बन गई चुदक्कड़
 

बन गई चुदक्कड़  

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 Anonymous
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मेरा नाम गुड़िया है और मैं पंजाब की रहने वाली हूँ। जिला मैं नहीं बता सकती, सिर्फ इतना जान लीजिये कि मैं "मस्त पंजाबन" हूँ। मेरे गाँव के लड़कों ने मेरा नाम ट्रैक्टर की ट्राली रख दिया है। वे कहते हैं कि मैं उनमें से हूँ जिसे कोई भी, कभी भी अपने ट्रैक्टर के पीछे डाल कर ले जा सकता है। मुझे उनके ऐसे कटाक्ष हमेशा ही रोमांचित करते रहते हैं।

मेरी ख़ूबसूरती देखते ही बनती है। अपने मुँह से खुद की तारीफ तो नहीं करनी चाहिए, मगर मुझे ऐसा ही जिस्म मिला है। रंग मेरा गोरा नहीं बल्कि सांवला है, मगर ऊपर वाले ने जो जिस्म मुझे दिया है, जिस सांचे में मुझे बनाया है, उस पर हर गबरू जवान मरता है। पतली सी बलखाती कमर है मेरी ! दिलों को हिला के रख देने वाले मस्त गोल गोल उभरे हुए चूतड़ ! जी हाँ पूरे गोल-गोल, मानो किसी ने दो खरबूजे रख कर उस पर पैंटी डाल दी हो। मगर इन्हें कौन समझाए कि मेरे पास तो यह कुदरत की देन है। मेरे मम्मे देख कर अगर किसी जवान का हथियार खड़ा ना हो तो मेरा नाम गुड़िया नहीं।

हर मर्द, हर लड़का, यहाँ तक कि बुजुर्ग भी मेरी मारना चाहतें हैं। मैंने भी शुरू से ही जवानी के मजे दोनों हाथ खोल कर चखवाए हैं और मजे लिए हैं।

बात उन दिनों की है जब हम गाँव में रहते थे। आप सभी तो जानते ही हैं कि गाँव में रहकर जवानी दबाये नहीं दबती। पापा और चाचा जब से जर्मनी गए थे, तब से ही मैंने घर में कई ऐसे दृश्य देखे जिन्हें एक लड़की को अपनी शादी के बाद देखने चाहिए। माँ और चाची दोनों का तो आवा ही औता था, बाकी तो आप समझ ही गए होंगे।

हम तीन बहनें और दो भाई हैं। मेरा एक भाई मुझसे डेढ़ साल बड़ा है और एक भाई हम भाई बहनों में सबसे छोटा है। बड़ा भाई डलहौजी हॉस्टल में था और छोटा भाई एक अच्छे स्कूल में पढ़ता था। मगर हम लड़कियों को सरकारी स्कूल में डाला गया था। मेरी चाचाजी की भी दो लड़कियाँ और एक लड़का है जो के डलहौजी हॉस्टल में पढता था। हमारी गाँव में पुश्तैनी जायदाद है और काफी अच्छा काम धंधा है।

हम बहनों को घर के कामों में हाथ बंटाना पड़ता था। हम सभी के काम बाँध दिए गए थे। जैसे कि खेतों में काम कर रहे लोगों के लिए खाना बनाना व चाय बनाना आदि। वैसे तो सारे मजदूर खाना लेने खुद ही आते थे मगर कभी कभी खेतों में जाकर चाय पानी पहुँचाना भी पड़ता था। इसलिए हम बहनें बारी बारी से खेतो में जा कर चाय पानी पहुंचा आते थे। एक दो बार ज़ब में खेतो पर गई तो मैंने गौर किया कि सबकी नज़र मेरी छाती पर ही रहती थी, जो इतनी कम उम्र में विकसत हो रही थे। उनकी तिरछी नज़र से मेरे जिस्म में अजीब सी सिहरन उठने लगती थी। अब तो खेतों में काम कर रहे लोग मुझ पर कटाक्ष भी कसने लगे थे। मुझे यह सब बड़ा अच्छा लगता था।

