कामांजलि  

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 Anonymous
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हाय, मैं अंजलि...! छोडो! नाम क्या रखा है? छिछोरे लड़कों को वेसे भी नाम से ज्यादा 'काम' से मतलब रहता है. इसीलिए सिर्फ 'काम' की ही बातें करूँगी.

मैं आज 22 की हो गयी हूँ. कुछ बरस पहले तक में बिल्कुल 'फ्लैट' थी.. आगे से भी.. और पीछे से भी. पर स्कूल बस में आते जाते; लड़कों के कंधों की रगड़ खा खा कर मुझे पता ही नहीं चला की कब मेरे कूल्हों और छातीयों पर चर्बी चढ़ गयी.. बाली उमर में ही मेरे चूतड़ बीच से एक फांक निकाले हुए गोल तरबूज की तरह उभर गये. मेरी छाती पर भगवान के दिये दो अनमोल 'फल' भी अब 'अमरूदों' से बढ़कर मोटी मोटी 'सेबों' जैसे हो गये थे. मैं कई बार बाथरूम में नंगी होकर अचरज से उन्हें देखा करती थी.. छू कर.. दबा कर.. मसल कर. मुझे ऐसा करते हुए अजीब सा आनंद आता .. 'वहाँ भी.. और नीचे भी.

मेरे गोरे चिट्टे बदन पर उस छोटी सी खास जगह को छोड़कर कहीं बालों का नामो-निशान तक नहीं था.. हल्के हल्के मेरी बगल में भी थे. उसके अलावा गरदन से लेकर पैरों तक मैं एकदम चिकनी थी. क्लास के लड़कों को ललचाई नजरों से अपनी छाती पर झूल रहे 'सेबों' को घूरते देख मेरी जाँघों के बीच छिपी बैठी हल्के हल्के बालों वाली, मगर चिकनाहट से भारी तितली के पंख फडफडाने लगते और छातीयों पर गुलाबी रंगत के अनारदाने' तन कर खड़े हो जाते. पर मुझे कोई फरक नहीं पड़ा. हाँ, कभी कभार शर्म आ जाती थी. ये भी नहीं आती अगर मम्मी ने नहीं बोला होता,"अब तू बड़ी हो गयी है अंजु.. ब्रा डालनी शुरू कर दे और चुन भी लिया कर!"

सच कहूँ तो मुझे अपने उन्मुक्त उरोजों को किसी मर्यादा में बांध कर रखना कभी नहीं सुहाया और न ही उनको चुन से परदे में रखना. मौका मिलते ही मैं ब्रा को जानाबूझ कर बाथरूम की खूँटी पर ही टांग जाती और क्लास में मनचले लड़कों को अपने इर्द गिर्द मंडराते देख मजे लेती.. मैं अक्सर जान बूझ अपने हाथ उपर उठा अंगडाई सी लेती और मेरी छातियाँ तन कर झूलने सी लगती. उस वक्त मेरे सामने खड़े लड़कों की हालत खराब हो जाती... कुछ तो अपने होंठों पर ऐसे जीभ फेरने लगते मानों मौका मिलते ही मुझे नोच डालेंगे. क्लास की सब लड़कियां मुझसे जलने लगी.. हालाँकि 'वो' सब उनके पास भी था.. पर मेरे जैसा नहीं..

मैं पढाई में बिल्कुल भी अच्छी नहीं थी पर सभी मेल-टीचर्स का 'पूरा प्यार' मुझे मिलता था. ये उनका प्यार ही तो था की होम-वर्क न करके ले जाने पर भी वो मुस्कराकर बिना कुछ कहे चुपचाप कापी बंद करके मुझे पकड़ा देते.. बाकी सब की पिटाई होती. पर हाँ, वो मेरे पढाई में ध्यान न देने का हर्जाना वसूल करना कभी नहीं भूलते थे. जिस किसी का भी खाली पीरियड निकल आता; किसी न किसी बहाने से मुझे स्टाफरूम में बुला ही लेते. मेरे हाथों को अपने हाथ में लेकर मसलते हुए मुझे समझाते रहते. कमर से चिपका हुआ उनका दूसरा हाथ धीरे धीरे फिसलता हुआ मेरे चूतड़ों पर आ टिकता. मुझे पढाई पर 'और ज्यादा' ध्यान देने को कहते हुए वो मेरे चूतड़ों पर हल्की हल्की चपत लगाते हुए मेरे चूतड़ों की थिरकन का मजा लुटते रहते.. मुझे पढाई के फायेदे गिनवाते हुए अक्सर वो 'भावुक' हो जाते थे, और चपत लगाना भूल चूतड़ों पर ही हाथ जमा लेते. कभी कभी तो उनकी उंगलियाँ स्कर्ट के उपर से ही मेरी 'दरार' की गहराई मापने की कोशिश करने लगती...

उनका ध्यान हर वक्त उनकी थपकियों के कारण लगातार थिरकती रहती मेरी छातीयों पर ही होता था.. पर किसी ने कभी 'उन' पर झपट्टा नहीं मारा. शायद 'वो' ये सोचते होंगे की कहीं में बिदक न जाऊँ.. पर मैं उनको कभी चाहकर भी नहीं बता पाई की मुझे ऐसा करवाते हुए मीठी-मीठी खुजली होती है और बहुत आनंद आता है...

हाँ! एक बात मैं कभी नहीं भूल पाऊँगी.. मेरे हिस्ट्री वाले सर का हाथ ऐसे ही समझाते हुए एक दिन कमर से नहीं, मेरे घुटनों से चलना शुरू हुआ.. और धीरे धीरे मेरी स्कर्ट के अंदर घुस गया. अपनी केले के तने जैसी लंबी गोरी और चिकनी जाँघों पर उनके 'काँपते' हुए हाथ को महसूस करके मैं मचल उठी थी... खुशी के मारे मैंने आँखें बंद करके अपनी जांघें खोल दी और उनके हाथ को मेरी जाँघों के बीच में उपर चड़ता हुआ महसूस करने लगी.. अचानक मेरी फूल जैसी नाजुक चूत से पानी सा टपकने लगा..

अचानक उन्होंने मेरी जाँघों में बुरी तरह फंसी हुई 'कच्छी' के अंदर उंगली घुसा दी.. पर हड़बड़ी और जल्दबाजी में गलती से उनकी उंगली सीधी मेरी चिकनी होकर टपक रही चूत की मोटी मोटी फांकों के बीच घुस गयी.. मैं दर्द से तिलमिला उठी.. अचानक हुए इस प्रहार को मैं सहन नहीं कर पाई. छटपटाते हुए मैंने अपने आपको उनसे छुड़ाया और दीवार की तरफ मुँह फेर कर खड़ी हो गयी... मेरी आँखें डबडबा गयी थी..

मैं इस सारी प्रक्रिया के 'प्यार से' फिर शुरू होने का इंतजार कर ही रही थी की 'वो' मास्टर मेरे आगे हाथ जोड़कर खड़ा हो गया,"प्लीज अंजलि.. मुझसे गलती हो गयी.. मैं बहक गया था... किसी से कुछ मत कहना.. मेरी नौकरी का सवाल है...!" इससे पहले मैं कुछ बोलने की हिम्मत जुटाती; बिना मतलब की बकबक करता हुआ वो स्टाफरूम से भाग गया.. मुझे तडपती छोड़कर..

