बन गई चुदक्कड़
 

बन गई चुदक्कड़  

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मेरा नाम गुड़िया है और मैं पंजाब की रहने वाली हूँ। जिला मैं नहीं बता सकती, सिर्फ इतना जान लीजिये कि मैं "मस्त पंजाबन" हूँ। मेरे गाँव के लड़कों ने मेरा नाम ट्रैक्टर की ट्राली रख दिया है। वे कहते हैं कि मैं उनमें से हूँ जिसे कोई भी, कभी भी अपने ट्रैक्टर के पीछे डाल कर ले जा सकता है। मुझे उनके ऐसे कटाक्ष हमेशा ही रोमांचित करते रहते हैं।

मेरी ख़ूबसूरती देखते ही बनती है। अपने मुँह से खुद की तारीफ तो नहीं करनी चाहिए, मगर मुझे ऐसा ही जिस्म मिला है। रंग मेरा गोरा नहीं बल्कि सांवला है, मगर ऊपर वाले ने जो जिस्म मुझे दिया है, जिस सांचे में मुझे बनाया है, उस पर हर गबरू जवान मरता है। पतली सी बलखाती कमर है मेरी ! दिलों को हिला के रख देने वाले मस्त गोल गोल उभरे हुए चूतड़ ! जी हाँ पूरे गोल-गोल, मानो किसी ने दो खरबूजे रख कर उस पर पैंटी डाल दी हो। मगर इन्हें कौन समझाए कि मेरे पास तो यह कुदरत की देन है। मेरे मम्मे देख कर अगर किसी जवान का हथियार खड़ा ना हो तो मेरा नाम गुड़िया नहीं।

हर मर्द, हर लड़का, यहाँ तक कि बुजुर्ग भी मेरी मारना चाहतें हैं। मैंने भी शुरू से ही जवानी के मजे दोनों हाथ खोल कर चखवाए हैं और मजे लिए हैं।

बात उन दिनों की है जब हम गाँव में रहते थे। आप सभी तो जानते ही हैं कि गाँव में रहकर जवानी दबाये नहीं दबती। पापा और चाचा जब से जर्मनी गए थे, तब से ही मैंने घर में कई ऐसे दृश्य देखे जिन्हें एक लड़की को अपनी शादी के बाद देखने चाहिए। माँ और चाची दोनों का तो आवा ही औता था, बाकी तो आप समझ ही गए होंगे।

हम तीन बहनें और दो भाई हैं। मेरा एक भाई मुझसे डेढ़ साल बड़ा है और एक भाई हम भाई बहनों में सबसे छोटा है। बड़ा भाई डलहौजी हॉस्टल में था और छोटा भाई एक अच्छे स्कूल में पढ़ता था। मगर हम लड़कियों को सरकारी स्कूल में डाला गया था। मेरी चाचाजी की भी दो लड़कियाँ और एक लड़का है जो के डलहौजी हॉस्टल में पढता था। हमारी गाँव में पुश्तैनी जायदाद है और काफी अच्छा काम धंधा है।

हम बहनों को घर के कामों में हाथ बंटाना पड़ता था। हम सभी के काम बाँध दिए गए थे। जैसे कि खेतों में काम कर रहे लोगों के लिए खाना बनाना व चाय बनाना आदि। वैसे तो सारे मजदूर खाना लेने खुद ही आते थे मगर कभी कभी खेतों में जाकर चाय पानी पहुँचाना भी पड़ता था। इसलिए हम बहनें बारी बारी से खेतो में जा कर चाय पानी पहुंचा आते थे। एक दो बार ज़ब में खेतो पर गई तो मैंने गौर किया कि सबकी नज़र मेरी छाती पर ही रहती थी, जो इतनी कम उम्र में विकसत हो रही थे। उनकी तिरछी नज़र से मेरे जिस्म में अजीब सी सिहरन उठने लगती थी। अब तो खेतों में काम कर रहे लोग मुझ पर कटाक्ष भी कसने लगे थे। मुझे यह सब बड़ा अच्छा लगता था।