मैंने एक बार एक जवान मजदूर के साथ चाची को गन्ने के खेतों में और मोटर वाले कमरे में घुसते भी देखा था और अब उसी जवान मजदूर की नजरें माँ और चाची की जवान हो रही बेटियों पर जाने लगी थी।

मेरी बड़ी बहन के तो कुछ लड़कों के साथ चक्कर चल पड़े थे। यह सब देख देख कर मेरा भी मन मचलने लगा था और मेरा दिमाग गन्दा हो चुका था। अक्सर जब हम बहनें अकेली होतीं तो आपस में लिपट लिपट कर अपने मम्मे दबवाने और दबाने के मजे लेतीं थी, मेरी बड़ी बहन और मेरे चाचा जी की बड़ी लड़की को तो मैंने कई बार एक दूसरे की चूत पर हाथ फेरते भी देखा था, वे दोनों एक दूसरे के दानों को चुटकी में ले कर मस्ती के साथ रगड़ने लगती थी और यह करते समय उनकी आँखें मुंद जाती थी। यह सब देख कर मेरे भीतर भी वासना की हलकी चिंगारी लग चुकी थी।

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Posted : 11/01/2012 10:11 am
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मेरे मुख से निकला,"निकालो अपने लौड़े को ! चूत फट रही है मेरी।"

उसने कहा,"अभी मजा आएगा कुछ देर सह ले मेरी जान।"

और सच में कुछ ही देर में मैं नीचे से खुद ही हिलने लगी और उसने अपनी पकड़ ढीली कर दी।

वो खुश होते हुए बोला,"आया ना मजा साली !"

मैंने उससे कहा,"तुम बहुत गंदे हो शंकर। तुमने मुझे चोद दिया। मैं माँ को बता दूंगी यह सब।"

उसने अपने दांत दिखाते हुए कहा,"चल न, इकट्ठे चलते हैं तेरी माँ के पास ! मैंने बताऊंगा तेरी माँ को कि उसकी छोरी कालू के नीचे लेटी थी और उसे देख कर मेरा खड़ा हो गया ! अब तू ही बता कि मैं क्या करता.. मेरे सामने नन्ही मुन्नी सी गुड़िया नंगी लेटी थी और मैंने उसे पकड़ लिया। और जब अब पकड़ ही लिया था तो चोदना तो बनता ही है न !"

मुझे उसकी हरामीपने की बातें सुन कर शर्म आ रही थी मगर मुझे उसके धक्कों से मजा भी आ रहा था।

आह्ह्ह्ह .....आआह्ह्ह्ह........हम दोनों की कमर एक साथ चल रही थी और हम दोनों आनन्द के सागर में मजे ले रहे थे।

थोड़ी देर बाद हम दोनों साथ साथ झड़े।

सच में शंकर का लौड़ा बड़ा मस्त निकला और मेरे तो दोनों हाथों में लड्डू आ गए।

कभी कालू के साथ तो कभी शंकर के साथ में मोटर घर में मजे कर रही थी।

रोज का नियम सा बन गया था यह। कभी कभी तो दोनों के एक साथ भी मजे लेती थी।

एक दिन कि बात है। मेरे फूफाजी आये हुए थे। किसी शादी के लिए बुआ जी और माँ को शहर ले जा कर उनको खरीदारी करवानी थी।

मैंने फूफाजी को खाना-वाना खिलाया और डिब्बे में खाना डाल कर मोटर घर की तरफ चल पड़ी मेरे कालू को खाना खिलाने।

कालू तो मेरी राह देख ही रहा था। मेरे पहुँचते ही उसने मुझे दबोच लिया। काफी दिनों के बाद हम मिले थे और शंकर अभी वहाँ नहीं था।

देखते ही देखते हम दोनों वहाँ लेट कर रंगरलियाँ मानाने लगे। उसने मुझे चूमते हुए मेरे कपड़ो के ऊपर से मेरे मम्मे दबाते हुए मेरी सलवार खोल दी।

उसका लौड़ा खड़ा था और मुझे मेरी टांगो के बीच में चुभ रहा था।

"कालू आज तो तेरा पप्पू बड़ा जल्दी खड़ा हो गया रे?"