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Posted : 02/10/2010 2:24 am
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मम्मी ने चिल्लाने की कोशिश की तो वह मम्मी के उपर सवार हो गया और उनका मुँह दबा लिया," तू तो बड़ी कमीनी निकली भाभी.. पता है कितनी देर इंतजार करके आयें हैं खेत में..." फिर सुन्दर की और देखकर बोला,"क्या यार? अभी तक नंगा नहीं किया इस रंडी को.."

उसके चेहरा सुन्दर की और घूमने पर मैंने उन्हें पहचाना.. वो अनिल चाचा थे... हमारे घर के पास ही उनका घर था.. पेशे से डॉक्टर...मम्मी की ही उमर के होंगे... मम्मी को मुश्किल में देख मैं भागकर बिस्तर पर चढ़ी और चाचा को धक्का देकर उनको मम्मी के उपर से हटाने की कोशिश करने लगी,"छोड़ दो मेरी मम्मी को!" मैं रोने लगी...

अचानक मुझे देख कर वो सकपका गया और मम्मी के उपर से उतर गया," तुम.. तुम यहीं हो छोटी?"

मम्मी शर्मिंदा सी होकर बैठ गयी," ये सब क्या है? जाओ यहाँ से.. और सुन्दर की और घूरने लगी... सुन्दर खिसिया कर हँसने लगा...

"अबे पहले देख तो लेता...!" सुन्दर ने अनिल चाचा से कहा....

"बेटी.. तेरी मम्मी का ईलाज करना है... जा बाहर जाकर खेल ले..!" चाचा ने मुझे पुचकारते हुए कहा... पर मैं वहाँ से हिली नहीं...

"जाओ यहाँ से.. वरना मैं चिल्ला दूँगी!" मम्मी विरोध पर उतर आई थी... शायद मुझे देख कर...

"छोड़ न तू .. ये तो बच्ची है.. क्या समझेगी... और फिर ये तेरी प्रॉब्लम है.. हमारी नहीं.. इसको भेजना है तो भेज दे.. वरना हम इसके आगे ही शुरू हो जायेंगे..." सुन्दर ने कहा और सरक कर मम्मी के पास बैठ गया.... मम्मी अब दोनों के बीच बैठी थी...

"तू जा न बेटी.. मुझे तेरे चाचा से ईलाज करवाना है.. मेरे पेट में दर्द रहता है..." मम्मी ने हालात की गंभीरता को समझते हुए मुझसे कहा...

मैंने न मैं सर हिला दिया और वहीं खड़ी रही....

वो इंतजार करने के मूड में नहीं लग रहे थे.. चाचा मम्मी के पीछे जा बैठे और उनके दोनों तरफ से पैर पसार कर मम्मी की चूचियों को दबोच लिया.. मम्मी सिसक उठी.. वो विरोध कर रही थी पर उनपर कोई असर नहीं हुआ...

"नीचे से दरवाजा बंद है न?" सुन्दर ने चाचा से पूछा और मम्मी की टांगों के बीच बैठ गया...

"सब कुछ बंद है यार.. आजा.. अब इसकी खोल दें.." चाचा ने मम्मी का कमीज खींच कर उनकी ब्रा से उपर कर दिया....

"एक मिनट छोडो भी... " मम्मी ने झल्लाकर कहा तो वो ठिठक गये," अच्छा छोटी.. रह ले यहीं.. पर किसी को बोलेगी तो नहीं न.. देख ले... मैं मर जाउंगी!"

"नहीं मम्मी.. मैं किसी को कुछ नहीं बोलेगी... आप मरना मत.. रात वाली बात भी नहीं बताउंगी किसी को..." मैंने भोलेपन से कहा तो तीनो अवाक से मुझे देखते रह गये...

"ठीक है.. आराम से कोने में बैठ जा!" सुन्दर ने कहा और मम्मी की सलवार का नाड़ा खींचने लगा....

कुछ ही देर बाद उन्होंने मम्मी को मेरे सामने ही पूरी तरह नंगी कर दिया..

मैं चुपचाप सारा तमाशा देखती जा रही थी.. मम्मी नंगी होकर मुझे और भी सुन्दर लग रही थी.. उनकी चिकनी चिकनी लंबी माँसल जांघें.. उनकी छोटे छोटे काले बालों में छिपी चूत.. उनका कसा हुआ पेट और सीने पर झूल रही मोटी मोटी चूचियाँ सब कुछ बड़ा प्यारा था...

सुन्दर मम्मी की जाँघों के बीच झुक गया और उनकी जाँघों को उपर हवा में उठा दिया.. फिर एक बार मेरी तरफ मुड़कर मुस्कराया और पिछली रात की तरह मम्मी की चूत को लपर लपर चाटने लगा....

मम्मी बुरी तरह सिसिया उठी और अपने चूतड़ों को उठा उठा कर पटकने लगी.. चाचा मम्मी की दोनों चूचियों को मसल रहा था और मम्मी के निचले होंठ को मुँह में लेकर चूस रहा था...

करीब 4-5 मिनट तक ऐसे ही चलता रहा... मैं समझने की कोशिश कर ही रही थी की आखिर ये ईलाज कौनसा है.. तभी अचानक चाचा ने मम्मी के होंठों को छोड़कर बोला," पहले तू लेगा या मैं ले लूं..?"

सुन्दर ने जैसे ही चेहरा उपर उठाया, मुझे मम्मी की चूत दिखाई दी.. सुन्दर के थूक से वो अंदर तक सनी पड़ी थी.. और चूत के बीच की पत्तियां अलग अलग होकर फांकों से चिपकी हुई थी.. मुझे पता नहीं था की ऐसा क्यूँ हो रहा है.. पर मेरी जाँघों के बीच भी खलबली सी मची हुई थी...

"मैं ही कर लेता हूँ यार! पर थोड़ी देर और रुक जा.. चाची की चूत बहुत मीठी है..." सुन्दर ने कहा और अपनी पेंट निकल दी.. इसी पल का तो मैं इंतजार कर रही थी.. सुन्दर का कच्छा सीधा उपर उठा हुआ था और मुझे पता था की क्यूँ?

सुन्दर वापस झुक गया और मम्मी की चूत को फिर से चाटने लगा... उसका भारी भरकम लंड अपने आप ही उसके कच्छे से बाहर निकल आया और मेरी आँखों के सामने लटका हुआ रह रह कर झटके मार रहा था...

चाचा ने मेरी और देखा तो मैंने शर्माकर अपनी नजरें झुका ली....

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Posted : 02/10/2010 2:36 am
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मम्मी ने अपना मुँह पूरा खोल दिया और सुन्दर ने अपना लंड उनके होंठों पर रख कर थोड़ा सा अंदर कर दिया... इसके साथ ही सुन्दर की आँखें बंद हो गयी और वो सिसकता हुआ मम्मी को शायद वही रस पिलाने लगा जो उसने पिछली रात पिलाया था....मम्मी भी आँखें बंद किये उसका रस पीती जा रही थी.. पीछे से मम्मी को चाचा के धक्के लग रहे थे...

