मेंरी शर्मिली भाभी
 

मेंरी शर्मिली भाभी  

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हमारा परिवार एक बहुत ही आदर्श परिवार है सभी बड़े उँचे विचारों वाले लोग हैं। केवल मुझे छोड़ कर, हमारी मताजी की सोच है कि लड़्की हमेंशा अपने से छोटे घर की लानी चाहिये ताकि वो घर में असानी से निभा सके और अपनी लड़्की को हमेशा अपने से बड़े घर में देनी चाहिये, ताकि वो सुखी रह सके। सो मेंरे परिवार ने अपने उच्च विचारों के अनुसार मेंरे बड़े भाई की शादी एक अत्यन्त ही गरीब घर की लड़्की से कर दी उनकी इतनी भी हैसियत नहीं थी कि वो लोग अपनी लड़्की को ढंग के दो जोड़ी कपड़े भी दे सके। लेकिन गरीब होने के बाद भी वे बड़े खुद्दार लोग थे कभी किसी को अपनी गरीबी क अह्सास नहीं होने देते थे। उन्होने अपनी लड़्की को जैसा कि आम मध्यम वर्गीय गरीब परिवारों में शिक्षा दी जाती है वो सभी शिक्षा दि थी जैसे हर परिस्थिति में रहना , सब के साथ तालमेल रखना परिवार में कभी किसी कि चुगली न करना आदि आदि। वैसे भी मेंरी भाभी के परिवार की आर्थिक स्थिती मध्यम ही रही है बचपन से उनके परिवार ने अनेंक आर्थिक विषमताएं देखी है सो परिवार के लोग वैसे ही बड़े शालीन एवं विनम्र हैं।

भाभी कालेज भी पैदल ही आना जान करती थी उनके कालेज में भी कोई ज्यादा दोस्त नहीं थे और जो थे वो भी कुछ खास नहीं थे, गरीबॊं के वैसे भी ज्यादा दोस्त नहीं होते है।धन की की कमी इंन्सान को जीवन मे बड़ा ही संकुचित एवं आत्मविश्वास विहिन बना देते है। मेंरी भाभी के साथ भी कुछ ऎसा ही था वो बहुत ही सकुचा कर रहती थी अन्यन्त अल्प बात करती थी । किसी भी बात का "जी" "अच्छा" "ठीक है" ऎसे ही जवाब देती थी बहुत ही संभल कर बोलती थी उसका पूरा प्रयास रहता था कि उसकि बातों से कोई भी सदस्य नारज ना होने पाये। कभी कुछ गलत हो जाये तो भी शिकायत नहीं करती थी।शायद उसे अभी अपनी तीन जवान बहनों कि शादी कि चिंता मन ही मन सता रही थी इसलिये उसका पूरा प्रयास रहता था कि उसकी वजह से उसके परिवार का नाम खराब ना हो और उसकी बहनॊं कि शादी में कोई अड़्चन ना आये। गरीब मध्यम वर्गीय परिवारों के लिये तो वैसे भी ईज्जत ही सबसे बड़ी दौलत होती है। मेंरी मां तो बड़ी खुश थी ऎसी शर्मिली बहू को पाकर।

मुझे अपनी भाभी कि जो बात सबसे ज्यादा पसंद थी वो था उसका शानदार जिस्म। गोरा बदन,सुंदर चेहरा,बेह्तरीन चिकनी एवं मोटी जांघे,बाहर की तरफ़निकलती हुई गोल गोल मोटी मोटी गांढ़ और मदहोश करने वाली रसीली शानदार उभारों वाली उसकी दोनों छातियां। मैं तो जब भी उसे देखता मेरा लंड़ खड़ा हो जाता और मुझे ऎसी ईच्छा होती कि मै इसे तुरंत नंगी कर ड़ालू और उसकी रसीली छातियों में भरे हुए जवानी के रस को जी भर कर पिऊ। लेकिन ये एक सच्चाई थी कि वो रसीली छातियां और मखमली चूत मेंरी नही थी। ये सोच कर मेंरा मन अपने भाई के प्रति थोड़ी देर के लिये घृणा से भर जाता।

मेंरा भाई वैसे भी उस बेह्तरीन जवान पुदी का मजा नहीं ले पाता था क्योंकि उसकी नौकरी ही ऎसी थी महिने में बीस दिन तो बो बाहर ही रहता था। बचे हुए दस दिनों में सात दिन उसे शहर में अपनी टिम के साथ घूमना होता था।अब तीन दिन में नंगा नहायेगा क्या ? और निचोडे़गा क्या? सो किसी-किसी महिने तो भाभी बिन चुदी ही रह जाती थी। कभी कभी मुझे ऎसा विचार आता कि भाभी के लिये ऎसे विचार मन में लाना गलत है, लेकिन जैसे ही भाभी मेंरे साम्ने आती मेंरी कामवासना मेंरी अन्तरात्मा पर हावी हो जाती और मैं फ़िर से उत्तेजित हो जाता और उसको चोदने के खयाल में डूब जाता । मेंरे लिये तो भाभी को चोदना अब एक मिशन बन चुका था, मैं मन ही मन अपनी भाभी के उपर न्योछावर हो चुका था और उसके बेह्तरिन जिस्म का दिवाना बन गया था। अब तो रात दिन मेंरे मन में भाभी को चोदने का ही खयाल रहता था।

