मैं हूँ हसीना गजब क...
 

मैं हूँ हसीना गजब की  

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 Anonymous
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मैं स्मृति हूँ. 26 साल की एक शादीशुदा महिला. गोरा रंग और
खूबसूरत नाक नक्श. कोई भी एक बार मुझे देख लेता तो बस मुझे
पाने के लिए तड़प उठता था. मेरी फिगर अभी 34(ल)-28-38. मेरा
बहुत सेक्सी
है. मेरी शादी पंकज से 6 साल पहले हुई थी. पंकज एक आयिल
रेफाइनरी मे काफ़ी
अच्च्ची पोज़िशन पर कम करता है. पंकज निहायत ही हॅंडसम और
काफ़ी अच्छे
स्वाभाव का आदमी है. वो मुझे बहुत ही प्यार करता है. मगर मेरी
किस्मेत मे सिर्फ़ एक आदमी का प्यार नही लिखा हुआ था. मैं आज दो
बच्चो की मा हूँ मगर उनमे से किसका बाप है मुझे नही मालूम.
खून तो शायद उन्ही की फॅमिली का है मगर उनके वीर्य से पैदा हुआ
या
नही इसमे संदेह है. आपको ज़्यादा बोर नही करके मैं आपको पूरी
कहानी
सुनाती हूँ. कैसे एक सीधी साधी लड़की जो अपनी पढ़ाई ख़तम
करके
किसी कंपनी मे
सेक्रेटरी के पद पर काम करने लगी थी, एक सेक्स मशीन मे तब्दील
हो गयी. शादी
से पहले मैने किसी से जिस्मानी ताल्लुक़ात नही रखे थे. मैने अपने
सेक्सी बदन को बड़ी मुश्किल से मर्दों की भूखी निगाहों से बचाकर
रखा था. एक अकेली लड़की का और वो भी इस पद पर अपना कोमार्य
सुरक्षित रख पाना अपने आप मे बड़ा ही मुश्किल का काम था. लेकिन
मैने इसे संभव कर दिखाया था. मैने अपना कौमार्या अपने पति को
ही समर्पित किया था. लेकिन एक बार मेरी योनि का बंद द्वार पति के
लिंग से खुल जाने के बाद तो पता नही कितने ही लिंग धड़ाधड़ घुसते
चले गये. मैं कई मर्दों के साथ हुमबईस्तर हो चुकी थी. कई
लोगों
ने तरह तरह से मुझसे संभोग किया……………

मैं एक खूबसूरत लड़की थी जो एक मीडियम क्लास फॅमिली को बिलॉंग
करती थी. पढ़ाई ख़तम होने के बाद मैने शॉर्ट हॅंड आंड ऑफीस
सेक्रेटरी का कोर्स किया. कंप्लीट होने पर मैने कई जगह अप्लाइ
किया. एक कंपनी सुदर्शन इंडस्ट्रीस से पी ए के लिए कॉल आया.
इंटरव्यू मे सेलेक्षन हो गया. मुझे उस कंपनी के मालिक मिस्टर. खुशी
राम की पीए के पोस्ट के लिए सेलेक्ट किया गया. मैं बहुत खुश हुई.
घर
की हालत थोड़ी नाज़ुक थी. मेरी तनख़्वाह ग्रहस्थी मे काफ़ी मदद करने
लगी.

मैं काम मन लगा कर करने लगी मगर खुशी राम जी की नियत अच्छि
नही
थी. खुशिरामजी देखने मे किसी भैंसे की तरह मोटे और काले थे.
उनके पूरे चेहरे
पर चेचक के निशान उनके व्य्क्तित्व को और बुरा बनाते थे. जब वो
बोलते तो उनके होंठों के दोनो किनारों से लार निकलती थी. मुझे
उसकी
शक्ल से ही नफ़रत थी. मगर
क्या करती मजबूरी मे उन्हे झेलना पड़ रहा था.

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Posted : 12/02/2011 9:20 am
 Anonymous
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मैं ऑफीस मे सलवार कमीज़ पहन कर जाने लगी जो उसे नागवार
गुजरने
लगा. लंबी आस्तीनो वाले ढीले ढले कमीज़ से उन्हे मेरे बदन की
झलक नही मिलती थी और ना ही मेरे बदन के तीखे कटाव ढंग से
उभरते.

"यहाँ तुम्हे स्कर्ट और ब्लाउस पहनना होगा. ये यहाँ के पीए का ड्रेस
कोड
है." उन्हों ने मुझे दूसरे दिन ही कहा. मैने उन्हे कोई जवाब नही
दिया. उन्हों ने शाम तक एक टेलर को वही ऑफीस मे बुला कर मेरे
ड्रेस का ऑर्डर दे दिया. ब्लाउस का गला काफ़ी डीप रखवाया और स्कर्ट
बस इतनी लंबी की मेरी आधी जाँघ ही ढक पाए.

दो दिन मे मेरा ड्रेस तैयार हो कर आगेया. मुझे शुरू मे कुच्छ दिन
तक तो उस ड्रेस को पहन कर लोगों के सामने आने मे बहुत शर्म आती
थी. मगर धीरे धीरे मुझे लोगों की नज़रों को सहने की हिम्मत
बनानी पड़ी. ड्रेस तो इतनी छ्होटी थी कि अगर मैं किसी कारण झुकती
तो सामने वाले को मेरे ब्रा मे क़ैद बूब्स और पीछे वाले को अपनी
पॅंटी के नज़ारे के दर्शन करवाती.

मैं घर से सलवार कमीज़ मे आती और ऑफीस आकर अपना ड्रेस चेंज
करके अफीशियल स्कर्ट ब्लाउस पहन लेती. घर के लोग या मोहल्ले वाले
अगर मुझे उस ड्रेस मे देख लेते तो मेरा उसी मुहूर्त से घर से
निकलना ही बंद कर दिया जाता. लेकिन मेरे पेरेंट्स बॅक्वर्ड ख़यालो
के
भी नही थे. उन्हों ने कभी मुझसे मेरे पर्सनल लाइफ के बारे मे
कुच्छ भी पूछ ताछ नही की थी.