"ले.. अब मुँह में लेकर इसको साफ़ कर दे..." सुन्दर ने कहा और मम्मी ने उसका लंड थोड़ा सा और मुँह में ले लिया.....रस निकल जाने के बाद सुन्दर का लंड शायद थोड़ा पतला हो गया होगा...

अचानक चाचा हटे और सीधे खड़े हो गये... वो भी शायद मम्मी के मुँह की और जान चाहते थे.. पर जाने क्या हुआ.. अचानक रुक कर उन्होंने अपना लंड जोर से खींच लिया और मम्मी के नितंबो पर ही रस की धार छोड़ने लगे...

मुझे नहीं पता था की मुझे क्या हो गया है.. पर मैं पूरी तरह से लाल हो चुकी थी.. मेरी कच्छी भी 2 तीन बार गीली हुई.. ऐसा लगता था....

सुन्दर बिस्तर से उतर कर अपनी पेंट पहनने लगा और मेरी और देख कर मुस्कराया," तू भी बहुत गरम माल बनेगी एक दिन.. साली इतने चस्के से सब कुछ देख रही थी... थोड़ी और बड़ी हो जा जल्दी से.. फिर तेरी मम्मी की तरह तुझे भी मजे दूँगा..."मैंने अपना मुँह दूसरी तरफ कर लिया....

चाचा के बिस्तर से नीचे उतरते ही मम्मी निढाल होकर बिस्तर पर गिर पड़ी.. उन्होंने बिस्तर की चादर खींच कर अपने बदन और चेहरे को ढक लिया... वो दोनों कपड़े पहन वहाँ से निकल गये....

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Posted : 02/10/2010 2:36 am
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वो दिन था और आज का दिन.. एक एक पल ज्यों का त्यों याद करते ही आँखों के सामने दौड़ जाता है... वो भी जो मैंने उनके जाने के बाद मम्मी के पास बैठ कर पूछा था...," ये कैसा ईलाज था मम्मी?"

"जब बड़ी होगी तो पता चल जायेगा.. बड़ी होने पर कई बार पेट में अजीब सी गुदगुदी होती है.. ईलाज न करवाएं तो लड़की मर भी सकती है.. पर शादी के बाद की बात है ये.. तू भूल जा सब कुछ.. मेरी बेटी है न?"

"हाँ मम्मी!" मैं भावुक होकर उनके सीने से चिपक गयी...

"तो बताएगी नहीं न किसी को भी...?" मम्मी ने प्यार से मुझे अपनी बाहों में भर लिया...

"नहीं मम्मी... तुम्हारी कसम! पर ईलाज तो चाचा करते हैं न... सुन्दर क्या कर रहा था...?" मैंने उत्सुकता से पूछा....

"वो अपना ईलाज करा रहा था बेटी... ये प्रॉब्लम तो सबको होती है..." मम्मी ने मुझे बरगलाया....

"पर आप तो कह रहे थे की शादी के बाद होता है ये ईलाज.. उसकी तो शादी भी नहीं हुई..?" मैंने पूछा था...

"अब बस भी कर.. बहुत सयानी हो गयी है तू... मुझे नहीं पता..." मम्मी ने बिदक कर कहा और उठ कर कपड़े पहनने लगी...

" पर उन्होंने आपके साथ अपना ईलाज क्यूँ किया? अपने घर पर क्यूँ नहीं.. उनकी मम्मी हैं, बहन हैं.. कितनी ही लड़कियां तो हैं उनके घर में.. !" मुझे गुस्सा आ रहा था.. 5 रुपये में अपना ईलाज कराके ले गया कमीना!

"तुझे नहीं पता बेटी... हमें उनका बहुत सा कर्जा चूकाना है.. अगर मैं उसको ईलाज करने नहीं देती तो वो मुझे उठा ले जाता हमेशा के लिये... पैसों के बदले में... फिर कौन बनती तेरी मम्मी..?" मम्मी ने कपड़े पहन लिये थे....

मैं नादान एक बार फिर भावुक होकर उनसे लिपट गयी.. मैंने मुठ्ठी खोल कर अपने हाथ में रखे 5 रुपये के सिक्के को नफरत से देखा और उसको बाहर छत पर फैंक दिया," मुझे नहीं चाहिए उसके रुपये.. मुझे तो बस मम्मी चाहिए..."

उसके बाद जब भी मैं उसको देखती.. मुझे यही याद आता की हमें उनका कर्ज उतारना है.. नहीं तो वो एक दिन मम्मी को उठा कर ले जायेगा... और मेरी आँखें उसके लिये घृणा से भर उठी.. हर बार उसके लिये मेरी नफरत बढ़ती ही चली गयी थी...

सालों बाद, जब मुझे ये अहसास हो गया था की मम्मी झूठ बोल रही थी.. तब भी; मेरी उसके लिये नफरत बरकरार रही जो आज तक ज्यों की त्यों है.... यही वजह थी की उस दिन अपने बदन में सुलग रही यौवन की आग के बावजूद उसको खुद तक आने नहीं दिया था....

खैर.. मैं उस दिन शाम को फिर नहा धोकर तैयार हो चश्मू के आने का इंतजार करने लगी....

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Posted : 02/10/2010 2:37 am
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ठीक पिछले दिन वाले टाइम पर ही तरुण ने नीचे आकर आवाज लगायी... मुझे पता था की वो शाम को ही आयेगा.. पर क्या करती, निगोड़ा दिल उसके इंतजार में जाने कब से धड़क रहा था.. मैं बिना अपनी किताबें उठाये नीचे भागी.. पर नीचे उसको अकेला देखकर मैं हैरान रह गयी...

"रिंकी नहीं आई क्या?" मैंने बड़ी अदा से अपनी भीनी मुस्कान उसकी और उछाली....

"नहीं.. उसका फोन आ गया था.. वो बीमार है.. आज स्कूल भी नहीं गयी वो!" तरुण ने सहज ही कहा....

"अच्छा... क्या हुआ उसको? कल तक तो ठीक थी..." मैंने उसके सामने खड़ी होकर अपने हाथों को उपर उठा एक मादक अंगडाई ली.. मेरा सारा बदन चटक गया.. पर उसने देखा तक नहीं गौर से... जाने किस मिट्टी का बना हुआ था....

"पता नहीं.. आओ!" कहकर वो कमरे में जाने लगा....

"उपर ही चलो न! चारपाई पर तंग हो जाते हैं..." मैं बाहर ही खड़ी थी..

"कहा तो था कल भी, की चेअर डाल लो... यहीं ठीक है.. कल यहाँ चेअर डाल लेना.." उसने कहा और चारपाई पर जाकर बैठ गया...

"आ जाओ न.. उपर कोई भी नहीं है..." मैं दोनों हाथों को दरवाजे पर लगाकर खड़ी हो गयी... आज भी मैंने स्कूल ड्रेस ही डाली थी.. मेरी स्कर्ट के नीचे दिख रही घुटनों तक की चिकनी टांगें किसी को भी उसके अंदर झाँकने को ललायित कर सकती थी.. पर तरुण था की मेरी और देख ही नहीं रहा था," उपर टेबल भी है और चेअरस भी... चलो न उपर!" मैंने आग्रह किया....

अब की बार वो खड़ा हो गया.. अपने चश्मा ठीक किये और 2 कदम चल कर रुक गया," चलो!"

