लगी। फिर कुछ देर बाद मैंने भी पलटी खाते हुए 69 की पोजीशन बनाते हुए, उसकी पेंटी निकाल दी और उसकी रसीली मुलायम झांटदार चूत का रसास्वादन करने लगा। मैं अपनी जबान उसकी नर्म और गर्म चूत मे अंदर बाहर कर, उसे चुदाई का अहसास देने लगा। कुछ देर तक अनवरत जिह्वा-चोदन करने के बाद मुझे अपने मुंह में कुछ गर्म द्रव का अहसास हुआ और फिर क्रिस्टीना कांपती हुई ठंडी पड़ गई। मैं समझ गया कि वह झड़ गई है।

लेकिन मैंने अपने जीभ-चोदन के कार्यक्रम को नहीं रोका, तो नतीजे में कुछ देर में ही वह दुबारा गर्म हो गई। अब मैंने उसे बिस्तर पर लिटा दिया और मैं उसके ऊपर आ गया। फिर मैंने अपने लण्ड उसकी चूत में प्रवेश करा दिया। उस क्षण को मैं शब्दो में बयान नहीं कर सकता। शायद समय शायद स्वयं भगवान भी मेरे सामने आकर खड़े हो जाते तो, मैं उनसे भी कह देता,"हे भगवान जी, अभी तो मुझे क्षमा करें। कृपया थोड़ी देर के लिये तो आप चले ही जायें। कोई वरदान वगैरह भी देने की इच्छा हो तो, कृपया थोड़ी देर बाद फिर से आ जाना !"

अब मैंने बहुत ही आहिस्ता से अपने लण्ड को उसकी चूत में अंदर-बाहर करना शुरू किया, तो क्रिस्टीना जोर जोर आवाजें निकालने लगी। वह मेरे कूल्हे पकड़कर ऊपर-नीचे कर मुझे सहयोग करने लग गई। हम दोनों पर नशा चढ़ता ही जा रहा था। कुछ देर की चुदाई के बाद मुझे लगा कि अब कुछ धक्के और मारे तो मेरा लण्ड पानी छोड़ देगा, तो फिर मैंने उसे रुकने का इशारा किया और उसका स्तन-मर्दन करने लगा, ताकि मेरा काम तमाम नहीं हो जाये।

वह समझ गई और मुझसे बोली- पोजीशन बदल लेते हैं।

अब वह पीछे से मेरा लण्ड लेना चाहती थी, वह पलंग पर उल्टी लेट गई। मैंने उसके पेट के नीचे तकिया रख दिया और फिर पीछे से उसकी प्यारी सी मखमली चूत में अपने लण्ड को प्रवेश करा कर थोड़ी देर रुक गया। अब मैं अपनी जबान से उसकी पीठ, गर्दन का पिछला भाग चाटने लगा, वह कामोत्तेजक आवाजें निकालने लगी। कुछ देर बाद मैंने, उसकी चूत में अपने लण्ड को जितना अंदर डाल सकता था, प्रविष्ट करा दिया। वह बिस्तर पर उल्टी लेटी रही पर मैं उसकी गांड पर बैठ गया, जैसे कि मैं किसी घोड़ी की सवारी कर रहा हूँ। थोड़ा सा आगे झुककर, मैं अपने दोनों हाथों के पंजों से उसकी गांड को हौले-हौले से दबाने लगा। जैसे की रोटी बनाते वक्त आटा गुंथते समय पानी मिले आटे को मुक्के से अंदर तक दबाया जाकर, फिर छोड़ दिया जाता है, और फिर अगले ही क्षण दुबारा से हल्के हाथ का प्रेशर बनाकर दबाया जाता है। इसमे क्रिस्टीना को वही अहसास मिला जो, लण्ड को चूत में अंदर बाहर करते हुए मिलता है।