भाभी का शर्मिलापन मेंरे लिये काफ़ी सुखद और मेंरी योजना में काफ़ी सहायक था। मैने तय कर लिया कि ऎसे भाभी के जिस्म को चोदने का खयाल कर के मुठ्ठ मारने से कुछ हासिल नही होने वाला उसे पाने के लिये प्रयास करना पड़ेगा। वैसे भी जिस इंसान के लिये इस बेह्तरीन पुदी को घर में लाया गया था उसे तो इसे ठीक से देखने की भी फ़ुर्सत नहीं थी चोदने की बात तो बहुत दूर थी। दौलत और जवानी दोनों ही उपभोग करने पर हि सुख देते हैं अन्यथा दोनों बोझ बन कर रह जाते है। दौलत और औरत की जवानी दोनों को ही अपनी रक्षा के लिये मजबूत कंधो के सहारे की जरुरत होती है, अन्यथा उसे कोई भी लूट कर ले जा सकता है। मेंरे घर में भी जवानी की दौलत खुले आम घूम रही थी और उसका रखवाला गायब था। सो मैंने उसे लूटने का फ़ैसला कर लिया था। बस प्रयास करना था और अवसर हासिल करना था ।

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Posted : 01/10/2011 8:08 am
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मैं लगभग १० मीनट तक इसी प्रकार से उसकी चूत से खेलता रहा, इस दौरान मैं रश्मी की चूत में इतना तल्लीन रहा की मैं अपनी सुध बुध भी भूल गया और मुझे इतना भी याद नहीं रहा कि मैं अपनी ही सोई हुई भाभी के जिस्म से खेल रहा हूं और उसके खर्राटों पर से भी मेंरा ध्यान हट गया था, अचानक इसका खयाल आते ही मैं चौंका और उसके खर्राटों पर ध्यान दिया, कमरे में गूंजने वाले उसके खर्राटों की अवाज बंद हो चुकी थी और कमरे में सन्नाटा छाया हुआ था, अब मैं बुरी तरह से हड़्बड़ा कर वहां से उठा और भाभी के चेहरे की तरफ़ देखा वो उसी तरह से सोई पड़ी थी, मैं हिम्मत करके उसके चेहरे के पास अपना मुंह ले जा कर देखा मुझे वो पूर्व की तरह ही गहन नींद में लगी और मुझे उसके नाक से सांसो की सीऽऽऽऽऽसीऽऽऽऽऽ आवाज सुनाई देने लगी।

अब मैंने पुनः राहत की सांस ली और धीरे अपना हाथ उसके उसके बांए स्तन पर रख दिया वो प्रतिक्रिया विहीन निष्चेट पड़ी रही। अब मैंने पुनः उसके स्तनों को धीरे धीरे मसलना चालू कए दिया,रश्मी के बदन की मादक खुशबू को सूंधने और उसके स्तनों और चूत का स्वाद चख लेने के बाद मेंरे लिये खुद पर नियंत्रण काफ़ी कठिन हो गया था। भाभी का गदराया मदमस्त नग्न शरीर मेंरे सामने पड़ा था और मैं उसे देख कर आहें भर रहा था। मुझे ऎसा लग रहा था कि अब मैं इस नग्न सोई हुई इस सुंदरी के शरीर से लिपट जाऊं और अपनी बलिष्ठ भुजाओं मे उसे कैद कर उसे अपनी बाहों मे भर लूं और अपना लंड़ उसकी चूत में ड़ाल दूं , लेकिन ऎसा करने की अभी मुझमें हिम्मत नहीं थी और मेंरा इरादा भी नहीं था।

अपनी बाएं हाथ से उसके स्तनों को बारी बारी से मसलते हुए मैने अब उसके पलंग से बाहर लटके हुए बांए हाथ को अपने हाथ में लिया और उसके मुठ्ठी को धीरे खोला और अपने फ़ौलाद की तरह कड़क हो चुके धधकते हुए लंड़ को उसके हाथों मे पकड़ा दिया और फ़िर से उसकी मुठ्ठी को बंद कर दिया। अब मेंरा लंड़ उसके बांए हाथ में था, आहहहह रोमांच का चरम क्षण था वो मेंरे लिये और अब मेंरा लंड़ अपने आप ही झटके मारने लगा था।

अब मैने अपने हाथों में उसका बांया पंजा पकड़ लिया जिसमें मेंरा लंड़ था और अब मैंने अपनी मुठ्ठी जोर से बंद कर दी इस तरह अब मेंरा लंड़ उसके नरम हाथॊं मे समा गया। उसके हाथों में मेंरा लंड़ समाते ही मैं बेकाबू हो गया और उसके स्तनों को और भी जरा जोरों से मसलने लगा और अपने दांए हाथ से उसके मेंरे लंड़ पकड़े हाथ को हिलाने लगा, इस तरह मेंरी हसीन भाभी नींद में ही मेंरा मुठ्ठ मारने लगी।

अब उसके स्तनों को मैंने उत्तेजना में बुरी तरह से पकड़ लिया और इधर अपने एक हाथ से उसके अपने लंड़ पकड़े हाथ को जोर जोर से हिलाने लगा, इस तरह करने से उसका शरीर पलंग पर उसी तरह से हिलने लगा जैसे ट्रेन में सोए इंसान का शरीर हिलता है। उसके शरीर के इस प्रकार धीरे धीरे हिलने से उसके उन्नत स्तन भी हौले हौले हिल रहे थे जिसके कारण वातावरण और भी कामुक हो रहा था।

अब उत्तेजना के वशीभूत मैं अपने दांए हाथ को उसके पूरे शरीर पर फ़ेरने लगा तथा और भी तेजी से उसके हाथों को पकड़े हुए मुठ्ठ मारने लगा।