एक दिन खुशी राम ने अपने कॅबिन मे मुझे बुला कर इधर उधर की
काफ़ी
बातें
की और धीरे से मुझे अपनी ओर खींचा. मैं कुच्छ डिसबॅलेन्स हुई तो
उसने मुझे अपने सीने से लगा लिया. उसने मेरे होंठों को अपने
होंठों से च्छू लिए. उसके मुँह से अजीब तरह की बदबू आ रही थी.
मैं एक दम घबरा गयी. समझ मे ही नही आया कि ऐसे हालत का
सामना
किस तरह से करूँ. उनके हाथ मेरे दोनो चूचियो को ब्लाउस के उपर
से मसल्ने के बाद स्कर्ट के नीचे पॅंटी के उपर फिरने लगे. मई
उनसे
अलग होने के लिए कसमसा रही थी. मगर उन्होने ने मुझे अपनी बाहों
मे बुरी तरह से जाकड़ रखा था. उनका एक हाथ एक झटके से मेरी
पॅंटी के अंदर घुस कर मेरी टाँगों के जोड़ तक पहुँच गया. मैने
अपने दोनो टाँगों को सख्ती से एक दूसरे के साथ भींच दिया लेकिन
तब तक तो उनकी उंगलियाँ मेरी योनि के द्वार तक पहुँच चुकी थी.
दोनो उंगलियाँ एक मेरी योनि मे घुसने के लिए कसमसा रही थी.

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Posted : 12/02/2011 9:21 am
 Anonymous
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मैने पूरी ताक़त लगा कर एक धक्का देकर उनसे अपने को अलग किया.
और वहाँ से भागते हुए
निकल गयी. जाते जाते उनके शब्द मेरे कानो पर पड़े.
"तुम्हे इस कंपनी मे काम करने के लिए मेरी हर इच्च्छा का ध्यान
रखना पड़ेगा."
मैं अपनी डेस्क पर लगभग दौड़ते हुए पहुँची. मेरी साँसे तेज तेज
चल रही थी. मैने एक
ग्लास ठंडा पानी पिया. बेबसी से मेरी आँखों मे आँसू आ गये. नम
आँखों से मैने अपना रेसिग्नेशन लेटर टाइप किया और उसे वही पटक
कर ऑफीस से
बाहर निकल गयी. फिर दोबारा कभी उस रास्ते की ओर मैने पावं नही
रखे.

फिर से मैने कई जगह अप्लाइ किया. आख़िर एक जगह से इंटरव्यू कॉल
आया.
सेलेक्ट होने के बाद मुझे सीईओ से मिलने के लिए ले जाया गया. मुझे
उन्ही
की पीए के पोस्ट पर अपायंटमेंट मिली थी. मैं एक बार चोट खा चुकी
थी इस लिए दिल बड़ी तेज़ी से धड़क रहा था. मैने सोच रखा था
कि
अगर मैं कहीं को जॉब करूँगी तो अपनी इच्च्छा से. किसी मजबूरी या
किसी की रखैल बन कर नही. मैने सकुचते हुए उनके
कमरे मे नॉक किया और अंदर गयी.

"यू आर वेलकम टू दिस फॅमिली" सामने से आवाज़ आई. मैने देखा
सामने एक३7 साल का बहुत ही खूबसूरत आदमी खड़ा था. मैं सीईओ मिस्टर.
राज शर्मा को देखती ही रह गयी. वो उठे और मेरे पास आकर हाथ
बढ़ाया लेकिन मैं बुत की तरह खड़ी रही. ये सभ्यता के खिलाफ था
मैं अपने बॉस का इस तरह से अपमान कर रही थी. लेकिन उन्हों ने बिना
कुच्छ कहे मुस्कुराते हुए मेरी हथेली को थाम लिया. मैं होश मे
आई. मैने तपाक से उनसे हाथ मिलाया. वो मेरे
हाथ को पकड़े हुए मुझे अपने सामने की चेर तक ले गये और चेर को
खींच कर मुझे बैठने के लिए कहा. जब तक वो घूम कर अपनी
सीट पर पहुँचे मैं तो उन के डीसेन्सी पर मर मिटी. इतना बड़ा आदमी
और इतना सोम्य व्यक्तित्व. मैं तो किसी ऐसे ही एंप्लायर के पास काम
करने का सपना इतने दीनो से संजोए थी.

खैर अगले दिन से मैं अपने काम मे जुट गयी. धीरे धीरे उनकी
अच्च्छाइयों से अवगत होती गयी. सारे ऑफीस के स्टाफ उन्हे दिल से
चाहते थे. मैं भला उनसे अलग कैसे रहती. मैने इस कंपनी मे
अपने
बॉस के बारे मे उनसे मिलने के पहले जो धारणा बनाई थी उसका उल्टा
ही
हुआ. यहाँ पर तो मैं खुद अपने बॉस पर मर मिटी, उनके एक एक काम
को
पूरे मन से कंप्लीट करना अपना धर्म मान लिया. मगर बॉस
था कि घास ही नही डालता था. यहा मैं सलवार कमीज़ पहन कर ही
आने लगी. मैने अपने कमीज़ के गले बड़े कार्वालिए जिससे उन्हे मेरे
दूधिया रंग के बूब्स देखें. बाकी सारे ऑफीस वालों के सामने तो
अपने बदन को चुनरी से ढके रखती थी. मगर उनके सामने जाने से
पहले अपनी छातियो पर से चुनरी हटा कर उसे जान बूझ कर टेबल
पर छ्चोड़ जाती थी. मैं जान बूझ कर उनके सामने झुक
कर काम करती थी जिससे मेरे ब्रा मे कसे हुए बूब्स उनकी आँखों के
सामने झूलते रहें. धीरे धीरे मैने महसूस किया कि उनकी नज़रों
मे भी परिवर्तन आने लगा है. आख़िर वो कोई साधु महात्मा तो थे
नही ( दोस्तो आप तो जानते है मैं यानी आपका दोस्त राज शर्मा कैसा बंदा हूँ
ये सब तो चिड़िया को जाल मे फाँसने के लिए एक चारा था ) और मैं थी भी
इतनी सुंदर की मुझ से दूर रहना एक नामुमकिन
काम था. मैं अक्सर उनसे सटने की कोशिश करने लगी. कभी कभी
मौका देख कर अपने बूब्स उनके बदन से च्छुआ देती