जैसे जैसे मैं उसकी गांड को दबाने लगा, वैसे वैसे वह तड़पने लगी। वह भी मदमस्त होकर अपनी गांड को झटके देने लगी। उसे पूर्ण चुदाई का अहसास मिल रहा था। अंत में वह क्षण आ ही गया कि वह एक बार फिर से झड़ गई। लेकिन मेरा अब भी नहीं हुआ था, क्योंकि इस गांड दबाऊ आसन में मर्द का स्टेमीना बहुत बढ़ जाता है, और वह सामान्य आसनों के मुकाबले में कही ज्यादा देर तक अपनी महिला-साथी को चोद सकता है। वही मेरे साथ भी हुआ, मैं अब भी लण्ड की पिचकारी छोड़ने के लिये भरा पड़ा था।

चुदाई करते वक्त क्रिस्टीना जो आवाजें निकाल रही थीं, उससे यह साबित हो रहा था कि औरत चाहे दुनिया के किसी भी देश की हो, किसी भी रंग की हो, चाहे उसकी मातृ भाषा कुछ भी हो, लेकिन चुदवाते समय वह एक ही भाषा बोलती है, चुदाई की अपनी एक अलग ही भाषा होती है, जो सारी दुनिया में एक जैसे ही बोली जाती है।

अब मैंने क्रिस्टीना को सीधा कमर के बल लेटाया और फिर और उसकी दोनों टांगों को उसकी कमर की ओर मोड़ कर उसकी चूत में अपने लण्ड को आहिस्ता से अंदर डाल दिया। यह आसन सबसे आसान और ज्यादा प्रचलित भी है। अब जब मुझे लगा की मेरा लण्ड उसकी चूत में पूरी तरह से अंदर चला गया है, तो कुछ देर रुककर मैंने अपने शरीर को बिना हिलाये, और लण्ड की नसों को फुलाना शुरु किया, इससे उसकी चूत में झटके लगते और उस पर मस्ती छाने लगी, तो बदले में वह भी अपनी चूत की नसें फ़ुलाकर जवाब देने लगी। यह भी एक अलग प्रकार का आनंद था। हम दोनों रुक रुक कर अपने लण्ड और चूत की नसों को बारी बारी से फुलाते रहे। इस प्रकार लण्ड और चूत के बारी बारी से फड़कने के कारण एक परमानंद का अनुभव होने लगा।

इसके साथ मैं क्रिस्टीना के स्तनों का भी मर्दन कर रहा था। लगभग 10 मिनट तक इस खेल को खेलने के बाद जब मेरा ध्यान घड़ी की और गया तो देखा कि हमें इस कमरे में आये एक घंटा हो चुका था, तो मुझे लगा कि अब डेक पर हमें लौट जाना चाहिये क्योंकि जहाज के केप्टन को तो पता थी कि हम कमरे में हैं। हो सकता है कि वह हमारी कुशल-क्षेम पूछने के लिये नीचे स्वयं आ जाये या अपने किसी सहयोगी को ही भेज दे।

यह सोचकर मैंने अपने लण्ड को अंदर-बाहर करना शुरु कर दिया। जैसे ही मैंने अन्तिम आनन्द लेने का मूड बनाया, तो अगले दो-तीन मिनट में ही मेरे साथ साथ क्रिस्टीना का भी स्खलन हो गया। इस स्खलन का दिमाग से बहुत बड़ा सम्बंध है, यदि आप दिमाग में सोच लेते है कि आप लम्बी चुदाई करेंगे तो वह आपका स्खलन लम्बे समय तक नहीं होगा। लेकिन जैसे ही आपने अपने दिमाग को काम तमाम करने के संकेत दिये तो लण्ड भी पिचकारी छोड़ने में क्षण भर भी देरी नहीं करता है।

अब हम दोनों एक दूसरे की बाहों में निस्तेज होकर दो मिनट तक पड़े रहे। फिर मैं एक अच्छे काम-क्रीड़ा का खिलाड़ी होने का रोल निभाते हुए अगले कुछ मिनट तक उसके शरीर को सामान्य करने के लिये हाथ फेरता रहा। इस दौरान मैं उसके स्तनों को भी आहिस्ता से मसलता रहा। अब धीरे धीरे उसकी उत्तेजना शांत पड़ने लगी। इतने में मेरा लण्ड भी सामान्य अवस्था में आकर उसकी चूत से अपने आप बाहर आ गया।