"अरे यह तो पहले से ही खड़ा था ! चल इसे दो-चार चुप्पे नहीं लगाएगी?" उसने बड़ी ही बेसब्री से कहा।

मैंने नीचे झुक कर उसका लौड़ा मुँह में लिया और चूसने लगी।

"दोनों गेंदों को निगल कर चूस रे छिनाल !" उसने कहा।

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Posted : 11/01/2012 10:14 am
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कुछ ही देर में मेरी चूत जवाब देने लगी और मुझे रह पाना अब नामुमकिन हो रहा था।

"डाल दे न अपना मूसल मेरे चूत में ! हाय कितना तड़पा रहा है रे ठरकी ! देख न कैसे पनिया रही है मेरी मुनिया .." मैंने उसके सामने लगभग गिड़गिड़ाते हुए कहा।

कालू ने मुझे दबोच लिया और अपना हाथ नीचे ले जाकर निशाने पर तीर रख कर डाल दिया मेरी चूत में अपना लौड़ा।

मेरी बहुत खुश थी, आखिर बहुत दिनों बाद मुझे कालू का लौड़ा मिला था।

मैंने उससे कहा, "हाय रे कालू ! बड़े दिनों बाद तेरा लौड़ा मिला है रे ! आज तो जी भर के चोद ले अपनी गुड़िया को।"

वो जोश में आते हुए बोला," साली झूठ बोलती है ! शंकर था न तेरे पास !"

"शंकर है तो सही, लेकिन उसमें तेरे जैसा जोश नहीं है रे मेरे कालू !" ऐसा मैंने उसे और जोश दिलाने के लिए कहा, मैं तो चाहती थी कि आज वो मेरी चूत को फाड़ कर तृप्त कर दे।

वो जोश में आकर मुझे चोदने लगा और दस मिनट के बाद हम शांत होकर एक तरफ लुढ़क गए।

तूफ़ान शांत हो चुका था और हम अपने कल्पनाओं के सागर में एक दूसरे का चुम्बन ले रहे थे। आज वो खास मूड में था ! चुदाई के बाद के चुम्बन मुझे और रोमांचित कर रहे थे।

करीब आधे घंटे के बाद हम सामान्य हुए और उसने कहा,"चल उठ कर सलवार पहन ले।"

उसने मेरी ब्रा का हुक लगाते हुए मुझे फिर से चूम लिया और मैंने भी बदले में उसे चूम कर उसका धन्यवाद अदा किया।

जब मैं अपनी सलवार ऊपर कर रही थी तो मुझे मोटर घर के बाहर एक साया दिखा। फिर अचानक ही किसी चीज़ के गिरने की आवाज आई।

मैं हड़बड़ा गई और बाहर जाकर देखा तो बाहर फूफाजी खड़े थे !

मेरे पैरों के नीचे से जमीन खिसक गई। मेरे चेहरे पर हवाइयाँ उड़ने लगी और मैं सर नीचे कर उनके सामने खड़ी हो गई।

वो बोले,"शर्म नाम की कोई चीज़ बची है या नहीं तेरे अन्दर?" वो मुझे डांट रहे थे और मैं सर झुका कर खड़ी थी।

उन्होंने कहा," चल आज तू घर चल ! तेरी माँ और बुआ से तेरी खैर निकलवाता हूँ। खाना पहुँचाने आती है या यहाँ हर मजदूर से चुदवाने ?"