मेंरी उत्तेजना और वासना के अंत का अब समय आ चुका था और मुझे ऎसा लगने लगा कि कीसी भी समय मैं झड़ सकता हूं , अब मैं और तेजी से उसके हाथों को हिलाने लगा और अब मेंरे लंड़ की नसे फ़ड़कने लगी और मेंरी कमर भी हीलने लगी मुझे ऎसा लगा कि मेंरा वीर्य अब लंड़ में पहुंच चुका है तो मैंने तुरंत नींद मे बेखबर रश्मी के हाथ से अपना लंड़ बाहर निकाल लिया और अपना बांया पैर पलंग पर रखा और दांया पांव निचे ही रहने दिया। इस तरह अब मैं सोई हुई रश्मी के नंगे बदन के उपर था और मैंने उसी मुद्रा में खड़े खड़े ही उसके नंगे बदन को घूरते हुए और एक हाथ से उसके स्तनों को पकड़े हुए तेजी से अपना लंड़ हिलाने लगा। मै अपना पूरा वीर्य भाभी के नंगे जिस्म पर उंड़ेलना चाहता था।

कुछ क्षणों तक इसी तरह से करने के बाद अचानक मेंरे लंड़ ने वीर्य की एक गरम पिचकारी छोड़ी जो सीधे ही नंगी रश्मी भाभी के पेट और स्तन पर गिरी और फ़िर इसी तरह मेंरे लंड़ ने एक के बाद एक पांच बार वीर्य की पिचकारी छोड़ी और वो पूरा का पूरा वीर्य मैने अपनी गदराई मदमस्त हसीना के नंगे शरीर पर उड़ेल दिया और उसका पूरा शरीर वीर्य से भर दिया। उसकी छाती पर पड़े हुए वीर्य की बूंदो को मैंने उसके पूरे स्तनों पर लगाया और कपड़ो पर पड़े हुए वीर्य को हाथ में ले कर उसके चेहरे पर धीरे से मल दिया और हाथों के बचे हुए वीर्य को उसकी चूत पर लगा दिया।

अब अपने लंड़ को दो तीन बार मैंने झटका तो उसमें बची हुई कुछेक बुंदे बाहर आ गई उसे मैंने अपने लंड़ को दबाते हुए झटका और उसकी नंगी चूत पर टपका दिया।

इस प्रकार उसके शरीर को अपने वीर्य से नहलाने के बाद मैने अपना पैर पलंग से निचे रखा और वही निचे बैठ गया और उसकी चूत पर एक "किस" किया फ़िर उसके दोनों स्तनों और चेहरे को प्यार से चूमा और उसकी निचे लटकी टांग को हौले उठाकर पलंग पर रखा और उसके हाथ को भी उसी तरह उठाकर पलंग पर रखा और उसको हौले से दांई करवट सुलाया और एक नजर उसके नंगे बदन पर ड़ालने के बाद मै दरवाजे की तरफ़ बढ़ा वहां से उसे देखा तो वो उसी तरह से सोई पड़ी है और गाउन के कमर के भी उपर होने के कारण उसकी दोनों बड़ी बड़ी गांड़ दिखाई दे रही थी।

उसे देख मैं पुनः उसके पास गया और उसकी दोनों गांड़ो को कई बार चूमा और उठकर उसके कमरे से तेजी से बाहर निकल गया।

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Posted : 01/10/2011 8:11 am
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Posted : 01/10/2011 8:12 am
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तुषार वहां से निकल कर अपने कमरे में आया कमरे में नाईट लैंप पहले ही जल रहा था, वो उसकी रोशनी में ही अपने कमरे में टहलने लगाऔर सोचने लगा जो अभी अभी वो अपनी ही सगी भाभी के साथ कर के आया था, उस निर्दोष स्त्री के गहन नींद में होने का अनुचित लाभ उठाते हुए उसने अपनी हवस का जो वहशीपन उसके साथ किया था उससे उसकी कामवासना तो शांत हुई लेकिन उसके अन्तर्मन का ताप बढ़ गया और अब वो उसे कचोटने लगा और अपनी कमजोरी पर पश्चाताप करने लगा। उसका मन उसे धिकारने लगा यही सोच सोच कर वो परेशान कमरे में टहलने लगा और सोच रहा था कि "आखिर मैं खुद पर नियंत्रण क्यों नही रख पाता, मैं उसे देख कर पागल क्यों हो जाता हूं ?" , बेचारी
सीधी साधी भाभी मैं उसके भोलेपन और शर्मिलेपन का अनुचित लाभ उठा रहा हूं। मेंरे भाई ने कितने विश्वास से उसे यहां रखा है, कितने विश्वास से वो मुझे ये कहता है कि उसे अपने साथ ले कर जाया कर घुमाया कर और मेंरे मां-बाप, बहिन सब मुझ पर कितना भरोसा करते हैं, और एक मैं हूं कि मैने सबके विश्वास को धोखा दिया है, सबके साथ दगाबाजी की है, छी: धिक्कार है मुझ पर।ऎसा सोचते हुए वो जब थक गया तो पलंग पर लेट गया और सोचते हुए ही वो कुछ ही क्षणों में नींद के आगोश में समा गया।

इधर तुषार के कमरे से निकलते के लगभग डेढ़ मीनट के बाद रश्मी ने हौले से अपनी आंख खोली और अपनी अधखुली आंखों से धीरे से कमरे का जायजा लिया जब उसे पक्का यकीन हो गया कि उसका देवर तुषार उसके कमरे से जा चुका है तो वो झट से उठ कर पलंग पर बैठ गई और उसने शरीर का जायजा लिया।