फिर हम उठे, अपने-अपने कपड़े पहने, और कैप्टन को धन्यवाद देकर कमरे की चाभी लौटाकर डेक पर चल रही पार्टी में शामिल हो गये। डान्सर्स अब भी बेली डांस कर रही थीं। हमारा जहाज अब अपने गंतव्य स्थल की ओर वापिस लौटने लगा था। करीब एक घंटे की चुदाई के बाद हम दोनों को भूख लगने लगी थी, अतः हमने भर पेट खाना खाया। क्रिस्टीना बहुत खुश थी, उसने बताया कि ऐसा अभूतपूर्व आनंद उसने कभी नहीं उठाया था। सुबह हवाई जहाज में जमीन से करीब 35,000 फीट की ऊंचाई पर चुदाई और शाम को पानी के जहाज भी। उसका कहना था, कि यह दिन वह कभी भी नहीं भूल सकती है। खैर मैं भी इस दिन को कैसे भूल पाऊंगा। सच बात तो यह थी कि पार्टनर मंझा हुआ खिलाड़ी हो तो चुदाई के खेल का मजा अलग ही आता है।

रात के साढ़े ग्यारह बजे तक हम अपने होटल के कमरे में लौट आए थें। हम दोनों थक चुके थे, अतः एक दूसरे से चिपक कर सो गये।

फिर अगले दिन सुबह सात बजे नींद खुली, उठ कर तैयार होकर हमने नीचे जाकर होटल के रेस्टोरेंट में जाकर नाश्ता किया, और फिर एक चुदाई का मजेदार राऊंड निपटाया, सामने खिडकी खुली थी, समन्दर की लहरे देखने को मिल रही थी, यहाँ दिल के साथ साथ लण्ड और चूत भी हिलोरें ले रहा थें। जब सवेरे के नाश्ते की चुदाई हो गई तो हम दोनों ने विचार किया कि क्यों ना, नजदीक में ही स्थित विश्वप्रसिद्ध तुर्की सभ्यता की कुछ महान इमारतों के दर्शन कर लिये जायें। क्रिस्टीना ने भी तत्काल हाँ कर दी क्योंकि वह भी मेरी ही तरह इस्तान्बुल पहली ही बार आई थी।

अब हमने होटल के बिल्कुल ही नजदीक में स्थित सोफिया हेगिया, हिप्पोड्रोम, ब्लू मस्जिद, टोपकापी पैलेस, इजिप्शियन बाजार, सुलेमान मस्जिद जैसी विश्व प्रसिद्ध इमारतों को देखा। इनमें सभी एक से एक लाजवाब व पुरानी हैं।

सोफिया हेगिया एक पांचवीं शताब्दी में बना हुआ एक चर्च था, जिसे पन्द्रहवी शताब्दी में आटोमान शासकों ने चर्च के चारों ओर चार मिनारें बनाकर एक मस्जिद में बदल दिया गया था। फिर इसके साथ ही तुर्की में पन्द्रह सौ वर्ष पुराने क्रिश्चियन साम्राज्य का अंत होकर, मुस्लिम राज की शुरुआत हो गई। सबसे प्रसिद्ध आटोमान शासक - सुल्तान मेहमेत उसी वंश का शासक था, जिस वंश का बाबर था, जिसने हिन्दुस्तान में मुगल वंश की नींव डाली थी। प्रथम विश्वयुद्ध के खात्मे के बाद सबसे अच्छी बात यह रही कि तुर्की में राजवंश के खात्मे के बाद पहले राष्ट्रपति मुस्तफा कमाल अतातुर्क ने इस पन्द्रह सौ वर्ष पुराने सोफिया हेगिया भवन को एक म्यूजियम का रूप देकर एक विवाद को खत्म कर दिया। कारण यह भव्य इमारत बाहर से तो एक मस्जिद दिखती है, लेकिन अंदर से इसमे दीवारों व छत पर बनी बहुत बड़ी बड़ी और भव्य क्रिश्चियन धर्म की मोजेक पेंटींग्स इसके एक चर्च होने की चुगली करती थी। मुस्तफा अतातुर्क का तुर्की में वही सम्मान है जो भारत में महात्मा गांधी का है। भगवान भारत के नेताओं को भी ऐसी ही सदबुद्धि दे।