इतना कह कर वो निकल गए।

मेरी तो फटने लगी। मुझे पता था कि बुआ का हाथ बहुत भारी है और वो यह भी नहीं देखती कि कहाँ लग रही है।

मेरे चेहरे पर हवाइयां उड़ते देख कालू ने मुझे गले से लगते हुए कहा,"देख ! तेरे फूफा बहुत ही बड़े ठरकी हैं। इन्हें मैं बहुत पहले से जानता हूँ। तेरी चाची के साथ भी सम्बन्ध रहे हैं इसके ! तू बस घर जा कर संभाल इसको।

पाँव पकड़ते हुए लुंगी में मुँह घुसा देना, शांत हो जायेगा।"

मुझे गुस्सा आने लगा, मैंने कालू को डांटते हुए कहा,"क्या बक रहा है कमीने !"

कालू ने मुझे समझाया,"बक नहीं रहा हूँ गुड़िया रानी ! तुझे अपनी इज्जत बचने का तरीका बता रहा हूँ। तेरा क्या बिगड़ जायेगा? दो लेती थी एक और ले लेना !"

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Posted : 11/01/2012 10:15 am
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मैं वहाँ से जैसे तैसे भाग कर घर आ गई। फूफाजी अपने कमरे में लेट कर अखबार पढ़ रहे थे। मैं उनके पैरों की तरफ बैठ कर उनसे विनती करने लगी।

"मुझे माफ़ कर दो फूफाजी, आगे से ऐसी गलती नहीं करुँगी।" इतना कह कर मैं रोने लगी। मेरे आँखों से आंसू बह रहे थे।

उन्होंने मुझे घूरते हुए कहा,"शर्म-लाज कुछ है तुझमें?"

"घुटने पकड़ लिए हैं फूफाजी, मुझे माफ़ कर दो !" इतना कह कर मैं वहाँ से रोते हुए अपने कमरे में चली आई और अपने बिस्तर में गिर कर सुस्ताने लगी।

बुआ, चाची और माँ सब बाजार गए हुए थे और उन्हें शाम से पहले लौटना नहीं था। वैसे भी कालू ने मुझे हल्का कर दिया था और ऊपर से गर्मी के कारण मुझे बेचैनी सी होने लगी थी। यूँ तो चुदाई के बाद मुझे नींद बड़ी अच्छी आती है मगर आज मेरी आँखों से नीद गायब थी। मैं चाह रही थी कि फूफाजी के सामने जाकर सब कुछ बता दूँ, मगर हिम्मत नहीं हो रही थी।

कभी कभी ख्याल आ रहा था कि उनसे जा कर लिपट जाऊं, खुद को उनके हवाले कर दूँ, उन्हें अपने दूध पिला दूँ ..

वैसे भी उन्होंने मुझे आधी नंगी तो देख ही लिया है....क्या पता शायद वो बहुत देर से मेरी जवानी का मजा ले रहे हों.. पता नहीं ऐसे अनगिनत ख्याल मेरे मन में घर कर रहे थे। मुझे यह तो ज्ञात था के मेरी उभरी हुई जवानी देख कर उनके दिल में कुछ तो हुआ होगा, मगर उनके गुस्से से मैं वाकिफ थी। इस अजीब सी कशमकश में कब मेरी आँख लग गई मुझे पता ही नहीं चला।

कुछ देर बाद मुझे मेरे पास किसी के लेटे होने का एहसास हुआ। ऐसा लगा जैसे कोई मेरे चूतड़ों पर हाथ फेर रहा हो। मेरी आँख खुल गई मगर मैंने सोये होना का नाटक करना चालू रखा।

मैंने अपनी आँखें धीरे से खोल कर कनखियों से देखा तो वो और कोई नहीं मेरे फूफाजी ही थे !