मैं खुशी खुशी उसके आगे आगे मटकती हुई चलकर सीढियां चढ़ने लगी.. यूँ तो मेरी कोशिश के बिना भी चलते हुए मेरी कमर में कामुक लचक रहती थी... जान बूझ कर और बल खाने से तो मेरे पिछवाड़े हाहाकार मच रहा होगा.. मुझे विश्वास था....

उपर जाने के बाद वो बाहर ही खड़ा रह गया.. मैंने अंदर जाने के बाद मुड़कर देखा," आओ न.. अंदर!" मैंने मुस्कराकर उसको देखा... मेरी मुस्कराहट में हरपल एक कातिल निमंत्रण रहता था.. पर जाने क्यूँ वह समझ नहीं पा रहा था... या फिर जानबूझ कर मुझे तड़पा रहा हो.... शायद!

तरुण अंदर आकर कुर्सी पर बैठ गया.. टेबल के सामने...

"कौनसी बुक लेकर आऊं पहले!" मेरे चेहरे पर अब भी वैसी ही मुस्कान थी...

"साईंस ले आओ! पहले वही पढ़ लेते हैं.." तरुण ने मेरे चेहरे के भावों को पढ़ने की पहली बार कोशिश सी की... मुझे बड़ा आनंद आया.. मेरी और उसको यूँ लगातार देखते पाकर....

"ठीक है..." मैंने कहा और बैग में किताब ढूंढने लगी... किताब मुझे मिल गयी पर मैंने उसके देखने के ढंग से उत्साहित होकर नहीं निकाली," पता नहीं कहाँ रख दी... रात को मैं पढ़ रही थी.. हम्म्म्म? " मैंने थोड़ा सोचने का नाटक किया और उसकी तरफ पीठ करके अपने घुटने जमीन पर रखे और चूतड़ों को उपर उठा आगे से बिल्कुल झुक कर बेड के नीचे झाँकने लगी... ठीक उसी तरह जिस तरह अनिल चाचा ने मम्मी को झुका रखा था उस दिन; बेड पर....

इस तरह झुक कर अपने चूतड़ उपर उठाने से यक़ीनन मेरी स्कर्ट जांघों तक खिसक आई होगी.. और उसको मेरी चिकनी गदराई हुई गोरी जांघें मुफ्त में देखने को मिली होगी... मैं करीब 30-40 सेकंड तक उसी पोजीशन में रहकर बेड के नीचे नजरें दौड़ाती रही...

जब मैं खड़ी होकर पलटी तो उसका चेहरा देखने लायक था.. उसने नजरें जमीन में गड़ा रखी थी... उसके गोरे गाल लाल हो चुके थे.. ये इस बात का सबूत था की उसने 'कुछ' न 'कुछ' तो जरूर देखा है...

"यहाँ तो नहीं मिली.. क्या करूँ?" मैं उसकी और देख कर एक बार फिर मुस्कराई.. पर उसने कोई रिस्पोंस न दिया....

"मुझे अलमारी के उपर चढ़ा दोगे क्या? क्या पता मम्मी ने उपर फैंक दी हो..." मेरे मन में सब कुछ क्लीअर था की अब की बार क्या करना है...

"रहने दो.. मैं देख लेता हूँ.." वो कहकर उठा और अलमारी को उपर से पकड़ कर कोहनियाँ मोड़ उपर सरक गया,"नहीं.. यहाँ तो कुछ भी नहीं है... छोडो.. तुम मैथ ही ले आओ.. कल तक ढूंढ लेना..."

मैंने मायूस सी होकर मैथ की किताब बैग से निकल कर टेबल पर पटक दी.. अब काठ की हाँदी बार बार चढ़ाना तो ठीक नहीं है न....

"वो पढ़ाने लगा ही था की मैंने टोक दिया," यहाँ ठीक से दिखाई नहीं दे रहा.. सामने बेड पर बैठ जाऊं क्या?"

"लगता है तुम्हारा पढ़ने का मन है ही नहीं.. अगर नहीं है तो बोल दो.. बेकार की मेहनत करने का क्या फ़ायदा..." तरुण ने हल्की सी नाराजगी के साथ कहा....

मैंने अपने रसीले होंठ बाहर निकाले और मासूम बनने की एक्टिंग करते हुए हाँ में सर हिला दिया," कल कर लेंगे पढाई.. आज रिंकी भी नहीं है.. उसकी समझ में कैसे आयेगा नहीं तो?"

"ठीक है.. मैं चलता हूँ.. अब जब रिंकी ठीक हो जायेगी.. तभी आऊँगा..." वह कहकर खड़ा हो गया....

"अरे बैठो बैठो... एक मिनट..." मैंने पूरा जोर लगाकर उसको वापस कुर्सी पर बिठा ही दिया... वो पागल हुआ हो न हो.. पर मैं उसको छू कर मदहोश जरूर हो गयी थी.....

"क्या है अब!" उसने झल्ला कर कहा....

"बस एक मिनट..." मैंने कहा और किचन में चली गयी.....

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Posted : 02/10/2010 2:37 am
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कुछ ही पलों बाद में अपने हाथों में चाय और बिस्कुट्स लेकर उसके सामने थी.. मैंने वो सब टेबल पर उसके सामने परोस दिया.. परोस तो मैंने खुद को भी दिया ही था उसके सामने, पर वो समझे तब न!

"थैंक्स.. पर इसकी क्या जरूरत थी..." उसने पहली बार मुस्करा कर मेरी और देखा... मैं खुश होकर उसके सामने बेड पर बैठ गयी...

"अंजलि! तुम स्कूल क्यूँ नहीं जाती...? रिंकी बता रही थी..." चाय की पहली चुस्की लेते हुए उसने पूछा....

"अब क्या बताऊँ?" मैंने बुरा सा मुँह बना लिया....

"क्यूँ क्या हुआ?" उसने हैरत से मेरी और देखा.. मैंने कहा ही इस तरह से था की मानों बहुत बड़ा राज मैं छिपाने की कोशिश कर रही हूँ.. और पूछने पर बता दूँगी....

"वो...." मैंने बोलने से पहले हल्का सा विराम लिया," पापा ने मना कर दिया..."

"पर क्यूँ?" वह लगातार मेरी और ही देख रहा था.....

"वो कहते हैं की...." मैं चुप हो गयी और जानबूझ कर अपनी टांगों को मोड़ कर खोल दिया... उसकी नजरें तुरंत झुक गयी.. मैं लगातार उसकी और देख रही थी.. नजरें झुकाने से पहले उसकी आँखें कुछ देर मेरी स्कर्ट के अंदर जाकर ठहरी थी... मेरी कच्छी के दर्शन उसको जरूर हुए होंगे....

कुछ देर यूँही ही नजरें झुकी रहने के बाद वापस उपर उठने लगी.. पर इस बार धीरे धीरे... मैंने फिर महसूस किया.. मेरी जांघों के बीच झाँकता हुआ वो कसमसा उठा था.... उसने फिर मेरी आँखों में आँखें डाल ली....

"क्या कहते हैं वो.." उसकी नजरें बार बार नीचे जा रही थी...