मैंने एक बार एक जवान मजदूर के साथ चाची को गन्ने के खेतों में और मोटर वाले कमरे में घुसते भी देखा था और अब उसी जवान मजदूर की नजरें माँ और चाची की जवान हो रही बेटियों पर जाने लगी थी।

मेरी बड़ी बहन के तो कुछ लड़कों के साथ चक्कर चल पड़े थे। यह सब देख देख कर मेरा भी मन मचलने लगा था और मेरा दिमाग गन्दा हो चुका था। अक्सर जब हम बहनें अकेली होतीं तो आपस में लिपट लिपट कर अपने मम्मे दबवाने और दबाने के मजे लेतीं थी, मेरी बड़ी बहन और मेरे चाचा जी की बड़ी लड़की को तो मैंने कई बार एक दूसरे की चूत पर हाथ फेरते भी देखा था, वे दोनों एक दूसरे के दानों को चुटकी में ले कर मस्ती के साथ रगड़ने लगती थी और यह करते समय उनकी आँखें मुंद जाती थी। यह सब देख कर मेरे भीतर भी वासना की हलकी चिंगारी लग चुकी थी।

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Posted : 11/01/2012 10:11 am
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Posted : 11/01/2012 10:11 am
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एक दिन में खेतों में मोटर पर काम कर रहे मजदूर को चाय और खाना पकड़ाने गई। वो उस दिन अकेला था और भैंसों के लिए चारा कुतर रहा था। मुझे देख कर उसने मशीन बंद कर दी और मेरी तरफ खाना लेने आया। मगर यह क्या उसने तो खाना पकड़ने के बहाने मेरी कलाई ही पकड़ ली।

मैंने कहा,"यह क्या कर रहे हो?"

वो बड़े ही अल्ल्हड़पन के साथ बोला," तेरी कलाई पकड़ कर देख रहा हूँ कि जवानी वाली चमड़ी आई भी है या नहीं !"

मैं छटपटा कर उससे अपना हाथ छुड़ाने की कोशिश करने लगी मगर उसने खाने का डिब्बा किनारे रख कर मुझे अपनी तरफ खींचा।

मैंने उससे विनती करते हुए कहा," जाने दे मुझे, रब के वास्ते जाने दे मुझे !"

वो बोला,"चली जाना, आज तेरे घर पर कोई भी तो नहीं है। सब तो शादी में गए हुए हैं। तू अकेली वहाँ क्या करेगी?"

और इतना कहते हुए उसने मेरे उभरते हुए अनारों को ऊपर से रगड़ा और मुझे बाँहों में जकड़ लिया और मेरे होंठ चूमने लगा।

मैं इस अकस्मात् हमले को झेल नहीं पाई.. हालाँकि मुझे इन सब चीजों का ज्ञान था मगर सम्भोग के बारे में मेरा ज्ञान अभी पूरा नहीं था।

मैंने उससे विनती करते हुए फिर से कहा," कालू जाने दो ! मुझे वरना मैं माँ को बता दूँगी।"

वो मेरे उभारों को दबाते हुए बड़बड़ाया,"चुप कर साली ! वो कौन सी दूध की धुली हैं। तेरी माँ और चाची दोनों को ठोंक चूका हूँ और वो भी उनकी पहल पर !"

फिर उसने मेरी कमीज के बटन खोलते हुए कहा,"अभी कुछ नहीं करूँगा बस ऊपर से ही एक बार मजे लेने दे। मैंने इतनी कच्ची उम्र की कलि को कभी नंगा नहीं देखा है। देर ना कर और मुझे ऊपर से ही हलके फुल्के मजे लेने दे।"

इतना कहते हुए उसने मेरी कमीज उतारनी शुरु कर दी और फिर एक ही पल में उसने मेरी कमीज को मेरे शरीर से अलग कर दिया।

मैंने अपने अनारों पर अभी ब्रा डालनी शुरू नहीं किया था ,इसलिए कमीज के नीचे कुछ भी नहीं था।

मेरे उभरते हुए अनारों को देखते ही उसका मुंह खुला का खुला रह गया और उसने कहा,"हाय कितनी मस्त है तेरी जवानी !"