मैने ऑफीस का काम इतनी निपुणता से सम्हाल लिया था कि अब राजकुमार
जी ने काम की काफ़ी ज़िम्मेदारियाँ मुझे सोन्प दी थी. मेरे बिना वो बहुत
असहाय फील करते थे. इसलिए मैं कभी छुट्टी नही लेती थी.

धीरे धीरे हम काफ़ी ओपन हो गये. फ्री टाइम मे मैं उनके कॅबिन मे
जाकर उनसे बातें करती रहती. उनकी नज़र बातें करते हुए कभी
मेरे
चेहरे से फिसल कर नीचे जाती तो मेरे निपल्स बुलेट्स की तरह तन
कर खड़े हो जाते. मैं अपने उभारों को थोडा और तान लेती थी.

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Posted : 12/02/2011 9:21 am
 Anonymous
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उनमे गुरूर बिल्कुल भी नही था. मैं
रोज घर से उनके लिए कुच्छ ना कुच्छ नाश्ते मे बनाकर लाती थी हम
दोनो साथ बैठ कर नाश्ता करते थे. मैं यहाँ भी कुच्छ महीने
बाद स्कर्ट ब्लाउस मे आने लगी. जिस दिन पहली बार स्कर्ट ब्लाउस मे
आई, मैने उनकी आँखो मे मेरे लिए एक प्रशंसा की चमक देखी.

मैने बात को आगे बढ़ाने की सोच ली. कई बार काम का बोझ ज़्यादा
होता तो मैं उन्हे बातों बातों मे कहती, "सर अगर आप कहें तो फाइल
आपके घर ले आती हूँ छुट्टी के दिन या ऑफीस टाइम के बाद रुक जाती
हूँ. मगर उनका जवाब दूसरों से बिल्कुल उल्टा रहता.

वो कहते "स्मृति मैं अपनी टेन्षन घर लेजाना
पसंद नही करता और चाहता हूँ की तुम भी छुट्टी के बाद अपनी
लाइफ एंजाय करो. अपने घर वालो के साथ अपने बाय्फरेंड्स के साथ
शाम एंजाय करो. क्यों कोई है क्या?" उन्हों ने मुझे छेड़ा.

"आप जैसा हॅंडसम और शरीफ लड़का जिस दिन मुझे मिल जाएगा उसे
अपना बॉय फ्रेंड बना लूँगी. आप तो कभी मेरे साथ घूमने जाते
नहीं हैं." उन्हों ने तुरंत बात का टॉपिक बदल दिया.

अब मैं अक्सर उन्हे छूने लगी. एक बार उन्हों ने सिरदर्द की शिकायत
की. मुझे कोई टॅबलेट ले कर आने को कहा.

" सर, मैं सिर दबा देती हूँ. दवाई मत लीजिए." कहकर मैं उनकी
चेर के पीछे आई और उनके सिर को अपने हाथों मे लेकर दबाने
लगी. मेरी उंगलिया उनके बलों मे घूम रही थी. मैं अपनी उंगलियों
से
उनके सिर को दबाने लगी. कुच्छ ही देर मे आराम मिला तो उनकी आँखें
अपने आप मूंडने लगी. मैने उनके सिर को अपने बदन से सटा दिया.
अपने
दोनो चुचियो के बीच उनके सिर को दाब कर उनके सिर को दबाने लगी.
मेरे दोनो उरोज उनके सिर के भार से दब रहे थे. उन्हों ने भी
शायद
इसे महसूस किया होगा मगर कुच्छ कहा नही. मेरे दोनो उरोज सख़्त हो
गये और निपल्स तन गये. मेरे गाल शर्म से लाल हो गये थे.

"बस अब काकी आराम है कह कर जब उन्हों ने अपने सिर मेरी छातियो
से उठाया तो मुझे इतना बुरा लगा की कुच्छ बयान नही कर सकती. मैं
अपनी नज़रे ज़मीन पर गड़ाए उनके सामने कुर्सी पर आ बैठी.

धीरे धीरे हम बेताकल्लूफ होने लगे. अभी सिक्स मोन्थ्स ही हुए थे
कि एक दिन मुझे अपने कॅबिन मे बुला कर उन्होने एक लिफ़ाफ़ा दिया. उसमे
से लेटर निकाल कर मैने पढ़ा तो खुशी से भर उठी. मुझे
पर्मनेंट कर दिया गया था और मेरी तनख़्वाह डबल कर दी गयी
थी.

मैने उनको थॅंक्स कहा तो वो कह उठे. "सूखे सूखे थॅंक्स से काम
नही चलेगा. बेबी इसके लिए तो मुझे तुमसे कोई ट्रीट मिलनी चाहिए"

"ज़रूर सर अभी देती हूँ" मैने कहा

"क्या?" वो चौंक गये. मैने मौके को हाथ से नही जाने देना चाहती
थी. मैं
झट से उनकी गोद मे बैठ गयी और उन्हे अपनी बाहों मे भरते हुए
उनके लिप्स चूम लिए. वो इस अचानक हुए हमले से घबरा गये.