उसने देखा कि उसे गहन नींद में समझ कर कामवासना में अंधे हो चुके उसके देवर तुषार ने उसके सोते हुए जिस्म के साथ हवस का जो खेल खेला था और जिस तरीके से उसके कपड़ों को अस्त व्यस्त कर दिया था उसे देख उसे लगभग नंगी ही कहा जा सकता था।केवल कपड़े नहीं उतारे थे तुषार ने के,लेकिन उसके शरीर के किसी अंग को उसने अनछुआ नहीं रखा था और उसके शरीर के सभी अंगो का उसने काफ़ी करीब से मुआयना किया था और उसके जिस्म के भूगोल को अच्छी तरह से समझ गया था,शायद राज से भी ज्यादा।

रश्मी ने अपने उपर एक नज़र ड़ाली,अपनी हालत देखते हुए उसे घोर लज्जा का अनुभव हुआ । उसके गाऊन के सभी बटन खुले हुए थे और उसके दोनों विशाल स्तन पूरी तरह अनावृत्त थे, उसका गाऊन कमर से उपर चढा हुआ था तथा उसकी दोनों मोटी चिकनी जांघे और उसके बीच दबी उसकी चूत साफ़ दिखाई दे रही थी। अपनी हालत देख कर वो सोच रही थी कि "कितनी बेरहमी से नोंच कर गया था उसका देवर उसका बदन"। अपने प्रति तुषार की हवस को काफ़ी समय से मह्सूस कर रही थी लेकिन वो इस हद तक जा सकता है ऎसा उसने सोचा भी नहीं था। जवानी के जोश में उसके कदम बहक गए हैं और उसकी अक्ल पर पत्थर पड़ गए लेकिन सुधा से शादी होते ही वो अपने रास्ते पर आ जायेगा और मेंरे प्रति उसका आकर्षण खत्म हो जायेगा ऎसा सोच कर और अपनी बहन की जिंदगी संवर जाये इस
कारण वो चुपचाप सहती रही।लेकिन अब बात काफ़ी बढ़ चुकी थी और उसे साफ़ मह्सूस हो रहा था कि उसकी हरकतें अब और बढ़ेंगी। उसकी इसी उहापोह का नतीजा था कि वो खुल्लमखुल्ला उसके जिस्म को एक घंटे तक नोच कर अपनी हवस शांत करके चलता बना और उपर से उसकी ये हिमाकत की उसने अपना पूरा का पूरा वीर्य ही उसके सोते जिस्म में ड़ाल दिया।

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Posted : 01/10/2011 8:14 am
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दरअसल रश्मी तो उसी समय उठ चुकी थी जब तुषार ने उसकी चूत में मुंह लगाया था।लेकिन वासना में अंधे हो चुके मूर्ख तुषार को ये बात समझ नहीं आई कि वो भाभी के जिस अंग से खिलवाड़ कर रहा है और उसमें मुंह लगा जवानी का रस चूस रहा है वो किसी भी स्त्री के लिये ऎसा संवेदनशील अंग होता है जिसके प्रति एक स्त्री हमेंशा सजग रहती है।जो स्त्री अपने अबोध बालक की शक्तिहीन करुण पुकार मात्र से अपनी गहरी नींद का परित्याग कर उसे अपने सीने से लगा कर अपने मातृत्व और वात्सल्य के रस से उसकी भूख मिटाने के लिये हर क्षण तत्पर रहती हो उसे क्या अपनी चूत पर किसी (पराये)पुरुष के स्पर्श का आभास नहीं होगा?लेकिन मूर्खों को ये बातें कहां समझ आती है?

काम अपना प्रथम प्रहार इंसान के दिमाग पर ही करता है और उसके सोचने समझने की शक्ती को खत्म कर देता है और आचार-विचार विहीन मनुष्य मूर्ख ही होता है।

जैसे ही तुषार ने रश्मी की चूत में मुंह लगाया था उसी क्षण उसकी नींद उड़ गई थी उसने मुंह उपर उठाया और देखा तो उसके होश उड़ गए। सामने उसका सगा देवर तुषार था जो बड़े ही अजीबो गरीब तरिके से अपना मुंह बना रहा था और परम संतोष के भाव के साथ उसकी चूत को चूस रहा था।

चूत का रस पीने में वो इतना मशगूल था कि उसे तनिक भी अभास नहीं हुआ कि उसकी भाभी जाग चुकी है और उसकी चोरी पकड़ी जा चुकी है।उस एक क्षण में ही रश्मी के दिमाग में कई बातें कौंध गई और वो निढ़ाल पड़ी रही। वो चाहती तो उसी क्षण उठ कर उसे चांटा मार सकती थी या शोर मचा कर घर के सदस्यों को बता सकती थी लेकिन उसने सोचा ऎसा करने में खतरा ही खतरा है।हो सकता है तुषार उल्टा उस पर ही लांछन लगा दे और घर वालों ने यदि उसकी बात को सच मान लिया तो? यदि किसी ने पुछ लिया कि वो तेरे कमरे में घुसा कैसे? तो मैं क्या जवाब दूंगी ? कैसे खुद को निर्दोष साबित करुंगी? कौन है मेरे पक्ष में ? परिस्थितियां भी तो नहीं है मेरे पक्ष में।

जब एक धोबी ने सीता जैसी देवी पर लांछन लगा दिया तो स्वयं भगवान श्रीराम ने ये जानते हुए कि सीता निर्दोष है उसे अग्नी परिक्षा का आदेश दिया ताकि युगों युगों तक लोगों को ये संदेश जाता रहे की देवी सीता पवित्र है।

मुझे बचाने वाला कौन है यहां?निर्बल पुरुष न तो अपनी रक्षा कर सकता है न अपनी संपत्ति और न अपनी स्त्री ,कदाचित ईश्वर ही दया कर उसे बचाने आ जाए कुंती की तरह तो अलग बात है लेकिन रश्मी ने सोचा मेंरा चीरहरण तो इस तुषार ने कर ही ड़ाला है।मैं क्या जवाब दूंगी घर के लोगों को कि "तू नंगी होते तक क्यों चुप पड़ी रही?"