जब उसने मेरे दाल के दाने जैसे चुचूक को चुटकी में लेकर मसला तो मानो मुझे स्वर्ग का मजा मिल गया। उसने अपना सर झुका कर अपने होंठों से मेरे चुचूक चूसने शुरू कर दिए। मेरे तीस इन्ची अनार उसके मुंह में पूरे आ रहे थे। वो कमाल कर रहा था। मुझे बहुत बहुत बहुत ही ज्यादा मजा आ रहा था। जी हाँ दोस्तो, इतना मजा तो मुझे आज भी नहीं आता जितना मजा मुझे उस पहली बार में आया था।

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Posted : 11/01/2012 10:12 am
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मैं उसके बालों में हाथ फेर रही थी और वो मेरे चुचूक चूस रहा था। मेरे लिए यह एक नया अनुभव था। उसने चुचूक चूसते हुए सलवार का नाड़ा खींच दिया और मेरी सलवार नीचे सरक गई। मैंने आज सलवार के नीचे भी कुछ नहीं पहना था। हल्के भूरे बालों से भरी मेरी गुलाबी होंठों वाली चूत देख उसका बुरा हाल हो गया। और जब उसने मेरी चूत के होंठ को अलग कर उस पर हाथ फेरा तो

हाय !!!!

मैं क्या बताऊँ, मैं सिसकने लगी........

मैं अपने होश खोने लगी थी।

"काले, छोड़ दे मुझे.. कुछ कुछ होता है।"

"मैं तेरी नहीं लूँगा, यह वादा रहा मेरा। बस तू अपनी मर्जी से मुझे मजे लेने दे ! वरना मैं जबरदस्ती ले ही लूँगा।"

वैसे मुझे बहुत मजा आ रहा था। उसने मुझे बोरियों से बने तख़्त पर लिटाया और मेरे टांगो के बीच में खुद बैठ गया। उसने अपनी दो उँगलियों से मेरे चूत के होंठ फैलाए और अपनी जीभ उस पर रख दी।

मैं तो पागल सी हो रही थी। वो अपनी जीभ ( www.indiansexstories.mobi ) से मेरे चूत को चाट रहा था, उसकी खुरदरी जीभ मेरी कोमल चूत पर रगड़ खा रही थी और मेरी चूत अजीब सी अकड़न के साथ फुदक रही थी।

उसने कहा,"कितनी साफ़ सुथरी कुंवारी चूत है ! पहली बार एक कच्ची लड़की की चूत देख रहा हूँ।"

और वो मजे लेकर मेरी चूत को चूसने लगा।

इसी बीच उसने अपना पजामा उतार दिया और फिर अपना कच्छा भी उतार दिया।

हाय राम !

जब मैंने उसका काला नाग जो पहले किसी चमड़ी के हिस्से की तरह लटक रहा था, उसे अपना सर उठाते हुए देखा, मेरी तो जान ही निकल गई।

फिर उसका वो कला नाग देखते ही देखते एक लोहे का डण्डा जैसा हो गया।

उसने मेरा हाथ पकड़ा और अपना लौड़ा पकड़ा कर बोला," ले मेरी जान ! इसे पकड़ कर इसके साथ खेल ! एक ना एक दिन तो तुझे इसको अपनी चूत में डलवाना ही पड़ेगा। अगर मैं नहीं डालूँगा तो कोई और डाल देगा। शादी के बाद तो तेरा खसम रहम नहीं खायेगा। इसको तो फटना ही होगा आज नहीं तो कल। चल चूम ले इसे और मजे लेते हुए मजे दे।"

मैंने उसके लौड़े को सहला कर देखा और फिर मुँह में लेने की कोशिश की। मगर वो लौड़ा था कि मेरे मुँह में समां नहीं रहा था।

वो बोला,"अपनी जबान से चाट चाट कर मेरा पानी निकलवा दे ! फिर चली जाना !"