"स्मृति क्या कर रही हो. कंट्रोल युवरसेल्फ. इस तरह भावनाओं मे मत
बहो. " उन्हों ने मुझे उठाते हुए कहा "ये उचित नही है. मैं एक
शादी शुदा बाल बच्चेदार आदमी हूँ"

"क्या करूँ सर आप हो ही इतने हॅंडसम की कंट्रोल नही हो पाया." और

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Posted : 12/02/2011 9:22 am
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जब इतना होने के बाद भी उन्हों ने कुच्छ नही कहा तो मैं उनसे और
खुलने लगी.

"राज जी एक दिन मुझे घर ले चलो ना अपने" एक दिन मैने उन्हे
बातों बातों मे कहा. अब हमारा संबंध बॉस और पीए का कम दोस्तों
जैसा अधिक हो गया था.

"क्यों घर मे आग लगाना चाहती हो?" उन्हों ने मुस्कुराते हुए पूचछा.

"कैसे?"

"अब तुम जैसी हसीन पीए को देख कर कौन भला मुझ पर शक़ नही
करेगा."

"चलो एक बात तो आपने मान ही लिया आख़िर."

"क्या?" उन्हों ने पूछा.

"कि मैं हसीन हूँ और आप मेरे हुष्ण से डरते हैं."

"वो तो है ही."

"मैं आपकी वाइफ से आपके बच्चों से एक बार मिलना चाहती हूँ."

"क्यों? क्या इरादा है?"

" ह्म्*म्म कुच्छ ख़तरनाक भी हो सकता है." मैने अपने निचले होंठ
को दाँत से काटते हुए उठ कर उनकी गोद मे बैठ गयी. मैं जब भी बोल्ड
हो जाती थी वो घबरा उठते थे. मुझे उन्हे इस तरह सताने मे बड़ा
मज़ा आता था.

" देखो तुम मेरे लड़के से मिलो. उसे अपना बॉय फ़्रेंड बना लो. बहुत
हॅंडसम है वो. मेरा तो अब समय चला गया है तुम जैसी लड़कियों
से फ्लर्ट करने का." उन्हों ने मुझे अपने गोद से उठाते हुए कहा.

"देखो ये ऑफीस है. कुच्छ तो इसकी मर्यादा का ख्याल रखा कर. मैं
यहा तेरा बॉस हूँ. किसी ने देख लिया तो पता नही क्या सोचेगा कि
बुड्ढे की मति मारी गयी है."

इस तरह अक्सर मैं उनसे चिपकने की कोशिश करती थी मगर वो किसी
मच्चली की तरह हर बार फिसल जाते थे.

इस घटना के बाद तो हम काफ़ी खुल गये. मैं उनके साथ उल्टे सीधे
मज़ाक भी करने लगी. लेकिन मैं तो उनकी बनाई हुई लक्ष्मण रेखा
क्रॉस करना चाहती थी. मौका मिला होली को.

होली के दिन हुमारे ऑफीस मे छुट्टी थी. लेकिन फॅक्टरी बंद नही
रखा जाता था
कुच्छ ऑफीस स्टाफ को उस दिन भी आना पड़ता था. मिस्टर. राज हर होली को
अपने
स्टाफ से सुबह-सुबह होली खेलने आते थे. मैने भी होली को उनके
साथ हुड़दंग करने के प्लान बना लिया. उस दिन सुबह मैं ऑफीस
पहुँच गयी.
ऑफीस मे कोई नही था. सब बाहर एक दूसरे को गुलाल लगाते थे. मैं
लोगों की नज़र बचाकर ऑफीस के अंदर घुस गयी. अंदर होली
खेलना
अलोड नही था. मैं ऑफीस मे अंदर से दरवाजा बंद कर के
उनका इंतेज़ार करने लगी. कुच्छ ही देर मे राज की कार अंदर आई. वो
कुर्ते पायजामे मे थे. लोग उनसे गले मिलने लगे और गुलाल लगाने
लगे. मैने गुलाल निकाल कर एक प्लेट मे रख लिया बाथरूम मे जाकर
अपने बालों को खोल दिया.रेशमी जुल्फ खुल कर पीठ पर बिखर गये.
मैं एक पुरानी शर्ट और स्कर्ट पहन रखी
थी. स्कर्ट काफ़ी छ्होटी थी. मैने शर्ट के बटन्स खोल कर अंदर की
ब्रा उतार दी और शर्ट को वापस पहन ली. शर्ट के उपर के दो बटन
खुले रहने दिए जिससे मेरे आधे बूब्स झलक रहे थे. शर्ट
चूचियो के उपर से कुच्छ घिसी हुई थी इसलिए मेरे निपल्स और
उनके बीच का काला घेरा सॉफ नज़र आ रहा था. उत्तेजना और डर से
मैं मार्च के मौसम मे भी पसीने पसीने हो रही थी.

मैं खिड़की से झाँक रही थी और उनके फ्री होने का इंतेज़ार करने
लगी. उन्हे क्या मालूम था मैं ऑफीस मे उनका इंतेज़ार कर रही हूँ.
वो फ्री हो कर वापस कार की तरफ बढ़ रहे थे. तो मैने उनके
मोबाइल पर रिंग किया.

"सर, मुझसे होली नही खेलेंगे."

"कहाँ हो तुम? सिम... अजाओ मैं भी तुमसे होली खेलने के लिए बेताब
हूँ" उन्हों ने चारों तरफ देखते हुए पूचछा.