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Posted : 01/10/2011 8:15 am
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दूसरा खतरा ये था कि कहीं बात इतनी न बिगड़ जाय कि तुषार की सुधा से शादी ही टूट जाय अगर ऎसा हुआ तो मेंरा परिवार मुझे कभी माफ़ नहीं करेगा। विशेषकर सुधा और मेंरी माँ। वो तो सीधा यही पूछेगी की बात इतनी कैसे बढ़ी की वो इतनी हिम्मत कर बैठा ? ताली एक हाथ से बजती है क्या ? कोई पुरुष किसी स्त्री को दो या तीन बार जाने अन्जाने स्पर्श का प्रयास कर सकता है बार बार नहीं। स्त्री की एक क्रोध भरी नजर ही किसी पुरुष को पस्त करने के लिये काफ़ी होती है। फ़िर यदि कोई पुरुष बार बार किसी स्त्री के साथ ऎसा करता है तो इसका मतलब साफ़ है कि इसमें उसकी भी रजामंदी है।

तीसरी परेशानी रश्मी की ये थी कि यदि इस वक्त उसने आंख खोली और दोनों की नजर मिली तो फ़िर दोनों के लिये ही जीवन भर एक दूसरे से नजर मिलाना संभव नहीं था। कम से कम रश्मी के लिये तो संभव था ही नहीं।और ऎसी अवस्था में तुषार से नजर मिलाने का साहस रश्मी में था ही नहीं। इसीलिये उसने इस शुतुरमुर्ग की तरह रेत में मुंह छुपा कर इस तूफ़ान को गुजर जाने देने में ही अपनी भलाई समझी और वो आंखे बंद किये पड़ी रही।

अब तक उसके शरीर में लगाया हुआ तुशार का वीर्य सूखने लगा था और उसकी चमड़ी खीचाने लगी थी। उसने अपने चेहरे और स्तनों पर हाथ लगाया वहां एक परत सी बन गई थी।

वो पलंग से उठी और कांच के सामने जा कर खड़ी हो गई और अपने जिस्म को निहारने लगी।उसने अपना गाऊन निचे गिरा दिया, अब वो नंगी कांच्के सामने खड़ी थी। उसने उसमे अपने बदन को देखते हुए अपना हाथ चूत में लगाया वहां लगाया हुआ तुषार का वीर्य अभी भी गीला था और उसे वहां चिपचिपा पन मह्सूस हो रहा था। वहां हाथ लगाते ही उसके हाथ में उसके हाथ में उसके देवर का वीर्य आ गया और उसका हाथ भी चिपचिपाने लगा। उसने दरवाजे की तरफ़ नजर उठाकर देखा वो अभी तक अधखुला था,वो तत्काल दरवाजे की तरफ़ दौड़ी और उसे अंदर से बंद किया।

जवानी का लूटना किसी स्त्री के लिये दौलत लूट जाने से भी बड़ी घटना होती है। रश्मी दरवाजे के पास ही नंगी खड़ी हो कर पलंग की तरफ़ देख रही थी जहां अभी कुछ ही मीनटों पहले तुषार उसकी जवानी को लूट रहा था। उसने पलंग की तरफ़ देखते हुए अपार शर्म और लज्जा का अनुभव हो रहा था उसने अपने दोनों हाथों की हथेलियों से अपने चेहरे को ढ़क लिया और फ़फ़क कर रोने लगी। उसी तरह रोते हुए वो पलंग के पास गई और वहीं जमीन पर बैठ गई और पलंग पर अपना सर रख कर फ़फ़कने लगी।

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Posted : 01/10/2011 8:15 am
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रश्मी लज्जित थी और रो रही थी,उसे चुप कराने वाला वहां कोई नहीं था,हर गलत काम के समय कचोटने वाला उसका अन्तर्मन भी मौन था।दर असल वो अपनी ही अन्तरात्मा के सामने बेनकाब होने से लज्जित थी और फ़फ़क कर रो रही थी। उसके अन्तर्मन ने उसके राम,सीता,कुंती और सुधा की शादी वाले तमाम तर्कों को नकार दिया था और ये साबित कर दिया था कि जिस्मानी तौर पर तुषार के हाथों से नंगी होने से पहले ही वो चारित्रिक रुप से अपने ही अन्तर्मन के सामने उसी समय नंगी हो चुकी थी जब तुषार ने उसका गाऊन उठा कर उसकी चूत में मुंह लगा कर उसे चूसना शुरु किया था। किसी पुरुष के साथ संसर्ग की अपनी दमित इच्छा को अपने देवर से पूरी होते पा कर वो यूं ही निढ़ाल पड़ी रही और नींद का बहाना उसकी ढ़ाल का काम रहा था।

अब उसे इस बात की बेहद ग्लानी हो रही थी कि जब तुषार उसकी चूत को चूस रहा था तो कैसे रोमांचित हो रही थी और रोमांच में उसने कैसे अपने होठों को अपने दातों से काट लिया था। कहीं तुषार को उसके जागने का अभास ना हो जाय इस ड़र से वो संयत हो गई और आंख बंद किये पड़ी रही।फ़फ़कते हुए वो सोच रही थी कि कैसे जब तुषार ने उसकी चूत को चूसना बंद किया तो वो कितनी बुरी तरह से तड़्फ़ी थी और उसका मन किया था कि वो उठ कर उसके सर को फ़िर से उसकी जांघो के बीच में फ़ंसा कर उसकी चूत को चूसवाना चालू रखे।उसे अच्छी तरह से याद था कि जब वो हड़्बड़ा कर उठा और उसने देखा कि मेंरे खर्राटे की अवाज को बंद पाकर वो कैसे भय से पीला पड़ गया था तो उसने किस चतुराई से अपनी नाक से सीऽऽऽऽऽसीऽऽऽऽऽ कि अवाज निकाल कर उसे अपने सोते होने का अहसास करवाया था और अपने जिस्म से खेलते रहने के लिए उकसाया था।