मैं बड़ी असमंजस में थी.. मुझे समझ नहीं आ रहा था कि काला कौन से पानी का बात कर रहा है।

इसी उधेड़बुन में मैंने उसे पूछा,"पानी! कैसा पानी निकालना है??"

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Posted : 11/01/2012 10:12 am
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वो मुझे समझाते हुए और मेरे मम्मे दबाते हुए बोला,"अरे मेरी जान ! इसके अंदर से पानी निकलता है, जिससे बच्चा होता है। अगर कल को तेरा खसम अपना पानी तेरी चूत के अंदर निकालेगा, तब जा कर तू माँ बनेगी। चल चाट ले इसे।"

काला अपना लंड हाथ में लेकर मेरे चेहरे के करीब बैठ कर मुठ मारने लगा। वो मेरे होठों से अपने लंड को रगड़ रगड़ कर मुठ मार रहा था।

अचानक ही वो उठा और नीचे जा कर मेरी चूत पर अपना लंड सटा कर घिसने लगा।

मैं उसकी इस क्रिया से मचल उठी। मुझे अजीब सा मजा आने लगा।

वो मेरी हालत समझ रहा था और इतने में ही उसने मुझसे पूछा," थोड़ा घुसा के दिखाऊँ?"

मैं कुछ नहीं बोल पाई। उसने इसे मेरी रजामंदी मान कर मेरी चूत के होंठ फैला कर हल्के से अपना लंड का टोपा मेरी चूत पर रख दिया और एक हाथ से मेरे चूचे दबाने लगा और दूसरे हाथ से चूत के ऊपर उभरे दाने को रगड़ने लगा।

उसने अपने लौड़े पर और मेरे चूत पर थोड़ा थूक लगाया और लौड़े को झटका दिया।

दर्द के मारे मेरी तो जान ही निकल गई थी। आखिर एक कुंवारी कन्या की सील बंद चूत जो थी।

उसने मुझे दिलासा देते हुए कहा,"डर मत ! घुसेगा नहीं !"

वो मेरी चूत पर अपना लंड रगड़ कर मुठ मारने लगा और फिर एक बार जोर से झटका लगा दिया। उसका टोपा मेरी चूत में फंस गया। दर्द के मारे मैं रोने लगी।

उसने आगे डालने की कोशिश नहीं की, वहीं रुक गया और आगे-पीछे करने लगा और साथ ही मेरे दाने को बराबर रगड़ने लगा।

पूरा खिलाड़ी था वो !

मैंने सर उठा कर देखा कि मेरी गोरी चूत पर उसका घना काला लौड़ा अटका हुआ था। उसने एक हाथ मेरे मुँह पर रख दिया और एक और झटका मार कर थोड़ा और आगे सरकाया। मुझे ऐसा लग रहा था जैसे आज तो मैंने मर ही जाना है।

वह बड़ा ही माहिर था। उसी अवस्था में वो आगे-पीछे करने लगा तो मुझे राहत मिली। उसने पास ही पड़े अपने कच्छे से मेरी चूत को पौंछा और कहा,"देख, तेरी झिल्ली फट गई जान !"

मैंने उसे याद दिलाया कि उसने वादा किया था कि वो कुछ नहीं करेगा।

वो बोला,"बस हो गया जान ! अब बस मेरा माल निकाल दूंगा और आगे नहीं करूँगा।"

इतना कह कर उसने ढेर सारा थूक लगाया और लौड़ा और अंदर घुसा दिया। अब उसने एक और झटका मारा तो उसका लंड मेरी चूत में आधा घुस पाया। और उसी अवस्था में उसने मुझे चोदा। थोड़ी देर अपनी कमर चलने के बाद उसने अपने अपने लौड़े को मेरी चूत के अन्दर से निकला और अपने हाथ में थम कर तेजी से हाथ चलने लगा।