"ऑफीस मे आपका इंतेज़ार कर रही हूँ"

"तो बाहर आजा ना. ऑफीस गंदा हो जायगा"

नही सबके सामने मुझे शर्म आएगी. हो जाने दो गंदा. कल रंधन
सॉफ कर देगा" मैने कहा

"अच्च्छा तो वो वाली होली खेलने का प्रोग्राम है?" उन्हों ने
मुस्कुराते हुए मोबाइल बंद किया और ऑफीस की तरफ बढ़े. मैने
लॉक खोल कर दरवाजे के पीछे छुप गयी. जैसे ही वो अंदर आए
मैं पीछे से उनसे लिपट गयी और अपने हाथों से गुलाल उनके चहरे
पर मल दिया. जब तक वो गुलाल झाड़ कर आँख खोलते मैने वापस अपनी
मुत्ठियों मे गुलाल भरा और उनके कुर्ते के अंदर हाथ डाल कर उनके
सीने मे लगा कर उनके सीने को मसल दिया. मैने उनके दोनो सीने
अपनी मुट्ठी मे भर कर किसी औरत की छातियो की तरह मसल्ने
लगी.

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Posted : 12/02/2011 11:01 pm
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"ए..ए...क्या कर रही है?" वो हड़बड़ा उठे.

"बुरा ना मानो होली है." कहते हुए मैने एक मुट्ठी गुलाल पायजामे के
अंदर भी डाल दी. अंदर हाथ डालने मे एक बार झिझक लगी लेकिन फिर
सबकुच्छ सोचना बंद करके अंदर हट डाल कर उनके लिंग को मसल दिया.

"ठहर बताता हूँ." वो जब तक संभालते तब तक मैं खिल खिलाते
हुए वहाँ से भाग कर टेबल के पीछे हो गयी. उन्हों ने मुझे
पकड़ने के लिए टेबल के इधर उधर दौर लगाई. लेकिन मैं उनसे
बच गयी. लेकिन मेरा एम तो पकड़े जाने का था बचने का थोड़ी.
इसलिए मैं टेबल के पीछे से निकल कर दरवाजे की तरफ दौड़ी. इस
बार उन्हों ने मुझे पीच्चे से पकड़ कर मेरे कमीज़ के अंदर हाथ
डाल दिए. मैं खिल खिला कर हंस रही थी और कसमसा रही थी. वो
काफ़ी देर तक मेरे बूब्स पर रंग लगाते रहे. मेरे निपल्स को
मसल्ते रहे खींचते
रहे. मई उनसे लिपट गयी. और पहली बार उन्हों ने अपने होंठ मेरे
होंठों पर रख दिए. मेरे होंठ थोडा खुले और उनकी जीभ को
अंदर जाने का रास्ता दे दिया. कई मिनिट्स हम इसी तरह एक दूसरे को
चूमते रहे. मेरा एक हाथ सरकते हुए उनके पायजामे तक पहुँचा
फिर धीरे से पायजामे के अंदर सरक गया. मैं उनके लिंग की तपिश
अपने हाथों पर महसूस कर रही थी. मैने अपने हाथ आगे बढ़ा कर
उनके लिंग को थाम लिया. मेरी इस हरकत से जैसे उनके पूरे जिस्म मे
एक झुरजुरी सी दौड़ गयी. उन्होने ने मुझ एक धक्का देकर अपने से
अलग किया. मैं गर्मी से तप रही थी. लेकिन उन्हों ने कहा "नही
स्मृति …..नही ये ठीक नही है."

मैं सिर झुका कर वही खड़ी रही.

"तुम मुझसे बहुत छ्होटी हो." उन्हों ने अपने हाथों से मेरे चेहरे को
उठाया " तुम बहुत अच्च्छो लड़की हो और हम दोनो एक दूसरे के बहुत
अच्छे दोस्त हैं. "

मैने धीरे से सिर हिलाया. मैं अपने आप को कोस रही थी. मुझे अपनी
हरकत पर बहुत ग्लानि हो रही थी. मगर उन्हों ने मेरी कस्मकस को
समझ कर मुझे वापस अपनी बाहों मे भर लिया और मेरे गाल्लों पर
दो किस किए. इससे मैं वापस नॉर्मल हो गयी. जब तक मैं सम्हल्ती
वो जा चुके थे.

धीरे धीरे समय बीतता गया. लेकिन उस दिन के बाद उन्हों ने
हुमारे और उनके बीच मे एक दीवार बना दी.
मैं शायद वापस उन्हे सिड्यूस करने का प्लान बनाने लगती लेकिन
अचानक मेरी जिंदगी मे एक आँधी सी आई और सब कुच्छ चेंज हो
गया. मेरे सपनो का सौदागर मुझे इस तरह मिल जाएगा मैने कभी
सोचा ना था.

मैं एक दिन अपने काम मे बिज़ी थी कि लगा कोई मेरी डेस्क के पास आकर
रुका.

"आइ वॉंट टू मीट मिस्टर. राज शर्मा"

"एनी अपायंटमेंट? " मैने सिर झुकाए हुए ही पूचछा?

"नो"

"सॉरी ही ईज़ बिज़ी" मैने टालते हुए कहा.

"टेल हिम पंकज हिज़ सन वांट्स टू मीट हिम."

"मैने एक झटके से अपना सिर उठाया और उस खूबसूरत और हॅंडसम
आदमी को देखती रह गयी. वो भी मेरी खूबसूरती मे खो गया था.

"ओह माइ गोद. क्या चीज़ हो तुम. तभी डॅड आजकल इतना ऑफीस मे बिज़ी
रहने लगे हैं." उन्हों ने कहा "बाइ दा वे आपका नाम जान सकता हूँ?"

"स्मृति"

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Posted : 12/02/2011 11:27 pm
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"स्मृति….अब ये नाम मेरी स्मृति से कभी दूर नही जाएगा." मैने
शर्मा कर अपनी आँखे झुका ली. वो अंदर चले गये. वापसी मे उन्हों
ने मुझसे शाम की डेट फिक्स कर ली.