उसकी अन्तरात्मा ने साक्षी भाव से उसके तमाम मनोभावों देखा था और उसकी दमित कामवासना को मह्सूस किया था।उसने एक हंस की तरह दूध से पानी को अलग कर दिया था। और अपनी ही अन्तरात्मा का सामना करने का साहस रश्मी में नहीं था, खुद के ही सामने बेनकाब होने और अपनी कमजोरी पर नियंत्रण न रख पाने के कारण वो बेहद लज्जित थी और अपनी अन्तरात्मा के तीखे सवालों का जवाब न दे पाने के कारण वो फ़फ़क फ़फ़क कर रो रही थी।

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Posted : 01/10/2011 8:15 am
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कुछ देर तक इसी तरह मंथन करने और लगातार रोने के कारण वो मानसिक रुप से बुरी तरह से थक गई तो वो पलंग के पास से उठी नंगी ही सिसकते हुए बाथरुम में चली गई। वहां उसने शावर चालू किया और नहाने लगी और अपने जिस्म से तुषार के वीर्य को साफ़ किया।नहाते समय वो यही सोच रही थी कि अब वो इस खेल को बंद करेगी और अब वो तुषार को और अधिक स्पेस नहीं देगी।

चार दिनों के बाद राज तो आ ही रहा है वो उससे बात करेगी और उस पर दबाव बानायेगी कि वो उसे अपने साथ ले जाय।नहाने के बाद उसने अपना बदन पोंछा और बाहर निकल कर आल्मारी से एक दूसरा
गाऊन निकाल कर पहना और पलंग पर जा कर सो गई।

अगले दिन सुबह जब तुषार सो कर उठा तो उसे रात वाली घटना याद आने लगी और किसी फ़िल्म की तरह सारे दृष्य उसके सामने आने लगे। नींद में बेखबर अपनी भाभी के जिस्म से उसने जो हवस का खेल खेला था उससे उसका मन खिन्न हो गया, वो अपना चेहरा ही आईने मे देखने का साहस नहीं कर पा रहा था लेकिन किसी तरह वो उठा और फ़्रेश हो कर नीचे पहूंच गया। नीचे मां नहाने के बाद पूजा की तैयारी में व्यस्त थी उसे इतनी सुबह तैयार पा कर वो आश्चर्य से उससे बोली अरे बेटा इतनी सुबह तैयार हो गये कहीं जाना है क्या?जवाब में उसने कहा हां मां आज कालेज जल्दी जाना है,तुम जल्दी से चाय नाश्ता दे दो।

मां ने कहा मैं क्यों बेटा रश्मी है न किचन में वो भी आज जल्दी उठ गई है। दरअसल कल रात की घटना के कारण वो ठीक से सो नही पाई थी और सुबह जल्दी उठ गई थी।तुषार ने चौंक कर कहा भाभी इतनी जल्दी उठ गई । मां ने कुछ नहीं कहा और केवल मुस्कुरा दिया और वहीं से उसने जोर से अवाज दे कर कहा रश्मी तुषार के लिये चाय नाश्ता दे दो आज वो भी जल्दी उठ गया है उसे जल्दी कालेज जाना है।ऎसा बोल कर मां ने पेपर उसकी टेबल पर रखा और पूजा करने चली गई।

मां के जाते ही तुषार असहज मह्सूस करने लगा उसमें आज रश्मी का सामना करने का साहस नही था।वो बड़ी ग्लानी मह्सूस कर रहा था। उधर रश्मी का भी यही हाल था लेकिन क्या करे मज्बूरी थी जाना तो था ही सो उसने जल्दी से चाय नाश्ता तैयार कर मन भर के ड़ग भरते हुए उसके टेबल की तरफ़ जाने लगी। भाभी को अपनी तरफ़ आते देख वो पेपर पढने का नाटक करने लगा,उधर भाभी भी जल्दी से चाय नाश्ता उसकी टेबल पर रख कर जल्दी से किचन की तरफ़ जाने लगी,दोनों ने न एक दूसरे की तरफ़ देखा और न ही कोई बात की।

वो इतनी तेजी से किचन की तरफ़ जा रही थी कि उसकी दोनों बड़ी बड़ी गांड बुरी तरह से उछल रही थी।लेकिन जिन गांड़ो का तुषार पिछले आठ माह से दिवाना था आज उसने उसकी तरफ़ पहली बार देखा तक नहीं। उसने

अपना नाश्ता खत्म किया और कालेज चला गया।उस पूरा दिन वो घर नहीं आया रात को घर आया और थोड़ा बहुत खा कर अपने कमरे में जा कर सो गया।

दूसरे दिन भी यही हुआ वो सुबह जल्दी ही कलेज चला गया और फ़िर रात को देर से घर आया।लेकिन देर से घर आने के बावजूद उसने घर में सभी को जागते हुए पाया,घर के सारे सदस्य ड्राईंग रुम में ही बैठे थे और उसी का इंतजार कर रहे थे।