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Posted : 11/01/2012 10:13 am
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अचानक ही तेज़ धार के रूप में कुछ निकला, गर्म-गर्म सा पानी।

उसने वो सारा पानी मेरी चूत के ऊपर निकाल दिया और मुझे चूमता हुआ मेरे ऊपर लुढ़क गया।

कुछ देर बाद उसने कहा,"रुक ! तुझे तो मजा दिया ही नहीं। मजा दूंगा तभी तो आगे खुद ही मरवाने आएगी।"

इतना कह कर उसने अपनी जबान से दाना रगड़ना चालू किया। थोड़ी थोड़ी देर में ऊँगली भी कर लेता था वो।

मैं तो हवा में उड़ने लगी।

एकदम से मुझे ऐसा लगा जैसे मैं आसमान में उड़ रही हूँ.. और फिर एक सैलाब सा आया और मैं आसमान से नीचे गिर पड़ी।

मुझे इतना आनंद आया जिसे मैं बयां नहीं कर सकती शब्दों में !

उसने मुझसे कपड़े पहन लेने को कहा और बोला,"जा और किसी से मत कहना कुछ !"

मेरी आधी चूत खुली थी अभी। मैं आधी कुंवारी थी। एक तीखी टीस मेरी टांगों के बीच उठ रही थी। अब तो वो जब भी घर खाना-वाना लेने आता, मौका देख मेरे मम्मे दबाने लगता और चुचूक चुटकी से मसलने लगता।

उस बात को महीना हो गया। मेरी छाती में एक दम से बदलाव आने लगा। काफी कसी कसी सी रहने लगी। महीने बीत जाने के बाद भी उसने मुझे पूरा कभी नहीं चोदा। लेकिन उसके हाथों से मेरे मम्मे बड़े हो गए मुझे ब्रा डालना शुरू करना पड़ा। उधर मेरा बदन भर गया और अब मेरे ख्यालों में बदलाव आने लगे। लौड़ा तो मैं कब से पकड़ती सहलाती आ रही थी, चूस भी रही थी। मगर चुदवाने का मौक़ा नहीं मिल पाया था अभी तक।

एक दिन में घर पर अकेली थी। कालू खाना लेने आया। उसे नहीं मालूम था कि मैं अंदर अकेली हूँ। लेकिन मैं तो उसका इंतजार कर रही थी, जानबूझ कर खाना देने नहीं गई क्योंकि मैं चाहती थी कि वो अन्दर आये.....

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Posted : 11/01/2012 10:13 am
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एक दिन मैं घर पर अकेली थी। कालू खाना लेने आया। उसे नहीं मालूम था कि मैं अंदर अकेली हूँ। लेकिन मैं तो उसका इंतजार कर रही थी। जानबूझ कर खाना देने नहीं गई क्योंकि मैं चाहती थी के वो आये........

जब कालू खाना लेने आया तब उसे यह नहीं मालूम था कि मैं अन्दर अकेली उसका उन्ताजार कर रही हूँ। मैं चाहती थी कि वो आये और आज मुझे औरत बनने का सुख दे।

मेरे मन में आज कुछ अजीब सी उथल पुथल चल रही थी।

कालू जैसे ही घर के दरवाजे पर पहुंचा, उसने हमेशा की तरह मेरी कलाई पकड़ ली।

मैंने अपने दूसरे हाथ से उसकी बांह पकड़ कर उसको अन्दर खींच लिया और कहा- आ भी जा मेरे कालू....आज घर पर कोई नहीं है। आज तो मैं अपने कालू को अपने हाथों से खाना खिलाऊँगी।

इतना कह कर मैं उससे लिपट गई और वोह मुझे चूमने लगा।

पहले तो वो मेरे गालो पर चुम्मियाँ लेने लगा और फिर धीरे-धीरे उसने अपने होंठ मेरे अधरों पर रख दिए।