इसके बाद तो हम डेली मिलने लगे. हम दोनो पूरी शाम एक दूसरे की
बाहों मे बिताने लगे. पंकज बहुत ओपन माइंड के आदमी थे.

एक दिन राज ने मुझे अपने कॅबिन मे बुलाया और एक लेटर मुझे देते
हुए कहा.

"ये है तुम्हारा टर्मिनेशन लेटर. यू आर बीयिंग सॅक्ड" उन्हों ने
तेज आवाज़ के साथ कहा.

"ल..लेकिन मेरी ग़लती क्या है?" मैने रुआंसी आवाज़ मे पूछा.

"तुमने मेरे लड़के को अपने जाल मे फँसा है"

"लेकिन सर…"

"कोई लेकिन वेकीन नही" उन्हों ने मुझे बुरी तरह झिड़कते हुए
कहा "नाउ गेट लॉस्ट"

मेरी आँखों मे आँसू आ गये. मैं रोती हुई वहाँ से जाने लगी. जैसे
ही मैं दरवाजे तक पहुँची उनकी आवाज़ सुनाई दी.

"शाम को हम तुम्हारे पेरेंट्स से मिलने आ रहे है. पंकज जल्दी शादी
करना चाहता है" मेरे कदम ठिठक गये. मैं घूमी मैने देखा मिस्टर.
राज शर्मा अपनी बाहें फैलाए मुस्कुरा रहे हैं. मैं आँसू पोंछ कर
खिल खिला उठी. और दौड़ कर उनसे लिपट गयी.

आख़िर मैं राजकुमार जी के परिवार का एक हिस्सा बनने जा रही थी.
पंकज मुझे बहुत चाहता था. शादी से पहले हम हर शाम साथ
साथ घूमते फिरते. काफ़ी बातें करते. पंकज ने मुझसे मेरे बॉय
फ्रेंड्स के बारे मे पूचछा. और उनसे मिलने से पहले की मेरी सेक्षुयल
लाइफ के बारे मे पूचछा जब मैने कहा अभी तक
कुँवारी हूँ तो हँसने लगे और कहा,
क्या कहा दोस्तो ये तो आप पार्ट -२ मे ही जान पाएँगे तब तक के लिए
आपका दोस्त राज शर्मा आपसे विदा चाहता है अगलेपार्ट मे फिर मेलेंगे स्म्रति की
जवानी से खेलने के लिए

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Posted : 12/02/2011 11:28 pm
 Anonymous
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"क्या यार तुम्हारी जिंदगी तो बहुत बोरिंग है. यहाँ ये सब नही
चलेगा. एक दो तो भंवरों को रखना ही चाहिए. तभी तो तुम्हारी
मार्केट वॅल्यू का पता चलता है. मैं उनकी बातों से हंस पड़ी.

शादी से पहले ही मैं पंकज के साथ हुमबईस्तर हो गयी. हम दोनो
ने शादी से पहले खूब सेक्स किया. ऑलमोस्ट रोज ही किसी होटेल मे जाकर
सेक्स एंजाय करते थे. एक बार मेरे पेरेंट्स ने शादी से पहले रात
रात भर बाहर रहने पर एतराज जताया था. लेकिन जताया भी तो किसे मेरे
होने वाले ससुर जी से जो खुद इतने रंगीन मिज़ाज थे. उन्हों ने उनकी
चिंताओं को भाप बना कर उड़ा दिया. राजकुमार जी मुझे फ्री छ्चोड़
रखे थे लेकिन मैने कभी अपने काम से मन नही चुराया. अब मैं
वापस सलवार कमीज़ मे ऑफीस जाने लगी.

पंकज और उनकी फॅमिली काफ़ी खुले विचारों की थी. पंकज मुझे
एक्सपोषर के लिए ज़ोर देते थे. वो मेरे बदन पर रिवीलिंग कपड़े
पसंद करते थे. मेरा पूरा वॉर्डरोब उन्हों ने चेंज करवा दिया
था.
उन्हे मिनी स्कर्ट और लूस टॉपर मुझ पर पसंद थे. सिर्फ़ मेरे
कपड़े
ही नही मेरे अंडरगार्मेंट्स तक उन्हों ने अपने पसंद के खरीद्वये.

वो मुझे माइक्रो स्कर्ट और लूस स्लीव्ले टॉपर पहना कर डिस्कोज़
मे
ले जाते जहाँ हम खूब फ्री होकर नाचते और मस्ती करते थे. अक्सर
लोफर लड़के मेरे बदन से अपना बदन रगड़ने लगते. कई बार मेरे
बूब्स मसल देते. वो तो बस मौके की तलाश मे रहते थे कि कोई मुझ
जैसी सेक्सी हसीना मिल जाए तो हाथ सेंक लें. मैं कई बार नाराज़ हो
जाती लेकिन पंकज मुझे चुप करा देते. कई बार कुच्छ मनचले
मुझसे डॅन्स करना चाहते तो पंकज खुशी खुशी मुझे आगे कर
देते.
मुझ संग तो डॅन्स का बहाना होता. लड़के मेरे बदन से जोंक की तरह
चिपक जाते. मेरे पूरे बदन को मसल्ने लगते. बूब्स का तो सबसे
बुरा हाल कर देते. मैं अगर नाराज़गी जाहिर करती तो पंकज अपनी
टेबल
से आँख मार कर मुझे शांत कर देते. शुरू शुरू मे तो इस तरह का
ओपननेस मे मैं घबरा जाती थी. मुझे बहुत बुरा लगता था लेकिन
धीरे धीरे मुझे इन सब मे मज़ा आने लगा. मैं पंकज को उत्तेजित
करने के लिए कभी कभी दूसरे किसी मर्द को सिड्यूस करने लगती. उस
शाम पंकज मे कुच्छ ज़्यादा ही जोश आ जाता.