मैंने जांघें थोड़ी सी और खोल दी...," वो कहते हैं की मैं जवान हो गयी हूँ.. आप ही बताओ.. जवान होना न होना क्या किसी के हाथ में होता है... ये क्या कोई बुरी बात है.... मैं क्या सच में इतनी जवान हो गयी हूँ की स्कूल ही न जा सकूं?"

एक बार फिर उसने नजरें झुका कर स्कर्ट के अंदर की मेरी जवानी का जायेजा लिया... उसके चेहरे की बदली रंगत ये पुष्टि कर रही थी की उसका मन भी मान रहा है की मैं जवान हो चुकी हूँ; और पके हुए रसीले आम की तरह मुझे तोड़ा नहीं गया तो मैं खुद ही टूटकर गिरने को बेताब हूँ.....

"ये तो कोई बात नहीं हुई... जरूर कोई दूसरी वजह रही होगी... तुमने कोई शरारत की होगी.. तुम छिपा रही हो..." अब उसकी झिझक भी खुल सी गयी थी.. अब वह उपर कम और मेरी जाँघों के बीच ज्यादा देख रहा था.. उसकी जाँघों के बीच पेंट का हिस्सा अब अलग ही उभरा हुआ मुझे दिखाई दे रहा था....

"नहीं.. मैंने कोई शरारत नहीं की.. वो तो किसी लड़के ने मेरे बैग में गंदी गंदी बातें लिख कर डाल दी थी.. वो पापा को मिल गया..." पूरी बेशर्मी के साथ बोलते बोलते मैंने उसके सामने ही अपनी स्कर्ट में हाथ डाल अपनी कच्छी को ठीक किया तो वो पगला सा गया....

"आ..ऐसा क्या किया था उसने...? मतलब ऐसा क्या लिखा था..." अब तो उसकी नजरें मेरी कच्छी से ही चिपक कर रह गयी थी.....

"मुझे शर्म आ रही है... !" मैंने कहा और अपनी जाँघों को सिकोड़ कर वापस आलथी पालथी लगा ली... मुझे लग रहा था की अब तक वो इतना बेसब्र हो चूका होगा की कुछ न कुछ जरूर कहेगा या करेगा....

मेरा शक गलत नहीं था... मेरी कच्छी के दर्शन बंद होते ही उसका लट्टू सा फ़्यूज़ हो गया... कुछ देर तो उसको कुछ सूझा ही नहीं... फिर अचानक उठते हुए बोला," अच्छा! मैं चलता हूँ... एक बात बोलूँ?"

"हाँ..!" मैंने शर्माकर अपनी नजरें झुका ली.. पर उसने ऐसा कुछ कहा की मेरे कानों से धुँआ उठने लगा...

"तुम सच में ही जवान हो चुकी हो.. जब कभी स्कर्ट पहनों तो अपनी टांगें यूँ न खोला करो.. वरना तुम्हारे पापा तुम्हारा टयूशन भी हटवा देंगे..." उसने कहा और बाहर निकलने लगा....

मैंने भागकर उसकी बाँह पकड़ ली," ऐसा क्यूँ कह रहे हो..?"

वो दरवाजे के साथ खड़ा था और मैं अपने दोनों हाथों से उसके हाथ पकड़े उसके सामने खड़ी थी....

"मैंने सिर्फ सलाह दी है.. बाकी तुम्हारी मरजी...!" उसने सिर्फ इतना ही कहा और अपनी नजरें मुझसे हटा ली.....

"तुम्हे मैं बहुत बुरी लगती हूँ क्या?" मैंने भरभरा कर कहा... उसके इस कदर मुझे लज्जित करके उठने से मैं आहत हुई थी... आज तक तो किसी ने भी नहीं किया था ऐसा... दुनिया मुझे एक नजर देखने को तरसती थी और मैंने उसको अपनी दुनिया ही दिखा दी थी... फिर भी!

"अब ये क्या पागलपन है... छोडो मुझे...!" उसने हल्का सा गुस्सा दिखाते हुए कहा....

नारी कुछ भी सहन कर सकती है.. पर अपने बदन की उपेक्षा नहीं.. मेरे अंदर का नारी-स्वाभिमान जाग उठा.. मैं उससे लिपट गयी.. चिपक गयी," प्लीज.. बताओ न.. मैं सुन्दर नहीं हूँ क्या? क्या कमी है मुझमे.. मुझे तड़पाकर क्यूँ जा रहे हो....."

मेरी छातियाँ उसमे गड़ी हुई थी... मैं उपर से नीचे तक उससे चिपकी हुई थी.. पर उसपर कोई असर न हुआ," हटो! अपने साथ क्यूँ मुझे भी जलील करने पर तूली हुई हो... छोडो मुझे... मैं आज के बाद यहाँ नहीं आने वाला..." कहकर उसने जबरदस्ती मुझे बिस्तर की तरफ धकेला और बाहर निकल गया....

मेरी आँखें रो रो कर लाल हो गयी... वह मुझे इस कदर जलील करके गया था की मैं घर वालों के आने से पहले बिस्तर से उठ ही न सकी.....

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Posted : 02/10/2010 2:38 am
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जब दो दिन तक लगातार वो नहीं आया तो पापा ने उसको घर बुलाया....," तुम आते क्यूँ नहीं बेटा?" मैं पास खड़ी थरथर कांप रही थी.. कहीं वो पापा को कुछ बता न दे.....

"वो क्या है चाचा जी... आजकल मेरे एग्जाम की भी तैयारी करनी पड़ रही है.. और रात को धरमपाल के घर जाना होता है.. उनकी बेटियों को पढ़ाने के लिये.. इसीलिए टाइम कम ही मिल पता है..." बोलते हुए उसने मेरी तरफ देखा.... मैंने आँखों ही आँखों में उसका धन्यवाद किया.....

"हम्म्म्म... कौनसी क्लास में हैं उसकी बेटियाँ?" पापा ने पूछा....

"एक तो इसकी क्लास में ही है.. दूसरी इस साल कॉलेज जाने लगी है.. उसको इंग्लिश पढ़ाकर आता हूँ...." उसने जवाब दिया....

"तो तू ऐसा क्यूँ नहीं करता.. उनको भी यहीं बुला ले... नीचे कमरा तो खाली है ही अपना.. जब तक चाहे पढ़ा....!" पापा ने कहा....

"नहीं... वो यहाँ नहीं आयेंगी चाचा... मुझे दुगने पे करते हैं वो.. उनके घर रात को पढ़ाने के लिये... उन्होंने मेरे घर आने से भी मना कर दिया था...." तरुण ने बताया....

"ओह्ह.. तो ठीक है.. मैं धरमपाल से बात कर लूँगा... अंजलि भी वहीं पढ़ लेगी.. वो तो अपना ही घर है..." पापा ने जाने कैसे ये बात कह दी... मुझे बड़ा अजीब सा लगा था...," पर तुम्हे घर छोड़ कर जाना पड़ेगा अंजु को.. रात की बात है और लड़की की जात है...."

तरुण ने हाँ में सर हिला दिया... और मेरा रात का टयूशन सेट हो गया... धरमपाल चाचा के घर.....