मैं तो पहले से ही गर्म थी। सो मैं उसका कुरता उतारने लगी। फिर मैंने अपनी कमीज उतार दी।

मेरी ब्रा में कैद मेरे मम्मे देख कर कालू भी जान चुका था कि पहले छुटी अधूरी कहानी को पूरा करने का वक़्त आ गया है।

मुझमें बेसब्री का आलम छा चुका था। मैंने उसका पजामा भी उतार फेंका और उसके कच्छे को भी नीचे सरका दिया।

उसका काला नाग लटक रहा था। मैंने उसे अपने मुँह में भर लिया और ऐसा करते हुए मैंने अपनी सलवार भी उतार फेंकी।

यह देख कर कालू बड़ा खुश हो गया और बोला- देखा मेरी गुड़िया ! कहा था ना मैंने कि एक दिन तू खुद ही मुझे अपनी लेने के लिए कहेगी ?

मेरे मुँह से भी अचानक ही निकल पड़ा- कालू ! अट्ठारह सावन पार कर चुकी हूँ ! और तूने जो आग की चिंगारी महीने भर पहले लगाई थी वो अब शोले का रूप ले चुकी है।

इतना सुनते ही वो बड़े जोश में आ गया और उसने मेरी ब्रा का हुक खोलते हुए कहा- गुड़िया रानी ! देख तेरे दूध कितने बड़े हो गए हैं। जब पहली बार पकड़ा था, तब अनार थे और आज रसीले आम बन चुके हैं।

मैं तो अपने होश खो ही चुकी थी। सो मैंने उसके सर को दबा कर अपने मम्मे उसके मुँह के हवाले कर दिए। वो एक हाथ से मेरे बाएँ मम्मे को मसलने लगा और दायें वाले मम्मे को मुँह में लेकर चूसने लगा।

मेरे से अब रह पाना मुश्किल हो रहा था। मैंने उसके लौड़े को पकड़ लिया और जोर जोर से हिलाने लगी। उसने मेरे चुचूक चूस चूस कर खड़े कर दिए थे।

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Posted : 11/01/2012 10:13 am
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मैंने भी उसके लौड़े को झुक कर अपने मुँह में भर लिया और चूसने लगी।

मैंने उससे कहा- कालू, तू तो बाहर मजे लेता रहता है, तेरी घरवाली का क्या होता होगा? बेचारी !

वह बोला- उसका क्या है! रात को चढ़वा लेती है मुझे अपने ऊपर ! अँधेरे में ही घुसवा लेती है और पानी निकाल देती है !

कालू ने मुझे अपने बाहों में उठाया और बिस्तर पर पटक दिया।

अब वो मेरे ऊपर चढ़ गया और मैंने भी अपनी राह साफ़ करने के लिए खुद ही अपनी टाँगें फैला दी।

आग दोनों ही तरफ लगी हुई थी और किसी के लिए भी अब देर करना संभव नहीं था।

उसने अपने लौड़े को मेरी टांगों के बीच में रख कर एक जोरदार झटका दिया। चूत तंग होने के कारण उसका लौड़ा मेरी चूत में फंस गया। मुझे बहुत तेज दर्द हो रहा था। मगर मैंने तो आज किला फतह करने की सोच रखी थी। इसलिए मैंने चादर को जोर से पकड़ रखा था और मेरे होंठ मेरे दांतों के तले दबे हुए थे। अपनी पीड़ा को सहन करने की इच्छा शक्ति मुझे आ गई थी और इसलिए मैंने उसे नहीं रोका।

उसने 2-3 जोरदार झटके लगाये और उसका लंड मेरी चूत को चीरता हुआ पूरा मेरे अन्दर चला गया।

वो खुश होते हुए बोला- लगता है गुड़िया रानी ने आज पूरा लेने का मन बनाया था।

मैंने कहा- हाँ मेरे कालू ! आज तो मैं पूरी हो जाना चाहती थी।

यह सुनते ही उसमें घोड़े जैसा जोश भर गया और वो तेजी से अपनी कमर चलते हुए मुझे पेलने लगा।