उसने देखा कि मां और पिताजी आपस में धीरे धीरे कुछ बात कर रहे है और रश्मी उनके सोफ़े के पीछे खड़ी थी। दिया भी बगल वाले सोफ़े में बैठ कर उनकी बातों को उन रही थी।सब के इस प्रकार से
बैठ कर चर्चा करने का मतलब साफ़ था कि वे किसी गंभीर मसले पर बात कर रहे थे। तुषार के माथे पर बल पड़े वो सोचने लगा कि कहीं भाभी ने तो रात वाली बात नहीं बता दी है इन लोगों को। दर असल तुषार को अपनीभाभी के पिछले दो दिनों के उसके साथ व्यवहार से उस पर शक हो रहा कि कहीं उस रात वो जग तो नहीं रही थी।ज्यों ज्यों वो उस बारे में सोचता उसका शक यकीन में बदलता जा रहा था कि उस रात भाभी पक्का जाग चुकी थी

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Posted : 01/10/2011 8:15 am
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इस दुनिया में तमाम तरह के लोग मौजूद है। न तो सब को एक साथ खुश रखा जा रकता है और ना ही सबको नाराज। एक ही परिवार में रहने वाले सदस्यों के बीच भी वैचारिक मतभेद होते है। इस दुनिया में सही को सही और सही को गलत कहने वाले भी और गलत को सही कहने वाले भी मौजूद है। अब किस किस का मुंह बन्द किया जाय और कितनों को खुश रखा जाय। एक ईश्वर से भी लोग खुश नहीं होते और अपनी अपेक्षा पूरी न होने पर लोग अपना ईष्ट देव भी बदल देते हैं । और उसको गालियां तक देते है, हम तो केवल तुच्छ इंसान है।

एक व्यक्ति को चाय पीने की तलब लगती है तो वो किसी अच्छी होटल में जाता है वेटर को बुला कर चाय मंगवाता है और थोड़ा इंतजार करता है चाय के लिये, वहीं कोई व्यक्ति इसी काम किसी भी चाय ठेले में २ रु फ़ेंकता है चाय तत्काल हाजिर हो जाती है। उसे इस बात से कोई सारोकार नहीं ये चाय है या उसके नाम पर गरम पानी । उसे इसकी quality से कोई सारोकार नहीं य उसे इसकी समझ ही नहीं

"शर्मिली भाभी" में मैं यही बताना चाह रहा हूं कि प्रत्येक इंसान की अपनी शारीरिक/मानसिक जरुरत होती है, इसे यदि नजरअंदाज किया गया तो रश्मी जैसी अत्यन्त शर्मिली और संकुचित स्त्री भी पथभ्रष्ट हो सकती है। हर उम्र की अपनी विशेषता होती है और अपनी जरुरत,उसी प्रकार हर रिश्ते की अपनी मर्यादा इसको नजरअंदाज करना और उपेक्षा करने के गंभीर परिणाम हो सकते है। परिवार के बुजुर्ग बच्चों की शादी में तो बढ़ चढ़ कर हिस्सा लेते हैं लेकिन उसके बाद उनकी जरुरतों से उनका कोई सारोकार नहीं होता।

किसी हवा से भरे गुब्बारे को पानी में जितनी ताकत से अंदर दबाते है तो पानी उसकी चार गुनी ताकत से उसे बाहर फ़ेंक देता है। काम(Sex) की शक्ति भी वैसी ही होती है इसे जितना दबाओ या नजरअंदाज करो ये उसके कई गुना उभर कर पलट्वार करती है जिसमें विश्वामित्र जैसे ऋषी भी बह जाते हैं। मैं तो यही बताना चाहता हूं कैसे रश्मी जैसी अत्यन्त शर्मिली स्त्री भी अपनी लगातार उपेक्षा और अपनी शारीरिक जरुरतो के कारण विकल्प न होने के कारण सच्चरित्र बनी हुई थी लेकिन तुषार के रुप में विकल्प मिलते ही "काम" के दाबव के आगे झुक गई और पतिता बन गई।

मैं भले ही erotic लिख रहा हूं लेकिन सार्थक लिख रहा हूं , ५ मीनट की फ़टाफ़ट चुदाई वाली कहानी मैं नहीं लिख सकता । ऎसी निम्नस्तर की कहानियां ढूंढ़्ने वाले अपने स्तर के अनुरुप नेट में साईट खोज लें।

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Posted : 01/10/2011 8:39 am
 Anonymous
(@Anonymous)
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इतनी गंभीरता से उन लोगों को बात करते देख कर एक बार तो तुषार सहम गया और दरवाजे के पास ही खड़े हो कर सोचने लगा कहीं भाभी ने रात वाली बात आखीरकार इन लोगों को बता तो नहीं दी होगी। ऎसा विचार मन में आते ही उसके रोंगटे खड़े हो गये और उसकी गांड़ फटने लगी।

आखिर मरता क्या ना करता ? वो धीरे धीरे उनकी तरफ़ बढने लगा। पाप करना जितना आसान होता है और मजेदार होता है उतना ही कठिन उसका बोध होता है। और उसका परिणाम उतना ही भयावह। दरवाजे से मात्र दस कदम दूर चलने में तुषारको ऎसा लगा मानो वो दस बार मर कर जनम ले चुका है।

जैसे तैसे वो उनके पास जा कर खड़ा हो गया। तभी दिया की नज़र सबसे पहले उस पर पड़ी और वो बोल उठी लो आ गये जनाब,सभी ने एक साथ पिछे मुड़ कर देखा और सबकी नज़र तुषार पर टिक गई। एक क्षण के लिये कमरे में सन्नाटा छा गया। तुषार नज़रें झुकाये खड़ा था किसी अपराधी की तरह। उसक दिल धड़क रहा था।