धरमपाल चाचा की दोनों लड़कियां बड़ी खूबसूरत थी... बड़ी को मेरे मुकाबले की कह सकते हैं.. मिनाक्षी... पिछले साल ही हमारे स्कूल से बारहवी की परीक्षा पास की थी... उसका यौवन भी मेरी तरह पूरे शबाब पर था... पर दिल से कहूँ तो वो मेरी तरह चंचल नहीं थी... बहुत ही शर्मीली और शरीफ स्वाभाव की थी.... घर बाहर सब उसको मीनू कहते थे.... प्यार से...

छोटी मेरी उमर की ही थी.. पर शरीर में मुझसे थोड़ी हल्की पड़ती थी... वैसे सुन्दर वो भी बहुत थी और चंचल तो मुझसे भी ज्यादा... पर उसकी चंचलता में मेरी तरह तड़प नहीं थी.. उन्मुक्त व्यवहार था उसका.. पर बच्चों की तरह... घर वालों के साथ ही आस पड़ोस में सबकी लाडली थी वो.. प्रियंका! हम सब उसको पिंकी कहते थे...

अगले दिन में ठीक 7 बजे नहा धोकर टयूशन जाने के लिये तैयार हो गयी.. यही टाइम बताया था तरुण ने. मन ही मन मैं 3 दिन पहले वाली बात याद करके झिझक सी रही थी.. उसका सामना करना पड़ेगा, यही सोच कर मैं परेशान सी थी.. पर जाना तो था ही, सो मैंने अपना बैग उठाया और निकल ली....

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Posted : 02/10/2010 2:38 am
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धरमपाल चाचा के घर जाकर मैंने आवाज लगायी,"पिंकी!"

तभी नीचे बैठक का दरवाजा खुला और पिंकी बाहर निकाली," आ गयी अंजु! आ जाओ.. हम भैया का इंतजार कर रहे हैं..." उसने प्यार से मेरी बाँह पकड़ी और अंदर ले गयी..

मैं मीनू की तरफ देख कर मुस्कराई.. वो रजाई में दुबकी बैठी कुछ पढ़ रही थी...

"तुम भी आज से यहीं पढ़ोगी न अंजु? पापा बता रहे थे...!" मीनू ने एक नजर मुझको देखा और मुस्करा दी....

"हाँ... दीदी!" मैंने कहा और पिंकी के साथ चारपाई पर बैठ गयी..," यहीं पढ़ाते हैं क्या वो!"

जवाब पिंकी ने दिया," हाँ.. उपर t.v. चलता रहता है न... वहाँ शोर होता है...इसीलिए यहीं पढ़ते हैं हम! तुम स्कूल क्यूँ नहीं आती अब.. सब टीचर्स पूछते रहते हैं.. बहुत याद करते हैं तुम्हे सब!"

हाय! क्या याद दिला दिया पिंकी ने! मैं भी तो उन दिनों को याद कर कर के तडपती रहती थी.. टीचर्स तो याद करते ही होंगे! खैर.. प्रत्यक्ष में मैं इतना ही बोली," पापा कहते हैं की एग्जामस का टाइम आ रहा है... इसीलिए घर रहकर ही पढाई कर लूं...

"सही कह रही हो.. मैं भी पापा से बात करूँगी.. स्कूल में अब पढाई तो होती नहीं..." पिंकी ने कहा....

"कब तक पढ़ाते हैं वो.." मैंने पूछा....

"कौन भैया? वो तो देर रात तक पढ़ाते रहते हैं.. पहले मुझे पढ़ाते हैं.. और जब मुझे लटके आने शुरू हो जाते हैं ही ही ही...तो दीदी को... कई बार तो वो यहीं सो जाते हैं...!" पिंकी ने विस्तार से जानकारी दी....

मीनू ने हमें टोक दिया," यार.. प्लीज! अगर बात करनी है तो बाहर जाकर कर लो.. मैं डिस्टर्ब हो रही हूँ..."

पिंकी झट से खड़ी हो गयी और मीनू की और जीभ दिखा कर बोली," चल अंजु.. जब तक भैया नहीं आ जाते.. हम बाहर बैठते हैं...!"

हम बाहर निकाले भी नहीं थे की तरुण आ पहुँचा... पिंकी तरुण को देखते ही खुश हो गयी," नमस्ते भैया..!"

सिर्फ पिंकी ने ही नमस्ते किये थे.. मीनू ने नहीं.. वो तो चारपाई से उठी तक नहीं... मैं भी कुछ न बोली.. अपना सर झुकाये खड़ी रही....

तरुण ने मुझे नीचे से उपर तक गौर से देखा.. मुझे नहीं पता उसके मन में क्या आया होगा.. पर उस दिन में उपर से नीचे तक कपड़ों से लद कर गयी थी.. सिर्फ उसको खुश करने के लिये... उसने स्कर्ट पहनने से मना जो किया था मुझे..

"आओ बैठो!" उसने सामने वाली चारपाई पर बैठ कर वहाँ रखा कमबल ओढ़ लिया.. और हमें सामने बैठने का इशारा किया...

पिंकी और मैं उसके सामने बैठ गये.. और वो हमें पढ़ाने लगे.. पढ़ाते हुए वो जब भी कापी में लिखने लगता तो मैं उसका चेहरा देखने लगती.. जैसे ही वह उपर देखता तो मैं कापी में नजरें गड़ा लेती... सच में बहुत क्यूट था वो.. बहुत स्मार्ट था!

उसको हमें पढ़ाते करीब तीन घंटे हो गये थे.. जैसा की पिंकी ने बताया था.. उसको 10:00 बजते ही नींद आने लगी थी," बस भैया.. मैं कल सारा याद कर लूंगी.. अब नींद आने लगी है...."

"तेरा तो रोज का यही ड्रामा है... अभी तो 10:30 भी नहीं हुए..." तरुण ने बड़े प्यार से कहा और उसके गाल पकड़ कर खींच लिये... मैं अंदर तक जल भुन गयी.. मेरे साथ क्यूँ नहीं किया ऐसा.. जबकी मैं तो अपना सब कुछ 'खिंचवाने' को तैयार बैठी थी... खैर.. मैं सब्र का घूँट पीकर रह गयी.....

"मैं क्या करूँ भैया? मुझे नींद आ ही जाती है.. आप थोड़ा पहले आ जाया करो न!" पिंकी ने हँसते हुए कहा.. ताज्जुब की बात थी उसको मर्द के होंठ अपने गालों पर लगने से जरा सा भी फर्क नहीं पड़ा.. उसकी जगह मैं होती तो... काश! मैं उसकी जगह होती....

"ठीक है.. कल अच्छे से तैयार होकर आना.. मैं टेस्ट लूँगा.." कहते हुए उसने मेरी तरफ देखा," तुम क्यूँ मुँह फुलाए बैठी हो.. तुम्हे भी नींद आ रही है क्या?"

मैंने उसकी आँखों में आँखें डाली और कुछ देर सोचने के बाद उत्तर दिया.. इशारे से अपना सर 'न' में हीलाकर... मुझे नींद भला कैसे आती.. जब इतना स्मार्ट लड़का मेरे सामने बैठा हो....

"तुम्हे पहले छोड़ कर आऊं या बाद में साथ चलोगी..." वह इस तरह बात कर रहा था जैसे पिछली बातों को भूल ही गया हो.. किस तरह मुझे तडपती हुई छोड़ कर चला आया था घर से... पर फिर भी मुझे उसका मुझसे उस घटना के बाद 'डाइरेक्ट' बात करना बहुत अच्छा लगा....