उन्होंने धीरे धीरे मेरी कमीज को ऊपर सरकाया और मेरे चिकने सपाट पेट पर हाथ फेरने लगे।

फिर धीरे से उन्होंने मेरा नाड़ा भी खोल कर मेरी सलवार को खिसकाते हुए मेरी पेंटी के ऊपर से ही मेरी चूत पर हाथ फेरने लगे।

वो बड़े आराम से मेरी नाभि पर हाथ फेरते हुए और मजे लेते हुए बोले,"गुड़िया ! अब मूड में आ भी जाओ ! कब तक सोते रहने का नाटक करोगी?"

फिर भी जब मैंने अपनी आँखें नहीं खोली तो उन्होंने मेरी पैंटी में हाथ डाल कर मेरे दाने को मसल दिया।

मैं उनकी तरफ मुड़ी और उनसे लिपट गई और बोली,"आप किसी से कहेंगे तो नहीं ?"

उन्होंने बड़े ही प्यार से मेरे होंठों को चूमते हुए कहा,"नहीं कहूँगा मेरी रानी ! चल उठ कर नंगी हो जा।"

मैंने कहा,"नहीं फूफा जी, माना कि मैं चुदाई करवाती हूँ और आपने मुझे देखा भी है पर आपके सामने यूँ नंगी होने में मुझे शर्म आ रही है। मैं आंखें बंद कर रही हूँ, आपको जो उतारना है, उतार लेना ।"

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Posted : 11/01/2012 10:15 am
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मैं खड़ी हो गई मगर मुझे यह ध्यान नहीं था कि फूफाजी ने मेरा नाड़ा खोल दिया है। जैसे ही मैं खड़ी हुई मेरी सलवार नीचे सरक कर पैरों में गिर गई। मैं शर्म से लाल हो रही थी और अपनी जाँघों को समेट रही थी।

"क्या मस्त जांघें हैं तेरी ! गुड़िया रानी इतनी चिकनी जांघें तो मैंने कभी देखी ही नहीं। दूर से देखा था तब पप्पू मेरा हिलने लगा था और अब पास से देख रहा हूँ तो मेरा पप्पू अकड़ने लगा है।" उन्होंने लगभग घूरते हुए अपनी आखों से मुझे चोदते हुए कहा।

"क्यों ? बुआ जी की चिकनी नहीं है क्या?" मैंने चुटकी ली।

"अब कहाँ वो बात !" उन्होंने एक लम्बी सांस लेते हुए कहा और मेरी कमीज उतार कर मेरी काले रंग की ब्रा में कैद मेरे कबूतरों को आजाद कर दिया।

मेरे फडफाड़ते हुए कबूतरों को देख कर वो बोले,"क्या मस्त माल है तेरे पास !"

और इतना कह कर वो मेरे अनारों को मसलने लगे।

कुछ देर मसलने के बाद उन्होंने मेरे चुचूक को अपने मुँह में भर लिया और चूस चूस कर मेरे चुचूक खड़े कर दिए।

"हाय फूफा जी ! मारोगे क्या ! बड़ा मस्त चूसते हो आप !"

"चल अब मेरा लौड़ा हिला और चूस इसको !"

"खुद पास आकर चुसवा लो न !"

उन्होंने खुद अपना लौड़ा पकड़ कर मेरे मुँह में डाल दिया और मैं चूमने लगी उनके मस्त लौड़े को।

"हाय रे गुड़िया रानी, क्या चूसती हो !"

कुछ देर चूसवाने के बाद बोले,"साली मुँह में झड़वा देगी क्या ?"

इतना कहते हुए उन्होंने मेरी टाँगें फैला दी। मैंने भी ज्यादा नाटक ना करते हुए रास्ता साफ़ कर दिया।

उन्होंने अपने लौड़े को पकड़ कर निशाने पर टिका कर एक करार झटका लगा दिया।

उनका लौड़ा मस्ती में मेरी चूत में झूलने लगा था।

"मजा आया रानी ?" उन्होंने अपने धक्कों को संयमित करते हुए पूछा।

"हाँ फूफाजी ! और तेज रगड़ा लगाओ ना !