माँ ने तनिक क्रोध भरी अवाज में कहा "क्यों रे बेशर्म, नालायक"
माँ के इतना कहते ही तुषार का मन किया की उसका पाँव पकड़ कर फ़ूट-फ़ूट रोने लगे और माफ़ी मांग ले। उसकाचेहरा देखने लायक था और उस पर हवाईयां उड़ रही थी। वो बदहवास हो उनकी तरफ़ देख रहा था। उसकी बदहवासीको "दिया" ने और बढा दिया उसने कहा " हां माँ लगाओ हम सब की तरफ़ से और राज भैया की तरफ़ से भी"।

"राज" का नाम सुनते ही वो पूरी तरह से ढ़ीला पड़ गया और समझ गया कि भाभी ने आखिर उसकी पोल खोल ही ड़ाली है , गूंगी गुड़िया के मुंह में ज़बान आ गई है और अब उसकी शामत आने वाली है। उसका मान सम्मान , रुतबा सब खतम हो गया। उसने सोचा अब क्या किया जा सकता है? आखिर उसने काम ही ऎसा किया था। वो मन ही मन खुद को कोसने लगा और सोचने लगा कि ऎसे जीने से तो मर जाना बेह्तर है। उसने तय कर लिया कि चाहे इनको जो बोलना हो सो बोल ले वो कुछ नहीं बोलेगा और आज अपने पैरों से चल कर आखिरी बार अपने कमरे में जायगा।

अपमानित हो कर जीने से तो मर जाना बेह्तर है। उसने तय कर लिया था उपर जा कर फ़ांसी लगा कर अपनी जान दे देगा। कमरे में फ़िर कुछ क्षण के लिये चुप्पी चा गई। आखिर उसके पिताजी ने चुप्पी तोड़्ते हुए कहा तुम दोनों माँ बेटी को कोई धंधा नही है ? बेकार में इसे धमका रही हो साफ़ साफ़ बतओ ना इसे । पिताजी घुड़की सुन कर दोनों मां बेटी खिलखिला कर हंस पड़ी।

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Posted : 01/10/2011 8:42 am
 Anonymous
(@Anonymous)
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अपनी मां और बहन को इस तरह से हंसते हुए देख कर तुषार की जान में जान वापस आई । उसकी मां उसके पास जा कर बोली तू तो ऎसे ड़र गया था जैसे तेरी कोई चोरी पकड़ी गई हो या तू कहीं से ड़ाका ड़ाल कर या किसी का खून कर के आया हो।

चोरी तो उसने की थी अपने ईमान की और ड़ाका ड़ाला था अपनी ही माँ समान सगी भाभी की जवानी
पर और खून किया था अपनी ही अन्तरात्मा का। लेकिन ये किसी को दिखाई नहीं दे रहा था। खुद तुषार को भी नहीं।

वैसे भी आज के जमानें में चोरी उसी को कहते हैं जो पकड़ी जाय। सो तुषार साहूकारों की तरह खड़ा हो गया। वो समझ चुका था कि बात कुछ और ही है और वो नाहक ही ड़र रहा था।

कुछ क्षण पहले फ़ांसी लगा कर मरने की बात सोचने वाला तुषार न केवल फ़िर से निर्लज्ज बन गया बल्कि पहले से ज्यादा बेखौफ़ भी । उसे पूरा यकीन हो गया कि ये गदराई हसीना कभी अपना मुंह नही खोलेगी। ऎसा विचार मन में आते ही उसने पूरे दो दिनों के बाद फ़िर से अपनी भाभी के गदाराए बदन को नीचे से उपर तक देखा और उसकी नज़र फ़िर से उसकी झिनी साड़ी के अंदर दिखने वाले उसके क्लिवेज पर पड़ने लगी। उसके लंड़ ने पेण्ट के अंदर से झटका मार रश्मी की रसीली जवानी को सलामी दे ड़ाली।

जिस तरह से दिया बुझने से पहले आखिरी बार जोर से जलता है उसी तरह तुषार की अन्तरात्मा भी उसे लगातार दो दिन तक अपराध बोध कराने के बाद आज सदा सदा के लिये चुप हो गई। तुषार काफ़ी आज़ाद मह्सूस कर रहा था।

पाप करने के लिये लोग नये नये बहाने बनाते हैं और उसे सही साबित करने के लिये अपने हिसाब से तर्क देते हैं। इंसान का मन एक वकील की तरह काम करता है। जिस तरह एक वकील अदालत में अपने तर्कों से अपने क्लाइंट के गलत काम को भी सही साबित कर देता है और उसे सजा से बचा लेता है। उसी प्रकार तुषार के अंदर बैठा उसका मन रुपी वकील भी उसे समझा रहा था कि उसने जो किया उसमें कुछ भी गलत नहीं है। आखिर रश्मी जवान है और पति उससे काफ़ी दूर है और अगले काफ़ी महिनों तक उसके यहां वापस आने की कोई गुंजाईश भी नही है, ऎसे में अपनी शरीर की जरुरतों के आगे यदि वो झुक गई और किसी और से उसका रिश्ता बन गया तो?

जिस प्रकार इंदौर की एक जैन साध्वी इंदुप्रभा अपने शरीर के ताप को न सह पाई और अपने ही दूध वाले राधेश्याम गुर्जर के साथ भाग गई थी तो कैसे पूरे देश में जैन समाज की नाक कटी थी। कहीं रश्मी ने ऎसा कोई कदम उठाया तो पूरे समाज मे तुम्हारे परिवार की नाक ही ही कट जायगी ।

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Posted : 01/10/2011 8:42 am
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