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Posted : 12/02/2011 11:29 pm
 Anonymous
(@Anonymous)
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खैर हुमारी शादी जल्दी ही बड़े धूम धाम से हो गयी. शादी के
बाद जब मैने राजकुमार जी के चरण छुये तो उन्हों ने मुझे अपने
सीने से लगा लिया. इतने मे ही मैं गीली हो गयी. तब मैने महसूस
किया की हुमारा रिश्ता आज से बदल गया लेकिन मेरे मन मे अभी एक
छुपि सी चिंगारी बाकी है अपने ससुर जी के लिए जिसे हवा लगते ही
भड़क उठने की संभावना है.

मेरे ससुराल वाले बहुत अच्च्चे काफ़ी अड्वॅन्स्ड विचार के थे. पंकज
के एक बड़े भाई साहिब हैं कमल और एक बड़ी बहन है नीतू. दोनो
कीतब तक शादी हो चुकी थी. मेरे नंदोई का नाम है विशाल. विशाल
जी
बहुत रंगीन मिज़ाज इंसान थे. उनकी नज़रों से ही कामुकता टपकती
थी.

शादी के बाद मैने पाया विशाल मुझे कामुक नज़रों से
घूरते रहते हैं. नयी नयी शादी हुई थी इसलिए किसी से शिकायत
भी नही कर सकती थी. उनकी फॅमिली इतनी अड्वान्स थी कि मेरी इस
तरहकी शिकायत को हँसी मे उड़ा देते और मुझे ही उल्टा उनकी तरफ धकेल
देते. विशलजी की मेरे ससुराल मे बहुत अच्छि इमेज बनी हुई थी
इसलिए मेरी किसी भी को कोई तवज्जो
नही देता. अक्सर विशलजी मुझे च्छू कर बात करते थे. वैसे इसमे
कुच्छ भी
ग़लत नही था. लेकिन ना जाने क्यों मुझे उस आदमी से चिढ़ होती थी.
उनकी आँखें हमेशा मेरी छातियो पर रेंगते महसूस करती थी. कई
बार मुझसे सटने के भी कोशिश करते थे. कभी सबकी आँख बचा
कर मेरी कमर मे चिकोटी काटते तो कभी मुझे देख कर अपनी जीभ
को अपने होंठों पर फेरते. मैं नज़रें घुमा लेती.

मैने जब नीतू से थोड़ा घुमा कर कहा तो वो हंसते हुए
बोली, "देदो बेचारे को कुच्छ लिफ्ट. आजकल मैं तो रोज उनका पहलू गर्म
कर पाती नही हूं इसलिए खुला सांड हो रहे हैं. देखना बहुत बड़ा
है उनका. और तुम तो बस अभी कच्ची कली से फूल बनी हो उनका
हथियार झेल पाना अभी तेरे बस का नही."

"दीदी आप भी बस....आपको शर्म नही आती अपने भाई की नयी दुल्हन से
इस तरह बातें कर रही हो?"

"इसमे बुराई क्या है. हर मर्द का किसी शादीसूडा की तरफ अट्रॅक्षन
का मतलब बस एक ही होता है. कि वो उसके शहद को चखना चाहता
है. इससे कोई घिस तो जाती नही है." नीतू दीदी ने हँसी मे बात को
उड़ा दिया. उस दिन शाम को जब मैं और पंकज अकेले थे नीतू दीदी ने
अपने भाई से भी मज़ाक मे मेरी शिकायत की बात कह दी.

पंकज हँसने लगे, "अच्च्छा लगता है जीजा जी का आप से मन भर
गया है इसलिए मेरी बीवी पर नज़रें गड़ाए रखे हुए हैं." मैं तो
शर्म से पानी पानी हो रही थी. समझ ही नही आ रहा था वहाँ
बैठे रहना चाहिए या वहाँ से उठ कर भाग जाना चाहिए. मेरा
चेहरा शर्म से लाल हो गया.

"अभी नयी है धीरे धीरे इस घर की रंगत मे ढल जाएगी." फिर
मुझे कहा, " शिम्रिति हमारे घर मे किसीसे कोई लुकाव च्चिपाव नही
है. किसी तरह का कोई परदा नही. सब एक दूसरे से हर तरह का
मज़ाक छेड़ छाड कर सकते हैं. तुम किसी की किसी हरकत का बुरा
मतमानना"

अगले दिन की ही बात है मैं डाइनिंग टेबल पर बैठी सब्जी काट रही
थी. विशलजी और नीता दीदी सोफे पर बैठे हुए थे. मुझे ख़याल
ना रहा कब मेरे एक स्तन से सारी का आँचल हट गया. मुझे काम
निबटा कर नहाने जाना था इसलिए ब्लाउस का सिर्फ़ एक बटन बंद था.
आधे से अधिक छाती बाहर निकली हुई थी. मैं अपने काम मे तल्लीन
थी. मुझे नही मालूम था कि विशाल जी सोफे बैठ कर न्यूज़ पेपर की
आड़ मे मेरे स्तन को निहार रहे है. मुझे पता तब चला जब नीतू
दीदी ने मुझे बुलाया.

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Posted : 12/02/2011 11:29 pm
 Anonymous
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"स्मृति यहाँ सोफे पर आ जाओ. इतनी दूर से विशाल को तुम्हारा
बदन ठीक से दिखाई नही दे रहा है. बहुत देर से कोशिश कर
रहाहै कि काश उसकी नज़रों के गर्मी से तुम्हारे ब्लाउस का इकलौता
बटन पिघल जाए और ब्लाउस से तुम्हारी छातिया निकल जाए लेकिन उसे कोई
सफलता नही मिल रही है."

मैने झट से अपनी चूचियो को देखा तो सारी बात समझ कर मैने
आँचल सही कर दिया. मई शर्मा कर वहाँ से उठने को हुई. तो नीता
दीदी ने आकर मुझे रोक दिया. और हाथ पकड़ कर सोफे तक ले गयी.
विशाल जी के पास ले जा कर. उन्हों ने मेरे आँचल को चूचियो के
उपर से हटा दिया.