"आ.. आपकी मरजी है...!" मैंने एक बार फिर उसकी आँखों में आँखें डाली....

"ठीक है.. चलो तुम्हे छोड़ आता हूँ... पहले.." वह कहकर उठने लगा था की तभी चाची नीचे आ गयी," अरे.. रुको! मैं तो चाय बनाकर लायी थी की नींद खुल जायेगी.. पिंकी तो खर्राटे ले रही है..."

चाची ने हम तीनो को चाय पकड़ा दी और वहीं बैठ गयी..," अंजु! अगर यहीं सोना हो तो यहाँ सो जाओ! सुबह उठकर चली जाना... अब रात में कहाँ जाओगी.. इतनी दूर..."

"मैं छोड़ आऊँगा चाची.. कोई बात नहीं..." तरुण चाय की चुस्की लेता हुआ बोला....

"चलो ठीक है.. तुम अगर घर न जाओ तो याद करके अंदर से कुंडी लगा लेना.. मैं तो जा रही हूँ सोने... उस दिन कुत्ते घुस गये थे अंदर..." चाची ने ये बात तरुण को कही थी.. मेरे अचरज का ठिकाना न रहा.. कितना घुल मिल गया था तरुण उन सबसे.. अपनी जवान बेटी को उसके पास छोड़ कर सोने जा रही हैं चाची जी... और उपर से ये भी छूट की अगर सोना चाहे तो यहीं सो सकता है... मैं सच में हैरान थी... मुझे दाल में कुछ न कुछ काला तो होने का शक पक्का हो रहा था... पर मैं कुछ बोली नहीं....

"ऐ पिंकी.. चल उपर...!" चाची ने पिंकी के दोनों हाथ पकड़ कर उसको बैठा दिया... पिंकी इशारा मिलते ही उसके पीछे पीछे हो ली.. जैसे उसकी आदत हो चुकी हो....

"चलो!" तरुण ने चाय का कप ट्रे में रखा और खड़ा हो गया... मैं उसके पीछे पीछे चल दी....

रास्ते भर हम कुछ नहीं बोंले.. पर मेरे मन में एक ही बात चक्कर काट रही थी..," अब मीनू और तरुण अकेले रहेंगे... और जो कुछ चाहेंगे.. वही करेंगे....

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Posted : 02/10/2010 2:39 am
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अगले दिन मैंने बातों ही बातों में पिंकी से पूछा था," मीनू कहाँ सोती है?"

"पता नहीं.. पर शायद वो भी उपर ही आ जाती हैं बाद में.. वो तो हमेशा मुझसे पहले उठ जाती हैं... क्यूँ?" पिंकी ने बिना किसी लाग लपेट के जवाब दे दिया...

"नहीं, बस ऐसे ही.. और तुम?" मैंने उसकी बात को टाल कर फिर पूछा....

"मैं.. मैं तो कहीं भी सो जाती हूँ.. उपर भी.. नीचे भी... तुम चाहो तो तुम भी यहीं सो जाया करो.. फिर तो मैं भी रोज नीचे ही सो जाउंगी.. देखो न कितना बड़ा कमरा है..." पिंकी ने दिल से कहा....

"पर.. तरुण भी तो यहाँ सो जाता है न.. एक आध बार!" मेरी छानबीन जारी थी...

"हाँ.. तो क्या हुआ? यहाँ कितनी चारपाई हैं.. 6!" पिंकी ने गिन कर बताया...

"नहीं.. मेरा मतलब.. लड़के के साथ सोने में शर्म नहीं आएगी क्या?" मैंने उसका मन टटोलने की कोशिश की....

"धत्त! कैसी बातें कर रही हो.. 'वो' भैया हैं.. और मम्मी पापा दोनों कहते हैं की वो बहुत अच्छे हैं.. और हैं भी..मैं भी कहती हूँ!" पिंकी ने सीना तान कर गर्व से कहा....

मेरी समझ में कुछ नहीं आ रहा था.. मैं खड़ी खड़ी अपना सर खुजाने लगी थी.. तभी मीनू नीचे आ गयी और मैंने उसको चुप रहने का इशारा कर दिया....
पिंकी के घर जाकर पढ़ते हुए मुझे हफ्ता भर हो गया था.. तरुण भी तब तक मेरी उस हरकत को पूरी तरह भूल कर मेरे साथ हँसी मजाक करने लगा था.. पर मैं इतना खुलकर उससे कभी बोल नहीं पाई.. वजह ये थी की मेरे मन में चोर था.. मैं तो उसका चेहरा देखते ही गरम हो जाती थी और घर वापस आकर जब तक नींद के आगोश में नहीं समां जाती; गरम ही रहती थी...

मन ही मन मीनू और उसके बीच 'कुछ' होने के शक का कीड़ा भी मुझे परेशान रखता था..मीनू उससे इतनी बात नहीं करती थी.. पर दोनों की नजरें मिलते ही उनके चहरों पर उभर आने वाली कामुक सी मुस्कान मेरे शक को और हवा दे जाती थी.. शक्ल सूरत और 'पुट्ठे छातीयों' के मामले में मैं मीनू से 20 ही थी.. फिर भी जाने क्यूँ मेरी तरफ देखते हुए उसकी मुस्कान में कभी वो रसीलापन नजर नहीं आया जो उन दोनों की नजरें मिलने पर अपने आप ही मुझे अलग से दिख जाता था...

सच कहूँ तो पढ़ाने के अलावा वो मुझमे कोई इंट्रस्ट लेता ही नहीं था.... मैंने यूँही एक दिन कह दिया था," रहने दो.. अब मुझे डर नहीं लगता.. रोज जाती हूँ न..." उस के बाद तो उसने मुझे वापस घर तक छोड़ना ही छोड़ दिया...

ऐसे ही तीन चार दिन और बीत गये..

मेरा घर पिंकी के घर से करीब आधा किलोमीटर दूर था.. लगभाग हर नुक्कड़ पर स्ट्रीट लाइट लगी थी.. इसीलिए सारे रास्ते रौशनी रहती थी.. सिर्फ एक लगभाग 20 मीटर रास्ते को छोड़ कर... वहाँ गाँव की पुरानी चौपाल थी और चौपाल के आँगन में एक बड़ा सा नीम का पेड़ था (अब भी है). स्ट्रीट लाइट वहाँ भी लगी थी.. पर चौपाल से जरा हटकर.. उस पेड़ की वजह से गली के उस हिस्से में घुप अँधेरा रहता था...

वहाँ से गुजरते हुए मेरे क़दमों की गति और दिल की धड़कन अपने आप ही थोड़ी बढ़ जाती थी.. रात का समय और अकेली होने के कारण अनहोनी का डर किसके मन में नहीं पैदा होगा... पर 3-4 दिन तक लगातार अकेली आने के कारण मेरा वो डर भी जाता रहा...

अचानक एक दिन ऐसा हो गया जिसका मुझे कभी डर था ही नहीं... पर जब तक 'उसकी' मंशा नहीं पता चली थी; मैं डरी रही.. और पसीने पसीने हो गयी....