खैर मैं फिर बहकने लगा। कुल मिलाकर हमारा दिन बढ़ा शानदार गुजरा। अब थोड़ी थकान होने लगी थी, तो शाम होने से पहले ही लौट होटल लौट आये। हालांकि हम दोनों की इस्तान्बुल के प्रसिद्ध सार्वजनिक स्नानागार, जिन्हें "हमाम" कहा जाता है, में नहाने की इच्छा ठंड के कारण अधूरी रह गई और वैसे भी समय की कमी भी थी। सोचा फिर कभी मौका मिला तो देखेंगे।

कमरे में क्रिस्टीना ने दिल्ली से खरीदी कामशास्त्र की किताब के बारे में याद दिलाया। फिर उसमें से पेंटिंग्स को देखकर हमने विभिन्न आसनों को आज़मा कर रात भर चुदाई का मजा लिया। मेरे वह क्रिस्टीना के साथ गुजारे दो दिन, चुटकी बजाते ही हवा में उड़ गये। मुझे आज तक किसी भी महिला ने सेक्स का वह आनंद नहीं दिया जो क्रिस्टीना ने मुझे दिया था। मैं उस समय को कभी भी नहीं भूल सकता हूँ। आज भी मैं उन्हे अपनी जिंदगी के सबसे बेहतरीन पल मानता हूँ। उन दो दिनों में जैसे हमनें पूरी जिंदगी जी ली थी। उसके बाद मुझे साक्षात यमराज भी आकर कहते कि अब तुम्हारा इस धरती पर जीवन समाप्त हो चला है, तो भी मुझे शायद गम नहीं होता, मैं बहुत खुशी से यमराज के साथ मृत्युलोक की ओर चला जाता।

अगले दिन सुबह हम दोनों एयरपोर्ट की ओर फिर मिलने के वादे के साथ चले। सुबह साढ़े दस बजे क्रिस्टीना पेरिस के लिये रवाना हो गई, और उसके मात्र एक घंटे बाद ही मैं भी बर्लिन चला गया। मैं एयरपोर्ट पर क्रिस्टीना के उड़ने से पहले भगवान से यह प्रार्थना करता रहा कि कहीं कुछ हो जाये और उसकी फ्लाईट रद्द हो जाये और हम कुछ समय और साथ रह जायें, लेकिन ऐसा कुछ नहीं हुआ, जैसे ही उसका विमान हवा में उड़ा, उसके बाद मुझे पता नहीं था कि हम दुबारा कब मिलेंगे।

खैर क्रिस्टीना से मेरी दुबारा मुलाकात अगली गर्मियों में पेरिस में ही हुई, जहाँ हमने बहुत मजे लिये। मैंने वहाँ उसके कहने पर उसके दोस्तों के लिये कामशास्त्र की क्लास ली। वह भी एक लम्बा किस्सा है। यदि आप लोगों को मेरी कथा का यह भाग पसंद आया हो तो कृपया मुझे vikky0099@gmail.com पर मेल करें ताकि मैं अपने पेरिस वाली कामशास्त्र की क्लास के किस्से सुनाने की हिम्मत जुटा सकूँ।

यदि आप हमारे साथ हिमालय-दर्शन यात्रा में जाने के इच्छुक हों तो मुझे लिखें, हमारे साथ कोई भी एक युगल जा सकता है।

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Posted : 15/02/2011 6:19 am