"लो देख लो….. 38 साइज़ के हैं. नापने हैं क्या?"

मैं उनकी हरकत से शर्म से लाल हो गयी. मैने जल्दी वापस आँचल
सही किया और वहाँ से खिसक ली.

हनिमून मे हमने मसुरी जाने का प्रोग्राम बनाया. शाम को बाइ कार
देल्ही से निकल पड़े. हुमारे साथ नीतू और विशलजी भी थे.ठंड के
दिन थे. इसलिए शाम जल्दी हो जाती थी. सामने की सीट पर नीतू दीदी
बैठी हुई थी. विशाल जी कार चला रहे थे. हम दोनो पीछे
बैठे हुए थे. दो घंटे कंटिन्युवस ड्राइव करने क बाद एक ढाबे
पर चाइ पी. अब पंकज ड्राइविंग सीट पर चला गया और विशलजी
पीछे की सीट पर आ गये. मैं सामने की सीट पर जाने के लिए
दरवाजाखोली की विशाल ने मुझे रोक दिया.

"अरे कभी हुमारे साथ भी बैठ लो खा तो नही जौंगा तुम्हे."
विशाल ने कहा.

"हाँ बैठ जाओ उनके साथ सर्दी बहुत है बाहर. आज अभी तक गले
के अंदर एक भी घूँट नही गयी है इसलिए ठंड से काँप रहे
हैं.तुमसे सॅट कर बैठेंगे तो उनका बदन भी गर्म हो जाएगा." दीदी ने
हंसते हुए कहा.

"अच्च्छा? लगता है दीदी अब तुम उन्हे और गर्म नही कर पाती हो."
पंकज ने नीतू दीदी को छेड़ते हुए कहा.

हम लोग बातें करते मज़ाक करते चले जा
रहे थे. तभी बात करते करते विशाल ने अपना हाथ मेरी जाँघ पर
रख दिया. जिसे मैने धीरे से पकड़ कर नीचे कर दिया. ठंड
बढ़ गयी थी. पंकज ने एक शॉल ले लिया. नीतू एक कंबल ले ली
थी. हम दोनो पीछे बैठ ठंड से काँपने लगे.

"विशाल देखो स्मृति का ठंड के मारे बुरा हाल हो रहा है. पीछे
एक कंबल रखा है उससे तुम दोनो ढक लो." नीतू दीदी ने कहा.

अब एक ही कंबल बाकी था जिस से विशाल ने हम दोनो को ढक दिया. एक
कंबल मे होने के कारण मुझे विशाल से सॅट कर बैठना पड़ा. पहले
तोथोड़ी झिझक हुई मगर बाद मे मैं उनसे एकद्ूम सॅट कर बैठ गयी.
विशालका एक हाथ अब मेरी जांघों पर घूम रहा था और सारी के ऊपर से
मेरीजांघों को सहला रहा था. अब उन्हों ने अपने हाथ को मेरे कंधे के
उपर रख कर मुझे और अपने सीने पर खींच लिया. मैं अपने हाथों
से उन्हे रोकने की हल्की सी कोशिश कर रही थी.

"क्या बात है तुम दोनो चुप क्यों हो गये. कहीं तुम्हारा नंदोई तुम्हे
मसल तो नही रहा है? सम्हल के रखना अपने उन खूबसूरत जेवरों
को मर्द पैदाइशी भूखे होते हैं इनके.' कह कर नीतू हंस पड़ी.
मैं शर्मा गयी. मैने विशाल के बदन से दूर होने की कोशिश की
तोउन्हों ने मेरे कमर को पकड़ कर और अपनी तरफ खींच लिया.

"अब तुम इतनी दूर बैठी हो तो किसी को तो तुम्हारी प्रॉक्सी देनी पड़ेगी
ना. और नंदोई के साथ रिश्ता तो वैसे ही जीजा साली जैसा होता
है.....आधी घर वाली....." विशाल ने कहा

"देखा.....देखा. .....कैसे उच्छल रहे हैं. स्मृति अब मुझे मत
कहना कि मैने तुम्हे चेताया नही. देखना इनसे दूर ही रहना. इनका
साइज़ बहुत बड़ा है." नीतू ने फिर कहा.

"क्या दीदी आप भी बस…."

अब पंकज ने अपनी बाँह वापस कंधे से उतार कर कुच्छ देर तक मेरे
अन्द्रूनि जांघों को मसल्ते रहे. फिर अपने हाथ को वापस उपर उठा
कर अपनी उंगलियाँ मेरे गाल्लों पर फिराने लगे. मेरे पूरे बदन मे
एकझुरजुरी सी दौड़ रही थी. रोएँ भी खड़े हो गये. धीरे धीरे
उनका हाथ गले पर सरक
गया. मैं ऐसा दिखावा कर रही थी जैसे सब कुच्छ नॉर्मल है मगर
अंदर उनके हाथ किसी सर्प की तरह मेरे बदन पर रेंग रहे थे.
अचानक उन्हों ने अपना हाथ नीचे किया और सारी ब्लाउस के उपर से
मेरे एक स्तन को अपने हाथों से ढक लिया. उन्हों ने पहले धीरे से
कुच्छ देर तक मेरे एक स्तन को प्रेस किया. जब देखा कि मैने किसी
तरह का विरोध नही किया तो उन्हों ने हाथ ब्लाउस के अंदर डाल कर
मेरे एक स्तन को पकड़ लिया. मैं कुच्छ देर तक तो सकते जैसी हालत
मे बैठी रही. लेकिन जैसे ही उसने मेरे उस स्तन को दबाया मैं
चिहुनक उठी "अयीई"

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Posted : 12/02/2011 11:30 pm
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