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Posted : 02/10/2010 2:39 am
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हुआ यूँ की उस दिन जैसे ही मैंने अपने कदम 'उस' अँधेरे टुकड़े में रखे.. मुझे अपने पीछे किसी के तेजी से आ रहे होने का अहसास हुआ... मैं चौंक कर पलटने ही वाली थी की एक हाथ मजबूती से मेरे जबड़े पर आकर जम गया.. मैं डर के मारे चीखी.. पर चीख मेरे गले में ही घुट कर रह गयी... अगले ही पल उसने अपने हाथ का घेरा मेरी कमर के इर्द गिर्द बनाया और मुझे उपर उठा लिया....

मैं स्वाभाविक तौर पर डर के मारे काँपने लगी थी.. पर चिल्लाने या अपने आपको छुड़ाने की मेरी हर कोशिश नाकाम रही और 'वो' मुझे जबरदस्ती चौपाल के एक बिना दरवाजे वाले कमरे में ले गया...

वहाँ एक दम घुप्प अँधेरा था... मेरी आँखें डर के मारे बाहर निकलने को थी.. पर फिर भी कुछ भी देखना वहाँ नामुमकिन था.. जी भर कर अपने आपको छुड़ाने की मश्शकत करने के बाद मेरा बदन ढीला पड़ गया.. मैं थर-थर काँप रही थी....

अजीबोगरीब हादसे से भौचक्क मेरा दिमाग जैसे ही कुछ शांत हुआ.. मुझे तब जाकर पता चला की मामला तो कुछ और ही है.. 'वो' मेरे पीछे खड़ा मुझे एक हाथ से सख्ती से थामे और दूसरे हाथ से मेरे मुँह को दबाये मेरी गरदन को चाटने में तल्लीन था...

उसके मुझे यहाँ घसीट कर लाने का मकसद समझ में आते ही मेरे दिमाग का सारा बोझ गायब हो गया... मेरे बदन में अचानक गुदगुदी सी होने लगी और मैं आनंद से सीहर उठी...

मैं उसको बताना चाहती थी की जाने कब से मैं इस पल के लिये तड़प रही हूँ.. मैं पलट कर उससे लिपट जाना चाहती थी... अपने कपड़े उतार कर फैंक देना चाहती थी... पर वो छोड़ता तभी न....!

मेरी तरफ से विरोध खत्म होने पर उसने मेरी कमर पर अपनी पकड़ थोड़ी ढीली कर दी.... पर मुँह पर उसका हाथ उतनी ही मजबूती से जमा हुआ था... अचानक उसका हाथ धीरे धीरे नीचे सरकता हुआ मेरी सलवार में घुस गया.. और कच्छी के उपर से मेरी चूत की फांकों को ढूंढ कर उन्हें थपथपाने लगा... इतना मजा आ रहा था की मैं पागल सी हो गयी.. होंठों से मैं अपने मानोंभाव प्रकट कर नहीं पा रही थी.. पर अचानक ही जैसे मैं किसी दूसरे ही लोक में पहुँच गयी.. मेरी आँखें अधखुली सी हो गयी... कसमसाकर मैंने अपनी टांगें चौड़ी करके जाँघों के बीच 'और' जगह बना ली... ताकि मेरे अपहर्ता को मेरी 'चूत-सेवा' करने में किसी तरह की कोई दिक्कत न हो... और जैसे ही उस'ने मेरी कच्छी के अंदर हाथ डाल अपनी उंगली से मेरी चूत का छेद ढूंढने की कोशिश की.. मैं तो पागल ही हो गयी... मेरी सिसकी मेरे गले से बाहर न आ सकी.. पर उसको अपने भावों से अवगत कराने के लिये मैंने अपना हाथ भी उसके हाथ के साथ साथ अपनी सलवार में घुसा दिया........

मेरे हाथ के नीचे दबे उसके हाथ की एक उंगली कुछ देर तक मेरी चूत की दरार में उपर नीचे होती रही.. अपने हाथ और पराये हाथ में जमीन आसमान का अंतर होने का मुझे आज पहली बार पता चला.. आनंद तो अपने हाथ से भी काफी आता था.. पर 'उस' के हाथ की तो बात ही अलग थी..

मेरी चिकनी चूत की फांकों के बीच थिरकती हुई उसकी उंगली जैसे ही चूत के दाने को छूती.. मेरा बदन झनझना उठता.. और जैसे ही चिकनाहट से लबालब चूत के छेद पर आकर उसकी उंगली ठहरती.. मेरे दिल की धड़कन बढ़ जाती.. मेरा दिमाग सुन्न हो जाता और मेरी सिसकी गले में ही घुट कर रह जाती....

मुझे यकीन हो चला था की आज इस कुंवारे छेद का कल्याण हो कर रहेगा.. मेरी समझ में नहीं आ रहा था की वो आखिर इतनी देर लगा क्यूँ रहा है.. मेरी बेसब्री बढ़ती जा रही थी.. अपनी जाँघों को मैं पहले से दुगुना खोल चुकी थी और मेरे लिये खड़ा रहना अब मुश्किल हो रहा था...

अचानक उसने अपना हाथ बाहर निकल लिया... मेरा दिल बल्लियों पर आकर अटक गया.. अब मैं उसके आगे बढ़ने की उम्मीद कर रही थी... और ऐसा हुआ भी... अगले ही पल उसने मेरी सलवार का नाड़ा खोला और मेरी सलवार नीचे सरका दी.. मेरी नंगी जाँघों के ठंड से ठिठुर रहे होने का मुकाबला मेरे अंदर से उठ रही भीषण काम~लपटों से हो रहा था.. इसीलिए मुझे ठंड न के बराबर ही लग रही थी...

अचानक उसने मेरी कच्छी भी नीचे सरका दी... और इसके साथ ही मेरे चिकने चूतड़ भी अन्वरित हो गये.. उसने एक अपना हाथ चूतड़ों के एक 'पाट' पर रखा और उसको धीरे धीरे दबाने लगा.. मुझे यकीन था की अगर वहाँ प्रकाश होता तो मेरे चूतड़ों की गोलाइयों, कसावट और उठान देखकर वो पगला जाता.. शायद अँधेरे की वजह से ही वो अब तक संयम से काम ले पा रहा था..

मुझे वहाँ भी मजा आ रहा था पर आगे चूत की तड़प मुझे सहन नहीं हो रही थी.. मैं 'काम' जारी रखने के इरादे से अपना हाथ नीचे ले गयी और 'चूत' फांकों पर हाथ रख कर धीरे धीरे उन्हें मसलने लगी..

मेरे ऐसा करने से शायद उसको मेरे उत्तेजित होने का अहसास हो गया... मेरे नितंबों से कुछ देर और खेलने के बाद वो रुक गया और एक दो बार मेरे मुँह से हाथ ढीला करके देखा... मेरे मुँह से लंबी लंबी साँसे और सिसकियाँ निकालते देख वो पूरी तरह आश्वस्त हो गया और उसने अपना हाथ मेरे मुँह से हटा लिया....

कामांध होने के बावजूद, उसको जानने की जिज्ञासा भी मेरे मन में थी.. मैंने अपनी चूत को सहलाना छोड़ धीरे से उससे कहा,"मुझे बहुत मजा आ रहा है.. पर कौन हो तुम?"

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Posted : 02/10/2010 2:40 am
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