धीरे धीरे मेरा दर्द रफू चक्कर हो गया और मुझे मजा आने लगा।

मेरे चूतड़ उठने लगे और मेरे मुख से सिसकारियाँ छूटने लगी।

मेरे मुख से खुद ही निकल पड़ा- कालू ! और कर.. जोर जोर से कर मुझे.. आज मुझे कच्ची कलि से खिला हुआ फूल बना दे।

कालू मखमल जैसी कलि को चोद रहा था और बहुत खुश था।

वो बोला- चल घोड़ी बना कर लेता हूँ तेरी अब !

मैंने पूछा- वो कैसे??

वो बोला- तू घुटनों के बल बैठ के झुक कर घोड़ी बन जा।

मैं उसके बताये अनुसार घोड़ी बन गई और उसने मेरे पीछे आते हुए अपना लौड़ा मेरी चूत में पीछे से घुसा दिया।

मेरे मम्मे नीचे लटकने लगे थे और उसके धक्कों की ताल पर ताल बजा कर नाच रहे थे।

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Posted : 11/01/2012 10:13 am
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उसने झुक कर मेरे मम्मों को पकड़ लिया और उन्हें रगड़ रगड़ कर मजे लेने लगा।

"हाय रे मेरे कालू ! और रगड़ मेरी मम्मों को। बहुत सुख मिल रहा है रे ! चोद मुझे और जोर जोर से चोद !

अब कालू जोर जोर से अपनी कमर हिलाने लगा और मुझे चोदने लगा। जब वो झटके लगाने के लिए अपना लौड़ा मेरे चूत से निकालता तो मैंने भी अपनी गांड पीछे धकेलती ताकि रगड़ मेरी चूत पर जोर से लगे और पूरा लौड़ा मेरी चूत में समा जाए।

कालू बोला- साली ऐसा लगता है कि तू अब जहाजी बनने वाली है।

मैंने उससे पूछा- क्या मतलब है तेरा ?

उसने मुझे उत्तर दिया- मेरा मतलब यह कि तू एक लौड़े से शांत नहीं रहने वाली। तेरे अन्दर की यह आग एक लंड से शांत नहीं होने वाली मेरी गुड़िया रानी।

मैंने कहा- हाय कालू ! तुझे कैसे बताऊँ कि मुझे कैसा सुख मिल रहा है तेरी चुदाई में ! बयान नहीं कर पा रही मैं। और इसलिए तो गांड धकेल धकेल धकेल कर मजा ले रही हूँ !

वो अपने लंड को एक बार फिर से जड़ तक पेलते हुए बोला- साली, पहली चुदाई में इतनी उतावली हो रही है तू? तू तो पक्का जुगाड़ बनेगी लड़कों के लिए।

मुझे उसके मुँह से ये सब बातें बड़ी अच्छी लग रही थी। मेरे मुख से ठंडी आह सी निकली और मैंने उससे कहा- आह ! चोद मुझे ! और चोद.... मार मेरी.... लेता जा मेरी फुद्दी ... मेरी चूत को फाड़ के रख दे रे मेरे काले ! तेरा घंटा बहुत ज़ालिम है रे काले।

कालू जोश में भर के मेरे मम्मे मसलते हुए बोला- हाय मेरी जान ! माँ और चाची से चार कदम आगे है तू।

थोड़ी देर में मेरा शारीर अकड़ने लगा और फिर एक जोर का ज्वालामुखी मेरी चूत में छुट पड़ा और गरम गरम लावा मेरी चूत में निकल पड़ा। दोनों शरीरों से निकले लावा ने हम दोनों को तृप्त कर दिया था।

जब उसने मुझे छोड़ा तो हम दोनों हांफने लगे थे। कुछ देर चित्त लेटने के बाद हम दोनों ने कपड़े पहने और वो घर से बाहर निकल गया।