"कुतिया क्या हाल है तेरा ! साली सुहाग रात पर पकड़ी जायेगी ! कुछ छोड़ दे उसके लिए भी ! तेरी उम्र में तो तेरी बुआ मेरा लौड़ा अपनी चूत में ले कर कराहने लगती थी, मगर तू तो बड़ी कमीनी है रे ! और जोर से धक्के लगाने को कह रही है !"

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Posted : 11/01/2012 10:15 am
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"हाय फूफाजी ! रगड़ दो ....रगड़ दो मुझे ...और....और तेज...तेज...चोदो मुझे !" मेरे मुँह से आवाजें निकल रही थी और फूफाजी मुझे तेजी से चोदने लगे थे।

करीब आधे घंटे के कोहराम के बाद हम दोनों फारिग हुए और एक दूसरे के जिस्म को जकड़ कर एक ओर लुढ़क गए।

फूफाजी बोले,"साली मैंने तो सोचा था कि तू मोटर घर में कालू से चुद कर ठंडी हो गई होगी। मगर तू तो पक्की हरामन है रे !"

"भतीजी किसकी हूँ ! सच बताना मैं अपनी चाची से भी ज्यादा मस्त हूँ न !",मैंने उन्हें छेड़ा।

"क्या मतलब है तेरा?" वो गुर्राए।

"वही जो पूछा है !"

"किसने कहा तुझसे यह सब?"

"बस बताने वाले ने बता दिया फूफाजी !"

"बहुत तेज है रे तू छोरी ! चल एक और दौर हो जाए !"इतना कह कर वो मेरी गाण्ड पर हाथ फेरने लगे।

"तेरी चूत मारते वक़्त देखा था, तेरी गांड बड़ी चिकनी है ! बोल मरवाएगी?" यह कह कर वो अपने हाथ से मेरी गोलाइयों का जायजा लेते हुए मेरी गाण्ड सहलाने लगे।

मैंने उन्हें समझाया," फूफाजी ! अभी सब आने वाले हैं। सो खुद की गाण्ड मत फड़वा लेना बुआ से !"

मगर वो कहाँ मानने वालों में से थे! उन्होंने जबरदस्ती अपना मुरझाया हुआ लंड मेरे गांड पर सटा दिया और अन्दर डालने की कोशिश करने लगे। लेकिन उनका इतनी जल्दी खड़ा नहीं हो पा रहा था।

आखिर हार मान कर वो मुझे अपने कपड़े पहनने को बोल कर अपने कपड़े ठीक करने लगे।

"अब तो तू मेरी ही है गुड़िया ! आज नहीं तो फिर कभी सही। अब मैं तुझे नहीं छोड़ने वाला !"

थोड़ी देर में कालू घर पर चाय लेने आया। उसने मुझसे सुबह वाले किस्से के बारे में पूछा,"कर लिया अपने फूफा को अपने गुनाहों में शामिल?"

मैं शरमा गई और शरमा कर उससे बोली, "चल हट ! कुत्ता ! जा चाय लेकर ! मैं आती हूँ खेतों पर !"

"क्यों अभी भी चूत की आग शांत नहीं हुई क्या जो दोबारा वहाँ आएगी?" उसने मुझे छेड़ा," फाड़ डालेंगे तेरी चूत को ! आज तो शंकर के अलावा कामा भी है वहाँ !"

मैं थक चुकी थी और ३ लौड़ों को एक साथ सँभालने की ताकत अभी नहीं थी मेरी। इसलिए मैंने चाय बना कर उसे पकड़ा कर उसे रुखसत किया।

इस किस्से के बाद तो मैंने हर किसी से चुदवाने लगी और खुले में गफ्फे लगाने लगी।

और इस तरह मैं गुड़िया से चुदक्कड़ मुनिया बन गई !

इसके बाद तो बस मैं हर तरह से सेक्स का मजा लेने लगी।

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Posted : 11/01/2012 10:16 am
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