एक अलग सा स्वाद वो मेरे जीवन में छोड़ गया और मेरे चेहरे पर संतुष्टि झलक रही थी।

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Posted : 11/01/2012 10:14 am
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आप सभी तो जानते ही हैं कि कालू के साथ मेरे शारीरक संपर्क बन चुके थे और हम जब मौका मिलता मस्ती के सागर में डूब जाते थे। तो इसी चक्कर में एक बार कालू ने मुझे मोटर घर में पकड़ लिया और हम दोनों की गर्मी ने अपना रंग दिखाना शुरू कर दिया। हमें कुछ नहीं मालूम था, बस उसका काला लौड़ा मेरी चूत को हलाल करने में लगा था।

जब हम अलग हो कर होश में आये तो सामने शंकर को देख हमारे चेहरे पर तोते उड़ने लगे। मैं सम्पूर्ण नंगी थी, एक भी कपड़ा तन पर नहीं था।

जल्दी से मैंने अपने हाथों से अपनी चूत को छुपाने की कोशिश की और जब मैंने अपनी सलवार खींच कर चूत को ढकने की कोशिश की तो मेरे मम्मे दिखने लगे।

शंकर बोला,"वाह मेम साहब ! इस कालू की पाँचों उँगलियाँ घी में रहती हैं।"

मैं सलवार सीधी कर पहनने लगी तो उसने मुझे रोक दिया।

मैंने उससे गुस्से में कहा,"शंकर ! जाओ यहाँ से।"

वह अपने लंड को अपने लुंगी के ऊपर ही मसलते हुए बोला,"हमें स्वाद नहीं लेने दोगी जवानी का गुड़िया रानी ?"

"मैं रंडी नहीं हूँ जो हर किसी से करवाऊँ!" मैं गुस्से में लाल हुए जा रही थी।

यह सुन कर वो मेरी बाहें पकड़ कर मुझे लगभग खींचते हुए बोला,"साली रंडी से कम भी नहीं है तू ! एक शादी शुदा नौकर के साथ रंगरलियाँ मानते वक़्त याद नहीं आया कि रंडी क्या होती है?"

कालू ने अपने कपड़े ठीक किये और धीरे से निकल गया। शंकर ने आगे बढ़ कर मुझे अपनी बाहों में दबोच लिया और पागलों की तरह मुझे चूमने लगा।

मैंने उसका विरोध करना चाह रही थी मगर मुझे अपने भेद का खुल जाने का डर था।

मेरे मम्मों को ऊपर से ही दबाते हुए वो बोला,"गुड़िया ! बचपन से देखा है तुझे ! बिल्कुल अपनी माँ पर गई है।"

"शंकर दिमाग मत खराब कर और मुझे छोड़ दे !" मैंने उससे विनती की।

मगर वो कहाँ मानने वाला था। उसने जल्दी से मुझे लिटाया और ज़बरदस्ती मुझे मसलने लगा।

वह मेरे मम्मे दबाने लगा और फिर उन्हें अपने मुँह में डालकर चूसने लगा। उसने अपनी लुंगी उतार कर अपना लौड़ा निकाला और मेरी जांघों में घुसाने लगा। उसने मेरी दोनों टांगें फैला दी और मेरी चूत पर थूक लगाया।

उसके लौड़े को अभी तक मैं देख भी नहीं पाई थी। जब उसने अपना लौड़ा मेरी चूत पर सटा कर एक झटका दिया तब मुझे पता चला कि उसका लौड़ा कितना तगड़ा है।

मैं छटपटाने लगी। कितना बड़ा और कितना मोटा लौड़ा होगा उसका यह सोच कर मेरी जान निकल रही थी।

उसने ना तो मेरी चूत चाटी और ना ही मेरे होंठ चूमे बस देसी लौंडे की तरह अपना काम निकाल रहा था वो। वो तो बस अपने लौड़े को चूत में डाल कर अपना काम निकाल रहा था, किला फतह करने की कला उसमें नहीं थी।

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Posted : 11/01/2012 10:14 am
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